आपातकाल का दौर लोकतंत्र पर सत्ता के अत्याचार की कहानी है। लोक की चिंता न कर सत्ता की कुर्सी बचाने का सारा तिकड़म रचा गया। जिन्होंंने इस कठिन दौर में आवाज उठाई उन्हें पहले प्रताड़ित और फिर जेलों में बंद कर दिया गया। ऐसी यातनाएं दी गईं कि उन्हें सुनकर सिहरन हो उठती है।
दिल्ली में रह रहे अशोक कुमार गुप्ता (महाजन) उन दिनों फगवाड़ा में थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। अशोक कुमार गुप्ता (महाजन) बताते हैं कि जून 1974 में नागपुर में तृतीय वर्ष करने गया। वहां से जुलाई में दिल्ली आया। संघ कार्यालय, झंडेवालान में मेरे संघ प्रचारक के नाते पंजाब के फगवाड़ा जाने का निर्णय हुआ। मैं कुरुक्षेत्र में संघ शिक्षक था। जून 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर दिया और सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया। मुझे फगवाड़ा में राजाराम की दुकान से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें हमारे संगठन का नाम भी सही से नहीं आता था, वे इसे “RSSS” लिखते थे।
अगले दिन हमें जालंधर स्थानांतरित कर दिया गया। आपातकाल लगने के एक सप्ताह के भीतर ही हलचल शुरू हो गई और हमने 3 दिन तक शाखा भी लगाई। कम्युनिस्ट छात्रों से भी झड़प होती थी। उन्होंने मुझे खोजकर पकड़वा दिया। यह मेरा पहली बार जेल जाना था।
20 लोगों की बैरक में 40 अंडरट्रायल कैदी
20 लोगों की बैरक में 40 अंडरट्रायल कैदियों को रखा गया था। सुबह 5 बजे “जप जी” का पाठ शुरू हो जाता था। खाने में लगभग एक फुट गोलाई की 3 रोटियां और दाल मिलती थी। 40 लोगों के लिए केवल एक ही शौचालय था। पंजाब सरकार को जिन बंदियों को अधिक समय तक रखना था, उन्हें फिरोजपुर भेज दिया, क्योंकि वहां की सेंट्रल जेल बड़ी थी। वहां लोहे की खुली सलाखों के कारण बहुत ठंड लगती थी। हम लोकतंत्र सेनानी थे। हम फांसी घर देखना चाहते थे। बाद में हमें 277 कैदियों के साथ फांसी घर भी दिखाया गया। बाहर से जो लोकतंत्र सेनानी आते थे, उनके पायजामे में चूहे छोड़कर उनसे जानकारी हासिल की जाती थी।
मुझे लोकतंत्र सेनानियों का प्रमुख बना दिया गया। जेल में हमने शाखा लगानी शुरू कर दी। हमारे साथ जो प्रमुख लोग थे, उनमें शामिल थे
- माननीय मित्र सेन जी ( पंजाब प्रांत कार्यवाह )
- किशन लाल मेन्नी ( वित्त मंत्री पंजाब )
- किशन लाल शर्मा (संगठन मंत्री पंजाब )
- लाला जगत नारायण (पंजाब केसरी के मालिक)
- गुरुचरण सिंह टोहरा (अकाली दल के अध्यक्ष)
जालंधर आयुर्वेदिक कॉलेज के विद्यार्थी के द्वारा आपातकाल के विरोध में सक्रिय भागीदारी की। कांग्रेस के मोहाली अधिवेशन, जिसे “कामागाटामारू नगर” नाम दिया गया था, अधिवेशन में जब श्रीमती इंदिरा गांधी का भाषण प्रारम्भ हुआ, तब हैंडबिल वितरित एवं उछालकर अपना विरोध प्रकट किया। इसके तुरंत बाद सुरक्षा बलों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और फिरोजपुर जेल में बंद कर दिया गया।
चार महीने तक फिरोजपुर जेल में रहा
मुझे तथा अन्य विद्यार्थियों को लगभग चार माह तक फिरोजपुर जेल में निरुद्ध रखा गया। इसके बाद जमानत मिलने पर मुझे जालंधर नगर में संघ कार्य की जिम्मेदारी सौंपी गई। उस अवधि में हम रात्रि के समय पंजाब केसरी प्रेस से सेंसर की गई खबरों की जानकारी प्राप्त करते थे। इन समाचारों को साइक्लोस्टाइल मशीन द्वारा प्रतिलिपि बनाकर विभिन्न जिलों में वितरित किया जाता था, ताकि जनता तक वास्तविक समाचार पहुंच सकें। इसके अतिरिक्त, प्रातः लगभग 2 बजे से 4 बजे तक हम गली-मोहल्लों में पोस्टर लगाकर जनजागरण का कार्य करते थे।
जेलों में बैरक में मांस फेंकते थे कम्युनिस्ट
उस समय गिरफ्तारी और हमलों का निरंतर खतरा बना रहता था, इसलिए आत्मरक्षा हेतु हम अपनी दोनों जेबों में लाल मिर्च रखते थे, ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनका उपयोग कर सकें। यह कार्य लोकतंत्र की रक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आपातकाल के विरोध में किए गए संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। कम्युनिस्ट बंदी हमारी बैरक में मांस फेंकते थे, वे अलग-अलग तरीकों से नशीले पदार्थों को जेल में मंगवाकर नशेड़ियों में बांटते थे।

















