आपातकाल के समय घोर यातना दी गई। कई लोगों की तो मौत भी हुई। दिल्ली में भी दमन का चक्र चला। जय भारत आनन्द को इतना प्रताड़ित किया गया कि बाद में उनका हाथ काटना पड़ा।
जय भारत आनन्द उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि आपातकाल के समय मेरे पिताजी Motherland अखबार में कार्यरत थे। इमरजेंसी की घोषणा के समय वह कार्यालय में ही थे। आधी रात को पुलिस ने इमारत की बिजली काट दी और कहा की अखबार नहीं छपेंगे। परन्तु किसी तरह एक पेज का अखबार छप गया और उसमें आपातकाल की जानकारी दे दी गई। सुबह अखबार कैसे बांटा जाए, यह समस्या उत्पन्न हुई तो तेरे पिताजी ने मुझे घर से बुलाया और कहा कि यह अखबार जाकर बांट कर आओ। मैंने 26 जून 1975 को प्रात:काल अखबार बांटे।

हाथ के ऊपर दो पुलिसकर्मी खड़े हो गए
जय भारत बताते हैं कि पूरा परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था। जब सत्याग्रह हुआ तो पिताजी ने निर्देश दिया कि मुझे गिरफ्तारी देनी है। मैंने संघ की योजना से संसद भवन के बाहर बोट क्लब पर सुप्रसिद्ध वकील श्री प्राणनाथ लेखी जी के साथ सत्याग्रह किया। थाने पहुंचने के बाद पुलिस ने मुझे लिटा दिया और मेरी बाजू के ऊपर दो पुलिस वाले जूते के साथ खड़े हो गए। मुझे भयंकर दर्द हुआ और यह दर्द मुझे काफी समय तक रहा। आपातकाल के कुछ वर्षों पश्चात मुझे फिर दर्द हुआ तो मैं डाक्टर के पास गया तो मुझे अपना हाथ कटवाना पड़ा।
डीआईआर से जमानत होने के पश्चात मुझे मीसा में गिरफ्तार कर लिया गया था। चुनाव की घोषणा होने पर ही मैं जेल से बाहर आ पाया था।
आपातकाल का समय हमेशा याद रहेगा
मैं विशेष तौर पर श्री ईश चड्ढा जी (संघ अधिकारी) की चर्चा अवश्य करना चाहता हूं, जिन्होंने जेल से आने के पश्चात सब जगह प्रयास किया कि मेरा हाथ कटने से बच जाए। वह मुझे अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास लेकर गए थे। आपातकाल का वह समय और संघर्ष हमेशा स्मरण रहेगा।















