बहुआयामी वीर सावरकर : कहानियों से झलकता वैचारिक प्रबोधन
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बहुआयामी वीर सावरकर : कहानियों से झलकता वैचारिक प्रबोधन

वीर सावरकर ने कहानी को केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण और अंधविश्वास-निर्मूलन का प्रभावी उपकरण बनाया। उनकी कहानियां समाज में व्याप्त कुरीतियों, रूढ़ियों और अवैज्ञानिक मान्यताओं पर प्रहार करते हुए विज्ञाननिष्ठ दृष्टि का आग्रह करती हैं (दूसरी कड़ी)

Written byडॉ. नीरज देवडॉ. नीरज देव
Jun 12, 2026, 03:39 pm IST
in संघ @100

वीर सावरकर : (दूसरी कड़ी)

सावरकरजी ने 1925 से 1936 के दौरान लगभग 22 कहानियां लिखी थीं, जो कालांतर में ‘समाजचित्र’ या ‘अंधश्रद्धा निर्मूलक कथा’ के रूप में दो भागों में प्रकाशित हुईं। इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, भ्रांतियों तथा आत्मघाती रूढ़ी-परंपराओं से समाज को मुक्त कराना तथा विज्ञानवाद की दीक्षा देना था। वे भलीभांति जानते थे कि उपरोक्त भांतियां केवल बुद्धिवाद के प्रहार से नष्ट नहीं होंगी। यदि जनमानस को आंदोलित किया जाए, तो सामाजिक प्रबोधन अत्यंत सुगम हो जाता है; इसी कारण वे कहानी विधा का आश्रय लेते दिखाई देते हैं। सावरकर का मानना था कि अंधविश्वास और भ्रांत धारणाएं मात्र हिंदू धर्मग्रंथों या समाज तक सीमित नहीं हैं, अपितु मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सभी के समाजों में भी विद्यमान हैं। यद्यपि सावरकर का मुख्य लक्ष्य हिंदू समाज सुधार था, तथापि उनकी दो कहानियां सीधे तौर पर मुस्लिम समाज के प्रबोधन को रेखांकित करती हैं। उनकी प्रतिनिधि कहानियों के कथाबीज का अवलोकन करते हुए, कहानीकार सावरकर का संक्षिप्त समालोचन प्रस्तुत है।

‘कुसुम’ कहानी की मुख्य पात्र ‘कुसुम’ पचास वर्षीय पिता की तीसरी पत्नी से जन्मी एक दस वर्षीय मेधावी छात्रा है। शिक्षा-विरोधी पिता ने दहेज से बचने के लिए उसका बेमेल विवाह अपनी बड़ी बेटी के पैंतीस वर्षीय विधुर पति (कुसुम के जीजा) से कर दिया, जिसे समाज और पंडितों ने ‘शास्त्र-सम्मत रूढ़ि’ मानकर स्वीकार कर लिया। विवाह के शीघ्र बाद वैधव्य आने पर रूढ़िवादी समाज ने नवयौवना कुसुम के पुनर्विवाह और स्वाभाविक जीवन जीने पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया। इस क्रूर व्यवस्था और मानसिक वंचना से तंग आकर वह अपने मौसेरे भाई के प्रति आकर्षित (आलिंगनबद्ध) हो गई। पकड़े जाने पर कुसुम ने भाई पर लांछन और झूठा दोष मढ़ दिया। कुसुम का यह भटकाव और मानसिक अंतर्द्वंद्व स्त्री की स्वाभाविक भावनाओं को कुचलने वाले धार्मिक नियमों का दुष्परिणाम है, जो तत्कालीन समाज की मूक, पीड़ित बाल-विधवाओं की त्रासदी को जीवंत रूप में उजागर करता है।

अंधविश्वास पर प्रहार

‘अपघात या आत्मघात’ कहानी में अधेड़ भीमाबाई रास्ते के बरगद वृक्ष को काटने का तीव्र विरोध करती हैं। इस कार्य में उन्हें सनातनी हरिहर शास्त्री और चुनाव जीतने की फिराक में लगे अवसरवादी वकील भिंगार्डे का साथ मिलता है। भीमाबाई की अटूट श्रद्धा थी कि वटवृक्ष साक्षात देवता हैं और उसका इकलौता पुत्र इसी वटदेवता की मन्नत का फल है। वकील भिंगार्डे के उकसावे पर भीमाबाई आमरण अनशन पर बैठ जाती हैं, जिसके कारण नगर निगम वृक्ष काटने का निर्णय निरस्त कर देता है।

