झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या पर मेरे बयान से काफी हंगामा हुआ। अपना धर्म बदल चुके कई लोग इस बात से परेशान हैं कि मैंने सिर्फ चर्च की बात की, मंदिरों की नहीं। चलिए, आज इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं।
झारखंड के अधिकतर गांवों में आदिवासी-मूलवासी एक साथ रहते हैं। हमारे गांवों में हजारों सालों से जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान है और सनातन समाज के मंदिर भी, जिनमें मूलवासी पूजा करते हैं। आदिवासी-मूलवासी दोनों समुदाय एक-दूसरे के पूजा स्थलों में सिर झुकाते हैं, एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में शामिल होते हैं और दोनों सबकी आस्था का सम्मान करते हैं।
इसके अलावा दिउड़ी मंदिर, रंकिणी मंदिर जैसे कई मंदिर हैं, जहां आदिवासी समाज के पाहन पुजारी की भूमिका में होते हैं, और सनातनी लोग भी वहां पूजा करते हैं। ठीक उसी प्रकार, हम भी उनके पर्व-त्योहारों में शामिल होते हैं। लेकिन एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों एवं परंपराओं का यह परस्पर सम्मान हमारी आस्था, हमारी जीवनशैली को कभी नहीं बदलता।
हम आदिवासी पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने वाले लोग हैं, और जन्म से लेकर शादी-विवाह एवं मृत्यु तक, हमारी बिल्कुल स्पष्ट जीवनशैली है। बच्चे के जन्म, नामकरण, विवाह समेत जीवन के सभी महत्वपूर्ण पड़ावों पर, हमारी सामाजिक प्रक्रियाएं मांझी परगना/ नायके/ पाहन/ मानकी/ मुंडा/ पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर हम जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान जाकर मरांग बुरु/ सिंगबोंगा की पूजा करते हैं।

हजारों सालों के इस सामाजिक सह-अस्तित्व में हम लोग एक-दूसरे के हर सुख-दुख के साथी बने, यथासंभव सहयोग किया, लेकिन उन्होंने कभी हमें हमारी आस्था या जीवनशैली बदलने के लिए मजबूर नहीं किया। अभी धर्मांतरण की रफ्तार देखकर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो शायद हमारी संस्कृति बहुत पहले खत्म हो गई होती।
हजारों सालों के हमारे इतिहास में, आपको ऐसा कोई भी मूलवासी/ सनातनी नहीं मिलेगा, जिसने किसी मदद, सहायता या सहयोग के बदले, अथवा हमें लालच/ धमकी देकर हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की हो। वे कभी स्वयं को आदिवासी नहीं बताते। वे लोग आरक्षण समेत हमारे समाज को मिले अन्य अधिकारों को छीनने अथवा उसमें अतिक्रमण करने का भी प्रयास नहीं करते, तो फिर उनसे कैसा बैर?
दूसरी तरफ, इस क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों ने 1845 में प्रचार शुरू किया, लेकिन मात्र 180 वर्ष में इन्होंने हमारी परंपराओं एवं धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाई, आरक्षण पर कब्जा किया, भाषाओं/ लिपियों का विरोध किया तथा हमारे अस्तित्व को मिटाने की हर संभव कोशिश की। हमारे लाखों लोगों का धर्मांतरण करके इन्होंने ऐसे हालात बना दिए हैं कि सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में हमारे जाहेरस्थानों/ सरना स्थलों पर ताला लग चुका है, क्योंकि वहां धर्मांतरण की वजह से पूजा करने वाला कोई नहीं बचा।
आदिवासी समाज की पहचान पारंपरिक जीवनशैली, विशिष्ट संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज एवं रूढ़िजन्य परम्पराओं से है, लेकिन ये लोग उसे मिटाने में लगे हुए हैं। ये लोग डीएनए की बात करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इन्हीं मिशनरियों की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में आदिवासी संस्कृति विलुप्त हो गई। लैटिन अमेरिका की अयोरेओ जनजाति, केन्या की संबुरु जनजाति, ब्राजील की वाई वाई जनजाति, फिजी और पैसिफिक आइलैंड्स की जनजातियां धर्मांतरण के बाद अपनी मूल संस्कृति को भूल चुकी हैं। उनके पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और सामाजिक संरचनाएं खत्म कर दी गईं। आप खुलकर क्यों नहीं कहते कि भारत में भी आपका असली मकसद यही है?
