
प्रतीकात्मक तस्वीर
किशनगंज। सीमांचल की धरती अब केवल सीमाओं की संवेदनशीलता के लिए नहीं, बल्कि भारत की नई रणनीतिक ताकत के केंद्र के रूप में पहचानी जाने वाली है। बिहार का सीमावर्ती जिला किशनगंज, जो सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी भारत के बेहद महत्वपूर्ण ‘चिकन नेक’ क्षेत्र का हिस्सा है और बांग्लादेश सीमा के करीब स्थित है, आने वाले वर्षों में देश की सुरक्षा और विकास की एक बड़ी योजना का अहम हिस्सा बनने जा रहा है।
पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले इस संकरे लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण भूभाग को सुरक्षित और मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐसी परियोजना की नींव रखी है, जो आने वाले दशकों में भारत की सामरिक क्षमता को नई दिशा दे सकती है।
भारतीय रेलवे अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी सुरक्षा आधारित रेल परियोजनाओं में से एक को आकार देने जा रहा है। करीब 51 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना के तहत पश्चिम बंगाल के कुमेदपुर से आमबाड़ी फालाकाटा के बीच अत्याधुनिक भूमिगत डबल रेलवे लाइन का निर्माण किया जाएगा।
यह सिर्फ एक रेल लाइन नहीं होगी, बल्कि देश की सुरक्षा कवच का एक नया अध्याय होगी। युद्ध, आपातकाल या किसी भी संकट की स्थिति में पूर्वोत्तर राज्यों तक सेना, सैन्य उपकरणों और आवश्यक रसद की तेज एवं सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने में यह कॉरिडोर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
‘चिकन नेक’ करीब 20 से 25 किलोमीटर चौड़ा वह रणनीतिक गलियारा है, जो पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों को देश के शेष हिस्सों से जोड़ता है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन की सीमाओं के नजदीक होने के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी गंभीर संघर्ष की स्थिति में यदि इस गलियारे की आवाजाही प्रभावित होती है तो पूर्वोत्तर भारत से संपर्क पर असर पड़ सकता है। इसी चुनौती को देखते हुए भूमिगत रेल परियोजना को भविष्य की सुरक्षा जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जा रहा है।
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अनुसार यह परियोजना लगभग 170 किलोमीटर लंबी होगी। इसमें करीब 124.32 किलोमीटर हिस्सा पश्चिम बंगाल के मालदा और जलपाईगुड़ी क्षेत्र से होकर गुजरेगा, जबकि 45.68 किलोमीटर हिस्सा बिहार के कटिहार और किशनगंज क्षेत्र को जोड़ेगा। महाराष्ट्र की मोनार्क एजेंसी को भू-तकनीकी अध्ययन और टनल डिजाइन का जिम्मा सौंपा गया है। दिसंबर 2024 में सर्वे का कार्य आदेश जारी किया गया था और परियोजना को वर्ष 2033 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
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यह परियोजना सामान्य रेल व्यवस्था से पूरी तरह अलग होगी। इसे भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जा रहा है। अत्याधुनिक टनल बोरिंग मशीनों (TBM) के जरिए दोहरी सुरंगों का निर्माण होगा। पूरी संरचना को ब्लास्ट-प्रूफ और आपदा-रोधी बनाने की योजना है, ताकि किसी भी हमले या प्राकृतिक चुनौती के बावजूद रेल संचालन को सुरक्षित रखा जा सके।
इसमें आधुनिक 2×25 केवी एसी विद्युतीकरण, ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम, हाई स्पीड ऑप्टिकल फाइबर संचार नेटवर्क और 25 टन एक्सल लोड क्षमता वाले पुल जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं शामिल होगी।
इस परियोजना का असर केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। किशनगंज, ठाकुरगंज, गलगलिया और आसपास के क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग और माल परिवहन से जुड़े नए अवसर पैदा हो सकते हैं। बेहतर रेल कनेक्टिविटी से औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं। सीमांचल का यह क्षेत्र, जो अब तक अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण चुनौती के रूप में देखा जाता था, आने वाले समय में रणनीतिक और आर्थिक शक्ति के नए केंद्र के रूप में उभर सकता है।
भूमिगत रेल सुरंगों का सबसे बड़ा महत्व संकट के समय सामने आएगा। ऐसी संरचनाएं युद्ध या आपदा जैसी परिस्थितियों में सुरक्षित परिवहन मार्ग उपलब्ध करा सकती हैं। रक्षा बलों के लिए यह कॉरिडोर सैन्य सामग्री, हथियार प्रणालियों और जरूरी संसाधनों की तेज आवाजाही में मददगार साबित हो सकता है। भविष्य में यह क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा के एक मजबूत आधार के रूप में देखा जा सकता है।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी कई अवसरों पर चिकन नेक क्षेत्र की सुरक्षा और बेहतर कनेक्टिविटी की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। यह परियोजना भारतमाला और एक्ट ईस्ट पॉलिसी जैसी राष्ट्रीय रणनीतियों से जुड़ी हुई है, जिसका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत को विकास और सुरक्षा दोनों स्तरों पर मजबूत बनाना है। किशनगंज की धरती पर अब एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। जहां कभी सीमावर्ती संवेदनशीलता चुनौती थी, वहीं आने वाला समय इसे भारत की रणनीतिक शक्ति और विकास के प्रवेश द्वार के रूप में पहचान दे सकता है।