परंतु उसी रात भारी वर्षा के कारण वह जर्जर बरगद का पेड़ टूटकर गिर जाता है। उसके नीचे दबकर भीमाबाई और उसके इकलौते पुत्र की मृत्यु हो जाती है। यह एक बहुत बड़ा व्यंग्य है कि जिस बरगद को भीमाबाई ने बचाया, उसी के नीचे दबकर उसकी जान चली गई। इतना ही नहीं, जिस वटवृक्ष की कृपा से पुत्र का जन्म हुआ मानकर वह चल रही थीं, उसी वृक्ष के गिरने से उसके इकलौते बेटे की भी मौत हो गई। सावरकर इस मर्मस्पर्शी कहानी के माध्यम से वृक्षों को दिए जाने वाले अंधे धार्मिक महत्व और मन्नत की खोखली कल्पना पर करारा प्रहार करते हैं। इसी प्रकार, ‘गोविंदा गवली’ कहानी में वे गोविंदा और कासिम के माध्यम से क्रमशः हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अंधविश्वासों को ध्वस्त करते हैं।

अंतर्मन को झकझोरने का प्रयास

‘बाळंतीण’ (नवप्रसूता) यह कहानी एक सत्य घटना पर आधारित है, जो भ्रांत धार्मिक मान्यताओं के कारण हिंदू समाज में उपजी अमानवीयता को उजागर करती है। दस हजार हिंदू आबादी वाले एक गांव में गोसेवक गोदास सुखात्मे एक बूढ़ी, कमजोर और बांझ गाय के लिए चंदा मांगते हैं, जिसे गांव वाले भारी दान देते हैं। यहां तक कि प्रतिष्ठित वकील रामभाऊ की मां उस गाय को अपने दीवानखाने में बुलाकर पकवान खिलाती हैं। इसके विपरीत, जब उसी गांव में एक अधमरी, असहाय गर्भवती हिंदू स्त्री पहुंचती है, तो लोग उसे ‘पापिनी’ कहकर दुत्कारते हैं। रामभाऊ की मां उसे अपने घर की छांव तक में खड़ी नहीं होने देतीं और पानी तक नहीं देतीं। वह बेचारी एक सुनसान धर्मशाला में शरण लेकर अकेले ही प्रसव पीड़ा सहते हुए बच्चे को जन्म देती है, पर कोई हिंदू उसकी मदद नहीं करता।

इस स्थिति का फायदा उठाकर एक मुसलमान व्यक्ति उस नवप्रसूता पर नजर रखता है। वह उसे खाना देकर इस्लाम अपनाने के लिए फुसलाता है, और मना करने पर उसे डराता-धमकाता-मारता भी है, लेकिन पूरा हिंदू समाज मूकदर्शक बना रहता है। अंततः रत्नागिरी हिंदू सभा उस पीड़ित महिला को आश्रय देकर जबरन मुसलमान बनने से बचाती है। लेखक ने अनुपयोगी गाय के प्रति अंधभक्ति और एक नवप्रसूता मां के प्रति घोर क्रूरता के इस मर्मभेदी विरोधाभास से समाज के अंतर्मन को झकझोरने का प्रयास किया है।

‘प्रार्थना’ कहानी की शुरुआत में विमल मकड़ी का जाला साफ कर देती है। उसे इस बात का पछतावा तो दूर, याद तक नहीं रहती। उसकी छोटी बेटी बाबी ताश के पत्तों का घर बनाती है और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती है कि उसका यह घर उसकी हवेली की तरह हमेशा सुरक्षित रहे। वहीं उसकी दादी भी ईश्वर से प्रार्थना कर सबका भला होने की कामना करती है। इतना ही नहीं, नगर के सभी मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों से प्रार्थना, नमाज और प्रेयर के स्वर गूंजते रहते हैं। सभी लोग अपने और अपने परिवार के लिए दुआ मांगकर सो जाते हैं।

लेकिन अचानक आए एक भीषण भूकंप में सब कुछ तहस-नहस हो जाता है। जिस प्रकार मनुष्य ने मकड़ी का जाला तोड़ा था और उसे इसका कोई मलाल या याद तक नहीं थी, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड के ईश्वर ने बाबी का ताश का घर और दादी की हवेली को एक ही झटके में नष्ट कर दिया। इस आपदा में दादी और बाबी दोनों का करुण अंत हो जाता है, लेकिन विश्व के रचयिता को इस बात का न तो कोई पछतावा होता है और न ही इसकी याद रहती है। सावरकर ‘प्रार्थना मानव की आशा हो सकती है, आशापूर्ति की गारंटी नहीं’ कहकर इस कहानी का अंत करते हैं।

आलोचना और मूल्यांकन

सावरकर की अन्य कहानियां भी सूतक और छुआछूत, ग्रहों-उपग्रहों को देवता मानकर पूजने की रूढ़ियों, तथा ‘देवत्व बनाम इंसानियत’ (माणुसकी) पर तीखा प्रहार करती हैं। उनकी एक कहानी इतिहासकारों के तथाकथित शोध की खिल्ली उड़ाती है। ‘शेंदाडपूरचा शिवाजी उत्सव’ यह कहानी व्यंग्य और उपहास का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। साथ ही सावरकर की दो कहानियां यह स्पष्ट करती हैं कि हिंदुओं को वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए व्रत-नियम कैसे करनी चाहिए। कैसे उन्हें राष्ट्रकल्याण व हिंदू संगठन को केंद्र में रखकर इनका पालन करना चाहिए।

