सेंट्रल यूनिवर्सिटी जामिया मिलिया इस्लामिया (Jamia Millia Islamia) में प्रशासनिक और धार्मिक प्रताड़ना का विवाद नया मोड़ ले चुका है। विश्वविद्यालय के पीड़ित कर्मचारी राम फूल मीणा द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत अब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) तक पहुंच गई है। पीड़ित कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि परिसर में उनके साथ न केवल जातिसूचक और धार्मिक दुर्व्यवहार हुआ बल्कि न्याय मांगने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके खिलाफ ही दंडात्मक कार्रवाई करते हुए उनका तबादला कर दिया।
इस मामले के राष्ट्रीय आयोग तक पहुंचने के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के भीतर अनुसूचित जनजाति (ST) के कर्मचारियों सहित अन्य कर्मचारियों की सुरक्षा, जातिगत भेदभाव, धार्मिक उत्पीड़न और आंतरिक जांच समितियों की निष्पक्षता को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है।
पीड़ित ने एनसीएसटी से लगाई मदद की गुहार
जामिया मिलिया इस्लामिया के यूनिवर्सिटी पॉलिटेक्निक में अपर डिवीजन क्लर्क के पद पर कार्यरत राम फूल मीणा ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष एक विस्तृत प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर) पेश किया है। इस शिकायत के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन में हड़कंप मच गया।
पीड़ित कर्मचारी का आरोप है कि लगभग चार महीने पहले उन्होंने एक फैकल्टी मेंबर के खिलाफ जातिसूचक दुर्व्यवहार और शारीरिक हमले की लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोषी पर कार्रवाई करने के बजाय, खुद शिकायतकर्ता को ही उनके मूल कार्यस्थल से हटाकर एक ऐसी जगह भेज दिया, जिसे वे ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ (सजा के तौर पर स्थानांतरण) बता रहे हैं।
राम फूल मीणा ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यूनिवर्सिटी पॉलिटेक्निक से ‘बालक माता सेंटर’ में उनका स्थानांतरण कोई प्रशासनिक आवश्यकता नहीं थी बल्कि यह एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें चुप कराने और प्रताड़ित करने के उद्देश्य से उठाया गया एक प्रतिशोधात्मक कदम था। उन्होंने आयोग से मांग की है कि इस पूरे मामले की एक स्वतंत्र जांच कराई जाए, उनकी मूल पोस्टिंग को बहाल किया जाए और दोषियों के खिलाफ ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत कड़ी कार्रवाई की जाए।
कैसे शुरू हुआ ये विवाद?
दिल्ली पुलिस को 17 जनवरी 2026 को सौंपी गई आधिकारिक शिकायत के अनुसार, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब छात्रों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन के खिलाफ एक शिकायत दर्ज की गई थी। राम फूल मीणा का कहना है कि वे उस शिकायत में सीधे तौर पर शामिल नहीं थे लेकिन उससे जुड़े एक वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद डॉक्टर रियाजुद्दीन को शक हुआ और उन्होंने मीणा को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया।
शिकायत के मुताबिक, पहली घटना 13 जनवरी 2026 को हुई जब आरोपी प्रोफेसर ने राम फूल मीणा के दफ्तर में घुसकर उन्हें जातिसूचक अपशब्द कहे। मीणा ने तुरंत इसकी लिखित सूचना विश्वविद्यालय प्रशासन को दी। इसके तीन दिन बाद यानी 16 जनवरी 2026 को यह विवाद बेहद हिंसक रूप में बदल गया।
दोपहर के समय आरोपी प्रोफेसर दोबारा मीणा के केबिन में घुसा और चिल्लाते हुए कहा, ‘तुम्हारी औकात कैसे हुई कि तुमने मेरे खिलाफ शिकायत की?’ इसके तुरंत बाद दुर्व्यवहार ने जातिगत और धार्मिक रूप ले लिया। शिकायत में दर्ज बयानों के अनुसार, पीड़ित को धमकाते हुए आरोपी मुस्लिम कर्मचारी ने कहा, ‘तुम सा.. आदिवासी जंगली हो, मुसलमानों के इदारे (संस्थान) में रहकर मेरे खिलाफ शिकायत करने की जुर्रत कैसे की?’
