वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता युगद्रष्टा पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
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वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता युगद्रष्टा पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक, संरक्षक और मार्गदर्शक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (1911-1990) की गिनती बीती सदी के महानतम तपस्वियों में की जाती है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Jun 24, 2026, 12:35 pm IST
in भारत
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक, संरक्षक और मार्गदर्शक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य (1911-1990) की गिनती बीती सदी के महानतम तपस्वियों में की जाती है। ‘युग के विश्वामित्र’ की उपाधि से विभूषित माँ गायत्री का यह वरद पुत्र एक संत और विचारक और लेखक ही नहीं; अपितु युगदृष्टा स्तर का युगपुरुष था जो 80 वर्ष की उद्देश्यपूर्ण जीवनयात्रा पूरी कर 2 जून 1990 को गायत्री जयंती के पुनीत पर्व पर अपनी इष्ट आराध्या से एकाकार हो गया था। अपने समय की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति के पुरोधा आचार्यश्री ने एक ऋग्वेद के एक वैदिक मंत्र (गायत्री महामंत्र) के माध्यम से अपने समय में समाज में एक ऐसी अभूतपूर्व जनक्रांति उत्पन्न कर दी थी कि देखते ही देखते लाखों मनुष्यों के मानस बदल गए।

आचार्य जी का व्यक्तित्व महाक्रान्ति का पर्याय

बीसवीं सदी के राष्ट्रजीवन में आचार्य जी का व्यक्तित्व महाक्रान्ति का पर्याय बनकर उभरा था। वह उन विरल प्रज्ञा पुरुषों में थे जिनमें ऋषित्व और मनीषा एकाकार हुई थी। उन्होंने रूढ़िवाद में जकड़े तदयुग के धर्मतंत्र का आच्छादन तोड़कर उसे वैज्ञानिक तार्किकता का जामा पहनाने का महापुरुषार्थ किया था। आचार्यश्री के अनुसार आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता (योग, चेतना) का संगम ही मानव जाति का वास्तविक कल्याण कर सकता है। इसी कारण आचार्यश्री को वर्तमान समय के सभी शीर्षस्थ आध्यात्मिक मनीषी ‘वैज्ञानिक अध्यात्म के प्रणेता’ के रूप में याद करते हैं। आज की तकनीकी दुनिया (जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) में उनका यह योगदान निश्चित रूप से अत्यंत प्रासंगिक है; क्यूंकि एआइ के इस दौर में मानवीय चेतना और नैतिक मूल्यों का विज्ञान सम्मत उपयोग अत्यंत आवश्यक है।

दर्शन के गहन आयाम: जीवन जीने का अनूठा विज्ञान

आचार्य जी का दर्शन केवल सैद्धांतिक उपदेशों का संग्रह नहीं था, अपितु जीवन जीने का एक पूर्ण विज्ञान था। उन्होंने गायत्री महामंत्र को केवल एक मंत्र या देवी के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय चेतना की शक्ति और जीवन ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने गायत्री साधना को आत्म-सुधार, चेतना के ऊर्ध्वारोहण और दिव्य गुणों को आत्मसात करने का एक वैज्ञानिक तरीका बताया और यज्ञ को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, अपितु सूक्ष्म ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में रूपांतरित करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया बताया।

वर्तमान की समस्याएं और युग ऋषि के सटीक समाधान

आधुनिक युग की सबसे बड़ी समस्या तनाव और मानसिक अशांति है। आचार्यश्री का सिद्धांत “मनःस्थिति बदलिए, परिस्थितियाँ स्वयं बदल जाएंगी” आज के डिप्रेशन और भागदौड़ भरे जीवन के लिए सर्वाधिक कारगर समाधान है। आचार्यश्री का प्रकृति को मनुष्य के अस्तित्व का अभिन्न अंग मानने का विचार वर्तमान के जलवायु संकट और पर्यावरण असंतुलन से निपटने का मार्ग दिखाता है। इसी तरह आज के समय में टूटते पारिवारिक रिश्तों और स्वार्थपूर्ण मानसिकता के बीच, आचार्य जी की ‘विचार क्रांति’ और ‘शतसूत्रीय योजना’ (मानवीय मूल्यों की स्थापना) परिवार और समाज को मजबूत बनाने का एक अचूक मंत्र है। उनका ‘हम बदलेंगे, युग बदलेगा’ का सूत्र यह संदेश देता है कि किसी भी सकारात्मक बदलाव की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर (चरित्र निर्माण) से ही होती है। इसी प्रकार आज के स्वार्थी और संकीर्ण समाज में आचार्यश्री का ‘कर्मयोग’ (दूसरों की भलाई और अपने कर्तव्यों का पालन) बहुत प्रासंगिक है। आचार्यश्री कहते हैं कि केवल भौतिक सफलता के पीछे न भागें, बल्कि चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में उतारें। उनका यह सूत्र विश्वयुद्ध की कगार पर खड़े आज के विश्व को एक सूत्र (वसुधैव कुटुंबकम) में पिरोने में अत्यंत प्रभावी है।

आचार्य श्रीराम शर्मा जी का अद्भुत शैक्षिक दर्शन

आचार्य श्रीराम शर्मा कहते हैं कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जी मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन, परिवार, समाज एवं राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा करे तथा बालक को जीवन की यथार्थता से परिचित कराये। व्यक्ति स्वयं को पहचाने तथा अपने चित्त की वृत्तियों का शोधन करना सीखे, तभी शिक्षा पद्धति सार्थक सकेगी। वर्तमान समय में शिक्षा से व्यक्ति एवं समाज की अपेक्षायें अधूरी एवं निराशात्मक हैं। अतः शिक्षा को जीवन की यथार्थता से जोड़ना नितान्त आवश्यक है तभी शिक्षा पर खर्च होने वाले समय, धन एवं शक्ति का उचित लाभ समाज व राष्ट्र को प्राप्त हो सकता है। देश के जीवन में विभिन्न क्षेत्रों और स्तरों पर जो अन्धकार और निराशा आज हमें घेरे हुए है, उनमें आशा की किरण आचार्य श्रीराम शर्मा के इन शैक्षिक विचारों के द्वारा ही प्रज्वलित हो सकती है। उनका शिक्षा दर्शन वर्तमान शिक्षा के दोषों का निवारण करके आदर्श शिक्षा प्रणाली की संरचना में सार्थक योगदान दे सकता है।