सावरकर की कहानी विधा पर विभिन्न समीक्षकों ने कई महत्वपूर्ण आक्षेप किए हैं। ग. वि. केतकर सावरकर की कहानियों को कहानी के बजाय ‘समाजचित्र’ के रूप में देखना अधिक पसंद करते हैं। म. ना. अदवंत के अनुसार, “सावरकर की अधिकांश कहानियों में उनके भीतर का निबंधकार जाग उठता है, जिसके कारण उनकी लघुकथा संवादात्मक निबंध का एक विस्तृत रूप लेने लगती है।” (सावरकर विविध दर्शन पृ. 174) इसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए सावरकर-साहित्य के शोधकर्ता डॉ. प्र. ल. गावंडे प्रतिपादित करते हैं कि, ‘सावरकर की कहानियां निबंध और लघुकथाओं की सीमा रेखा से गुजरती हुई नजर आती हैं। अतः उसे निबंधसदृश कहानी या कहानीसदृश निबंध कहना चाहिए।’

आलोचकों का यह भी आरोप है कि सावरकर पारंपरिक कहानी-तंत्र का पालन नहीं करते, क्योंकि तटस्थ रहने के बजाय वे कभी-कभी स्वयं कहानी में प्रकट हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में कल्पना-विलास और मनोरंजन की कमी है और वे कहानियां कम, विचारों का प्रचार अधिक लगती हैं।

इन आलोचनाओं के परिप्रेक्ष्य में प्रसिद्ध समीक्षक एवलिन अलब्राइट का यह मत अत्यंत प्रासंगिक है कि, ‘किसी भी कहानी पर लेखक के व्यक्तित्व का प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। यह प्रभाव कहानी के उद्देश्य, लालित्य, अभिप्राय, भावुकता और चरित्र-चित्रण आदि पर साफ दिखाई देता है।’ चूंकि सावरकर का संपूर्ण जीवन राष्ट्रहित को समर्पित था, इसलिए उनकी कहानियों में यह समर्पण और वैचारिक प्रबोधन स्वाभाविक रूप से झलकता है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि वीर सावरकर की कहानियों को पारंपरिक कहानी-कला के संकुचित पैमानों या शास्त्रीय नियमों से नहीं मापा जा सकता। उन पर लगे ‘वैचारिक प्रचार’ या ‘निबंधसदृश संरचना’ के आक्षेप कलात्मक दृष्टि से भले ही प्रासंगिक लगें, किंतु सावरकर का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन या विलासपरक साहित्य सृजन करना कभी नहीं था। वे एक युगद्रष्टा और ध्येयवादी लेखक थे, जिनके लिए साहित्य राष्ट्र-जागृति और समाज-सुधार का एक सशक्त माध्यम था।

एवलिन अलब्राइट के सिद्धांतानुसार, सावरकर के विराट और राष्ट्र-समर्पित व्यक्तित्व की छाप उनकी कथा-विधा पर पड़ना अनिवार्य था। उन्होंने कहानी के स्थापित ‘तंत्र’ (Form) का अंधानुकरण करने के बजाय, अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति के अनुकूल एक नए ‘तंत्र’का निर्माण किया। जहां पात्र केवल व्यक्ति न होकर विचारों के संवाहक बनते हैं और कथानक मनोरंजन के बजाय तत्व-चिंतन की नींव पर खड़ा होता है। इस संदर्भ में म. ना. अदवंत का यह अभिप्राय बिल्कुल सटीक बैठता है कि सावरकर स्थापित तंत्र के बंधक नहीं, बल्कि ‘तंत्र-निर्माता’ थे, और इसी आधार पर उनकी कहानियों का मूल्यांकन होना चाहिए।

अंततः, सावरकर की कहानियां शास्त्रीय लघुकथाओं की सीमा को लांघकर एक जीवंत ‘समाजचित्र’ और ‘वैचारिक दस्तावेज’ बन जाती हैं। म. ना. अदवंत और डॉ. प्र. ल. गावंडे के निष्कर्षों के आलोक में यह निर्विवाद है कि सावरकर की कथा-सृष्टि को समझने के लिए साहित्य-शास्त्र के पारंपरिक आग्रहों को छोड़कर, उनके राष्ट्र-प्रथम के दृष्टिकोण और सिद्धांत-प्रतिपादन के महान उद्देश्य को स्वीकार करना होगा। तभी सावरकर के कहानीकार-रूप के साथ सच्चा न्याय किया जा सकता है।हैं। इसी कारण साहित्यकार सावरकर कालजयी सिद्ध होते हैं।

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डॉ. नीरज देव
डॉ. नीरज देव
(दशग्रंथी सावरकर इस पीएचडी समकक्ष उपाधि से तथा महाराष्ट्र शासन-विवेक व्यासपीठ द्वारा ‘सावरकर वीरता’ पुरस्कार से सन्मानित) [Read more]
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