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रामायण सत कोटि अपारा : जनजातियों के आराध्य राम

आज भारत विरोधी कुछ तत्व यह कहते हैं कि 'जनजातीय हिंदू नहीं हैं।' ऐसे लोगों को स्वयं जनजाति समाज के लोग और गीत बता रहे हैं कि उनमें श्रीराम के प्रति कितनी श्रद्धा है। जनजाति समाज के बीच राम केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि मानव, वीर, बंधु, लोकनायक और कभी-कभी एक सहज ग्रामीण के रूप में भी प्रकट होते हैं

Written byरवि कुमाररवि कुमार
Mar 16, 2026, 11:21 pm IST
in भारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, छत्तीसगढ़

राम आव्या जंगल मां, लक्ष्मण संग चाल्या।
शबरी माय बेर लई, प्रेम थी थाल भराल्या॥
मीठा बेर चाखी-चाखी, राम ने अर्पण काया।
जात न पूछे रामजी, प्रेम देख राजी थाया॥

उपरोक्त गीत भील जनजाति में गाया जाने वाला भीली लोकभाषा का गीत है, जो वहां विवाह आदि प्रसंग पर गाया जाता है। इस प्रसंग में शबरी माता व श्रीराम का उल्लेख है। रामकथा भारत की सांस्कृतिक परम्परा का जनजातीय आधार भी है। जनजाति क्षेत्रों में रामकथा लिपिबद्ध नहीं है। उसका स्वरूप मौखिक है। रामकथा का यह मौखिक स्वरूप श्रुति-स्मृति के आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। जनजाति समाज ने राम को वन का नायक माना है। अलग-अलग जनजाति में रामकथा के अलग-अलग प्रसंग प्रचलित हैं। सम्पूर्ण रामकथा किसी जनजाति में प्रचलित है, ऐसा कहना संभव नहीं होगा और इसे खोज पाना भी अत्यंत दुर्लभ है।

रामकथा की मौखिक-वाचिक परम्परा

मौखिक-वाचिक स्वरूप में रामकथा भारत के जनजाति समाज में व्याप्त होकर भारत की सांस्कृतिक परम्परा को आगे बढ़ाती है और वहां के समाज में जीवन-मूल्यों को खड़ा करती है। रामकथा से उपजे व जनजाति समाज में व्याप्त हुए जीवन मूल्य सर्वदूर अभिव्यक्त हो रहे हैं। रामकथा का यह स्वरूप वहां की स्थानीय लोकभाषा/बोली में विभिन्न अवसरों पर गए जाने वाले गीतों, भजनों, नृत्य गीतों, कथा प्रसंगों, दन्त कथाओं, नाटकों, धार्मिक अनुष्ठानों आदि रूपों में प्रकट होता है। मूलतः जनजाति समाज धर्म परायण है। मातृभूमि के प्रति उसके मन में गहरा लगाव है। भारत भक्ति उसके कण-कण में व्याप्त है। वह प्रकृति का पूजक व संवर्धक है। यह धर्म-परायणता, मातृभूमि-प्रेम, भारत-भक्ति, प्रकृति-संवर्धन का स्रोत राम कथा ही है, ऐसा कहा जाए तो अतिशयोक्तिनहीं होगी।

रामकथा की विविधता

जनजातीय क्षेत्रों में रामकथा ने स्थानीय जीवनशैली, संस्कृति, भाषा और संवेदना के अनुरूप स्वरूप ग्रहण किया है। इन क्षेत्रों में राम केवल एक ईश्वर नहीं, बल्कि मानव, वीर, बंधु, लोकनायक और कभी-कभी एक सहज ग्रामीण के रूप में भी प्रकट होते हैं। गोंड समाज में राम वीर पुरुष हैं। वे गोंड परंपरा के ‘संघर्षशील योद्धा’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सीता को ‘धरती की पुत्री’ और राम को ‘वन का रक्षक’ कहा जाता है। उरांव समाज में राम न्यायप्रिय राजा हैं।

यहां शबरी प्रसंग विशेष रूप से लोकप्रिय है, जिसमें शबरी को ‘माता’ के रूप में सम्मानित किया जाता है। राम वनवासी नहीं, ‘जनप्रिय अतिथि’ के रूप में आते हैं। रामकथा संथाल लोकगीतों में ‘सोहराय’ पर्व के समय गाई जाती है। भीलों की रामकथा में राम वन का अतिथि नहीं, बल्कि भील समाज का सदस्य है। निषादराज और शबरी प्रसंग को विशेष महत्व दिया गया है। कोलाम समाज राम को ‘रामा’ नाम से पुकारता है। उनकी कथा में सीता और लक्ष्मण के पात्र गौण हैं, जबकि राम का संघर्षपूर्ण जीवन केंद्रीय बिंदु होता है। कोया जनजातियों में राम और सीता की पूजा जंगल के देवता और देवी के रूप में की जाती है। राम को ईश्वर नहीं, बल्कि लोक रक्षक के रूप में माना जाता है।

डांग समाज में रामलीला ‘डांग दरबार’ के समय होती है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्सव होता है। बैगा जनजाति की रामकथा में लव-कुश की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। लव-कुश को स्वतंत्र योद्धा, लोकनायक और अपनी मां के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। राभा जनजाति समाज में भारीगान के नाट्य मंचन में ‘रावण वध’ और ‘लक्ष्मणार शक्तिसेल’ सम्मिलित हैं। इन दोनों कथाओं में राम की सामाजिक जिम्मेदारी अपने अनुगामियों के प्रति स्नेह और देशभक्ति को प्रस्तुत किया जाता है। मिजो रामकथा में अपनी अलग कथावस्तु है, जो वाल्मीकि रामायण का सारांश ग्रहण करती है, परंतु उसमें वन्य तत्व अधिक विद्यमान हैं।