धर्मांतरण कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे समाज के अस्तित्व से जुड़ा मामला है। अगर धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, वीर सिद्धो-कान्हू, वीर पोटो हो, वीर टाना भगत, वीर तेलंगा खड़िया एवं अन्य मार्गदर्शकों के दिखाए रास्ते पर चलते हुए हम लोग अपनी परंपराओं को नहीं बचाएंगे, तो भविष्य में हमारे जाहेरस्थानों, सरना स्थलों, देशाउली आदि में पूजा करने वाला कोई नहीं बचेगा। हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
सिर्फ किसी धार्मिक स्थल पर सिर झुकाने से किसी का धर्म नहीं बदलता, उसके लिए पूरी जीवनशैली बदलनी पड़ती है। लेकिन ईसाई मिशनरियों के दलाल दिन भर रटते रहते हैं कि यहां आदिवासियों को हिन्दू बनाया जा रहा है। यह एक झूठा नैरेटिव है, जिसकी आड़ में भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर ये लोग धर्मांतरण का खेल खेलते हैं। अगर उन्हें आदिवासियों की इतनी ही चिंता होती, तो वे अपनी परंपराओं को छोड़कर विदेशी धर्म की गोद में नहीं बैठते। आदिवासियत की जड़ खोद रहे ऐसे लोगों को हमारे समाज के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है।
एक बात और, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत ईसाई समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाता है। ये लोग इसे बखूबी जानते हैं और इनके सभी शैक्षणिक संस्थान खुद को माइनॉरिटी संस्थान भी लिखते हैं। लेकिन स्वयं को माइनॉरिटी बताने वाले यही लोग चुनाव लड़ते अथवा नौकरी लेते समय आदिवासी बन जाते हैं। ऐसा कहीं होता है क्या?
अगर आपने धर्म बदल लिया है, तो खुशी से अपनी नई पहचान (अल्पसंख्यक) के साथ रहिए। हमें कोई दिक्कत नहीं है। उससे संबंधित लाभ भी लीजिए, लेकिन संविधान द्वारा हम आदिवासियों को दिए गए आरक्षण एवं अधिकारों में अतिक्रमण मत कीजिए। झारखंड में हजारों चर्च होने के बयान पर बवाल मचाने वाले लोग यह बताएं कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट की कौन-सी धारा आदिवासियों की जमीन को अल्पसंख्यकों को ट्रांसफर करने का अधिकार देती है? आप भले ही खुद को आदिवासी बताएं, लेकिन चर्च/ गिरजाघर विशुद्ध तौर पर अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल हैं। वे किसकी जमीन पर बने हैं, और किसकी अनुमति से? उन्हें जमीन किस प्रावधान के तहत दी गई? इसकी जांच होनी चाहिए।
महात्मा गांधी आदिवासियों को गिरिजन कहा करते थे। क्या किसी ने उनका विरोध किया? भगवान श्रीराम को वनवास मिला था, तो वे भी वनवासी थे, फिर यह शब्द गलत कैसे हो गया? कई समुदायों के लोग हमें अलग-अलग नामों से पुकारते हैं, तो क्या उससे आपके अस्तित्व पर कोई फर्क पड़ता है? आप जो हैं, वही रहते हैं।
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने स्पष्ट किया है कि यूसीसी लागू करने के दौरान आदिवासी समाज को इससे बाहर रखा जा रहा है, ताकि हमारी रूढ़िजन्य परम्पराओं एवं विशिष्ट जीवनशैली का संरक्षण हो सके। हजारों वर्ष पुरानी हमारी जीवनशैली के संरक्षण तथा संवर्धन की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन अगर धर्मांतरण नहीं रुका, तो धीरे-धीरे सब कुछ खत्म हो जाएगा, कोई भी कानून हमारे समाज को बचा नहीं पाएगा।
इसलिए आदिवासी समाज की ओर से हम लोग केन्द्र सरकार से मांग करते हैं कि वह डीलिस्टिंग द्वारा अथवा अनुच्छेद 342 में जरूरी बदलाव करके आदिवासियों के अस्तित्व पर आए इस संकट का समाधान करे।












