जम्मू-कश्मीर में पीडीपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने तुलमुला में माता खीर भवानी मंदिर में कश्मीरी पंडितों को एक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडित सबकुछ भूल जाएं और आगे बढ़ें। घाटी में वापस आने की अपील की। यह भी कहा कि वे उन लोगों से बचें जो उनकी पीड़ा पर रोटी सेंकते हैं।
महबूबा मुफ्ती जब मंदिर पहुंचीं तो उनके साथ आए लोगों ने मंदिर में “नारा ए तकबीर- अल्लाह हू अकबर” के नारे लगाए। इससे भी हैरानी की बात यह है कि महबूबा ने इस नारे पर कोई भी आपत्ति नहीं जताई। और इस नारे को लेकर कहीं पर चर्चा भी नहीं है कि मंदिर के बाहर यह नारा क्यों लगाने की जरूरत आन पड़ी?
क्या मंदिरों को अभी भी महबूबा मुफ्ती के लोग नारा – ए – तकबीर के अंतर्गत ही लाना चाहते हैं?
महबूबा मुफ्ती का कश्मीरी पंडितों ने विरोध भी किया। मगर जिस बात का मीडिया, राजनीतिक हलकों और कश्मीरी पंडितों और सोशल मीडिया पर हो रहा है, वह है कश्मीरी पंडितों से उनका अतीत भूलने की बात करना।एक्स पर उनकी पोस्ट है जिसमें उन्होंने लिखा कि “कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों के बीच की गर्मजोशी और अपनापन, अविश्वास और बंटवारे की उन दीवारों से कहीं ऊपर है जिन्हें कुछ लोगों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए खड़ा करने की कोशिश की है।“
महबूबा यह तो लिख रही हैं कि कुछ लोगों ने निजी स्वार्थ के लिए बंटवारे की दीवार खड़ी की, मगर वे उन कुछ लोगों का नाम नहीं बता रही हैं? कौन हैं वे लोग, जिन्होंने ऐसा किया है? क्या महबूबा कभी भी अपने पिता का नाम ले सकेंगी, जिनके कारण आतंकवादी छोड़े गए थे? वे कौन से लोग थे, जिनके कारण कश्मीरी पंडितों को अपने घर और सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा था?
वे कौन सी ताकते थीं, जिन्होंने हिन्दुओ के खिलाफ मस्जिदों से नारे लगवाए थे और यहां तक कहा था कि “कश्मीरी पंडित लड़कियां चाहिए”! गिरिजा टिक्कू को जिंदा चीरने वाली कौन सी ताकत थी ? महबूबा यह बताने में पूरी तरह से नाकाम हैं, कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो बंटवारे की दीवार खड़ी कर रहे हैं? क्योंकि कश्मीरी पंडितों को जिन्होंने मारा, उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत महबूबा में क्या, किसी भी कश्मीरी मुस्लिम नेता में नहीं है? और हर बार कथित भाईचारे के नाम पर कश्मीरी पंडितों की पीड़ा पर नमक ही छिड़का जाता है।
भूल जाएं अतीत
महबूबा ने आगे पोस्ट में लिखा कि “अब समय आ गया है कि हम अतीत की कैद से बाहर निकलें और एक साझे भविष्य के लिए काम करें। घाटी के बाहर इलाज कराने वाले अनगिनत कश्मीरियों का स्वागत कश्मीरी पंडित डॉक्टर करते हैं और उनकी देखभाल करते हैं। सुशील राजदान, यू. कौल और समीर कौल जैसे डॉक्टर भी उतने ही प्रेरणादायक हैं, जो कश्मीर में मरीजों की सेवा कर रहे हैं, खासकर उन लोगों की जो इलाज के लिए कहीं और नहीं जा सकते।”
महबूबा ही क्या कोई भी नेता यह बताने को तैयार नहीं है कि अतीत कि कैद से कैसे बाहर आया जा सकता है? क्योंकि अतीत तो बार-बार वर्तमान बनकर सामने ही आ रहा है। कश्मीर में क्या कश्मीरी पंडितों के घर वापस मिल गए हैं? क्या उनका स्वागत हो सकता है? या फिर कहें कि क्या यासीन मलिक और बिट्टा कराटे जैसे लोगों के खिलाफ महबूबा बोल सकती हैं?
क्या गिरिजा टिक्कू को भूल जाएं
लाखों लोगों की हत्याएं हुई हैं। उनका जीनोसाइड हुआ है? अतीत को कैसे कोई वह समुदाय भूल सकता है, जिसके अतीत को अभी तक स्वीकार ही नहीं किया गया? अतीत को न्याय ही नहीं मिला है। अभी तक तो यह स्वीकारा ही नहीं गया है कि कश्मीरी पंडितों के साथ जेनोसाइड हुआ है। जब अपराध को स्वीकारा ही नहीं गया है, तो किसी भी समुदाय से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह सब कुछ भूल जाएगा? क्या बिट्टा कराटे पर कभी खुलकर बात हो सकेगी, जिसने खुलेआम यह स्वीकार किया था कि उसने कई पंडितों की हत्या की थी? या फिर यासीन मलिक पर ही बात हो सकेगी? क्या यह स्वीकार किया जा सकेगा कि गिरिजा टिक्कू को जिंदा ही आरे से चीर दिया गया था? क्या नादिमार्ग गाँव में हुए 24 कश्मीरी पंडितों के कत्ले आम को स्वीकार किया जा सकेगा?
उसी अतीत को व्यक्ति या समुदाय भूलने या विस्मृत करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाता है, जहां पर उसके साथ न्याय हो गया हो, या फिर कम से कम उसके साथ जो हुआ, उसे स्वीकार तो किया गया हो? कश्मीरी पंडितों के साथ पहले तो अन्याय की हर सीमा पार की गई। उन्हें मारा गया, उन्हें उनकी भूमि से विस्थापित किया गया। उनके हत्यारों का “आजादी के सिपाही” कहकर महिमामंडन किया गया और आज भी किया जाता है और उसके बाद उन्हीं के मंदिर में जाकर नारा ए तकबीर के बीच उन्हीं से यह कहा जाता है कि “अतीत को भूल जाएं!”
क्या कभी यासीन मलिक और बिट्टा कराटे जैसों को सजा जैसी भी बातें होंगी या फिर कश्मीरी पंडितों के घावों पर नमक छिड़का जाता रहेगा?

