जब मीणा ने इस अपमानजनक भाषा का विरोध किया तो प्रोफेसर ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। आरोप है कि प्रोफेसर ने उनके चेहरे पर कई घूंसे मारे, जिससे उनके होंठ कट गए और आंख के नीचे गंभीर सूजन आ गई। घटना के बाद पीड़ित ने जामिया के ‘अंसारी स्वास्थ्य केंद्र’ में अपना प्राथमिक इलाज कराया और मेडिकल दस्तावेजों को अपनी एफआईआर (FIR) और शिकायत के साथ संलग्न किया है।
‘मुझे काफिर कहा गया और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया’
राम फूल मीणा ने न केवल जातिगत प्रताड़ना बल्कि विश्वविद्यालय के भीतर धार्मिक उत्पीड़न का भी आरोप लगाया है। एनसीएसटी को दिए गए दस्तावेजों में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्हें परिसर के भीतर बार-बार ‘काफिर’ कहकर प्रताड़ित किया जाता था।
मीणा का आरोप है कि उन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस्लाम अपनाने के लिए लगातार दबाव डाला जा रहा था। उन्होंने कहा कि उनके साथ हो रहा यह हिंसक और प्रशासनिक दुर्व्यवहार असल में इस बात का परिणाम है कि उन्होंने धर्म परिवर्तन करने से साफ इनकार कर दिया था और वे अपनी हिंदू पहचान के साथ वहां काम कर रहे थे।
पहले भी सामने आ चुके हैं मामले
- जुलाई 2024 में एक दलित कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने उससे कहा था कि यदि वह इमाम लाकर कन्वर्ट हो जाता है तो उसके और उसके बच्चों के करियर को पूरी तरह सुरक्षित कर दिया जाएगा।
- इस घटना के कुछ महीनों बाद एक दिव्यांग महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया कि उसे हिजाब पहनने की सलाह दी गई और कहा गया कि ऐसा करने से उसके चेहरे पर ‘नूर’ आएगा।
- इन पुराने मामलों को लेकर विश्वविद्यालय में एक फैक्ट-फाइंडिंग जांच भी हुई थी। इसमें कई शिक्षकों और पूर्व छात्रों ने गैर-मुस्लिमों के साथ होने वाले भेदभाव की पुष्टि की थी। हालांकि, जामिया विश्वविद्यालय अपने यहां पर कन्वर्जन और जातिगत भेदभाव के खिलाफ जीरो टोलरेंस की नीति अपनाने का राग अलापता रहता है, लेकिन आलोचकों का कहना कुछ और ही है।
विश्विद्यालय प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
राम फूल मीणा ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद आलम रिजवी और उनके कार्यालय की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत के अनुसार, जब मीणा ने 13 जनवरी को पहली लिखित शिकायत रजिस्ट्रार कार्यालय में दी तो उस पर कोई सुरक्षात्मक कार्रवाई नहीं की गई। इसके विपरीत, उनकी शिकायत की गोपनीय जानकारी आरोपी प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन तक लीक कर दी गई, जिसके कारण ही 16 जनवरी को प्रोफेसर ने दफ्तर में घुसकर उन पर हमला किया।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू ट्रांसफर की टाइमिंग है। 16 जनवरी की शाम को जब मीणा ने मारपीट की शिकायत लेकर वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की तो उन्हें आश्वासन दिया गया कि मामले को सुलझाया जाएगा। लेकिन उसी शाम, कार्यालय बंद होने के समय एक आधिकारिक आदेश जारी किया गया। इसमें लिखा था कि शिकायतकर्ता राम फूल मीणा का ट्रांसफर तुरंत प्रभाव से ‘यूनिवर्सिटी पॉलिटेक्निक’ से हटाकर ‘बालक माता सेंटर’ कर दिया गया।

