आचार्यश्री के जीवन का ‘ऊष्मायन’ काल : 24 वर्षों की दुर्धर्ष तपस्या

आचार्यश्री के जीवन का सबसे निर्णायक अध्याय मात्र 15 वर्ष की किशोरावस्था में हिमालय के सूक्ष्म शरीरधारी सिद्ध संत सर्वेश्वरानन्द जी का दिव्य सान्निध्य और मार्गदर्शन प्राप्त होना था। यह भेंट मात्र एक संयोग नहीं अपितु भारत ही प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का पुनर्जागरण था। हिमालयवासी गुरु ने उन्हें गायत्री महामंत्र के 24 वर्षों तक चलने वाले सवा लाख पुरश्चरण का कठिन अनुष्ठान सौंपा। यह साधना केवल शारीरिक तप या मंत्रोच्चार नहीं था, अपितु मन, बुद्धि और अहंकार के गहन शोधन, रूपांतरण और आत्म-परिष्कार की एक अलौकिक प्रक्रिया थी। 24 वर्षों की यह अवधि आचार्य जी के लिए एक प्रकार का ‘ऊष्मायन काल’ थी। इस दौरान उन्होंने न केवल प्रचंड आध्यात्मिक ऊर्जा अर्जित की, अपितु तत्कालीन समाज की समस्याओं की जड़ों को गहराई से समझा, प्राचीन ज्ञान के सागर में गोता लगाया और अपने भावी ‘युग निर्माण’ मिशन की विस्तृत रूपरेखा तैयार की।

राष्ट्र के यज्ञ में आहुति: स्वतंत्रता संग्राम और नैतिक जागरण

आचार्यश्री का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना के उच्च शिखरों तक सीमित नहीं था। वे अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश के प्रति पूर्णतः जागरूक और संवेदनशील थे। उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की थी। वे भलीभाँति जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी स्थायी और सार्थक हो सकती है जब समाज नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त हो। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रियता उनके इस दृढ़ विश्वास को रेखांकित करती है कि सच्चा आध्यात्मिकता पलायनवाद नहीं, अपितु समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का सजग निर्वहन है।

विचार क्रांति का विराट संकल्प

साधना पूर्ण होने के उपरांत, आचार्य श्री ने ‘युग निर्माण योजना’ का सूत्रपात किया। यह कोई तात्कालिक या सतही सुधार का प्रयास नहीं था, अपितु मानव चेतना के रूपांतरण और सामाजिक संरचना के आमूलचूल परिवर्तन की एक सुविचारित, वैज्ञानिक और समग्र योजना थी। इसका केंद्रीय विचार ‘विचार क्रांति’ था। ‘विचार क्रांति’ का सिद्धांत अत्यंत शक्तिशाली और दूरगामी है। आचार्य जी ने पहचाना कि बाहरी समस्याओं का मूल कारण व्यक्ति के विचारों, मान्यताओं और दृष्टिकोण में निहित है। जब तक व्यक्ति के सोचने का तरीका नहीं बदलेगा, लालच, स्वार्थ, भेदभाव, हिंसा जैसी बुराइयाँ समाज में बनी रहेंगी। उन्होंने सकारात्मक चिंतन, नैतिक मूल्यों को जीवन में उतारने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर विशेष बल दिया। यह योजना एक ‘ऊपर से नीचे’ के दृष्टिकोण के बजाय ‘नीचे से ऊपर’ के दृष्टिकोण पर आधारित थी, जहाँ व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन से समाज में व्यापक और स्थायी परिवर्तन लाने का लक्ष्य था।

मिशन के आधार स्तंभ: केंद्र, साहित्य और संगठन

आचार्य जी ने अपने विराट ‘युग निर्माण’ मिशन को प्रभावी स्वरूप देने के लिए अत्यंत प्रभावी संरचनाएं और कार्यप्रणाली विकसित की। शांतिकुंज, हरिद्वार इस आंदोलन का केंद्रीय परिचालन मुख्यालय बना। यह स्थान साधना, प्रशिक्षण, अनुसंधान और विभिन्न सामाजिक अभियानों के समन्वय का उत्कृष्टता पूर्ण जीवंत केंद्र है, जहाँ प्रतिवर्ष लाखों लोग प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। इसी तरह विज्ञान और आध्यात्मिकता के समन्वय का उनका दूरदर्शी विजन ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान’ और ‘देव संस्कृति विश्वविद्यालय’ में परिलक्षित होता है। इसी तरह 3200 से अधिक पुस्तकों का विशाल साहित्य सृजन उनके मिशन का सबसे शक्तिशाली ‘संचार माध्यम’ है। उन्होंने वेदों, उपनिषदों, दर्शनों और अन्य जटिल विषयों को अत्यंत सरल, सुबोध और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया, जिससे उनके विचार जन-जन तक पहुँचे।

Topics: Dev Sanskriti VishwavidyalayaGayatri MahamantraIndian SpiritualityGayatri SadhanaShantikunj HaridwarAll World Gayatri PariwarFounder of Gayatri PariwarPandit Shriram Sharma Acharya
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