रामकथा इन नामों से प्रचलित

राजस्थान तथा गुजरात के भीलांचल में ‘राम-सीतामानी वारता’ के नाम से रामकथा की वाचिक परंपरा रही है। ‘भीलों के भारथ’ की ही तरह से इस कथा का संकलन भगवानदास पटेल ने किया है। इसमें कुल तीस सर्ग हैं। मुण्डारी रामायण पूर्वी भारत की मुंडा जनजाति में रामकथा का एक अनूठा रूपभेद है। यह मुंडारी साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा को समृद्ध करता है। कार्बी समुदाय के लोग असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड के कुछ हिस्सों में रहते हैं। कालांतर में वैष्णव प्रभाव स्वरूप इनकी मौखिक परंपरा में ‘कार्बी रामायण’ रामकथा का प्रवेश हुआ। बिरहोर रामायण के अनुसार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। गोंड समुदाय में प्रचलित राम कथा में राम की तुलना में सीता को महत्व दिया गया है और उसके बाद लक्ष्मण को। बंजारा (लंबाणी) रामायण में वाल्मीकि और तुलसी कृति राम-कथाओं का एक तरह से ‘जनजातिकरण’ हो गया है।

रामकथा के जनजातीय पात्र

श्रीराम की वन-गमन यात्रा में जनजातीय पात्र हैं। इन्हीं जनजातीय पात्रों से जुड़े प्रसंगों के कारण भी रामकथा जनजाति क्षेत्रों में प्रचलित है। ये पात्र है- निषादराज गुह, केवट, शबरी, गिद्धराज जटायु, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवन्त, अंगद। भीली-निषादी लोकगीत के रूप में प्रचलित है-‘गुहा राजा घाट खड़ा, राम लियो अंग लाइ। वन औ नगर एक भए, मित्रता री छांव छाई॥’ केवट लोकभजन के रूप में पूर्वी भारत में गाया जाता है- ‘पहिले पांव पखारब राम, तब नैया चढ़इब हो। मोरे घाट पधारे आज, भाग जगइब हो॥’ भील शबरी गीत में राम के वन आगमन को बताया है-

‘शबरी रै बेर सजाया, राम आवे वनमां। मीठा-तीता परख परख, धर्या प्रेम थाल मां॥’ गोंडी वीरगाथा में जटायु का वर्णन है- ‘जटायु पंख पसार उड़े, सीता राखन जाय। प्राण दिए वन धर्म खातिर, राम नाम सुनाय॥’ गोंड जनजाति में राम-सुग्रीव मित्रता का उल्लेख आता है- ‘सुग्रीवा टोला बोलाया, राम संग हाथ मिलाया। जंगल जन सब साथ चले, रावन राज गिराया॥’ गोंड–भील वीर गीत में हनुमान की वीरता को दर्शाया है- ‘हनुमंत जंगल रो वीर, राम दूत कहाय। डोंगर फांदी उड़ चल्यो, सीता खबर लाय॥’ लोककथा गीत जाम्बवंत के बारे में बताया है- ‘जामवंत बूढ़ा ज्ञानी, वीरन राह बताय। भूल गयो बल हनुमंत, शक्ति याद दिलाय॥’ युद्ध गीत के रूप में अंगद- ‘अंगद पांव जमाय खड़ा, लंका डोले सारी। वन के बालक शक्ति देख, डरी रावन सवारी॥’

स्वामी विवेकानंद ने उदधृत किया- ‘भारत की आत्मा ग्रामों और वनों में निवास करती है; रामायण इसी जीवित भारत की कथा है।’ आचार्य विनोबा भावे ने ‘गीता प्रवचन एवं रामायण चिंतन व्याख्यान’ में कहा है- “रामायण भारत की लोक आत्मा है। इसे जनजातियों ने गाया, जिया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा।” रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अपनी कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में कहते हैं- ‘राम केवल अयोध्या के नहीं, वन और पर्वतों के भी नायक हैं।’

भारत में जनजातीय क्षेत्र

भारत में लगभग 11 करोड़ जनजाति समाज है। ये 11 करोड़ लोग भारत के लगभग 1/5 लाख ग्रामों में बसते हैं। भारत की जनजातियां 800 से अधिक भाषाई रूपों से जुड़ी हैं और लगभग 90 प्रतिशत जनजातियां ग्रामीण और वन्य क्षेत्रों में रहती हैं। भारत में जनजातियां मुख्यतः तीन बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में केंद्रित हैं– एक, मध्य भारतीय जनजातीय पट्टी (राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र–यहां लगभग 55-60 प्रतिशत जनजातियां)। दो, पूर्वोत्तर जनजातीय क्षेत्र (असम, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल, त्रिपुरा, मणिपुर-कई राज्यों में जनजातियां बहुसंख्यक)। तीन, दक्षिण भारतीय जनजातीय क्षेत्र (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल)। भारत में 705 जनजातियां मान्यता प्राप्त है। भारत की प्रमुख जनजातियों में भील, गोंड, संथाल, मीणा, मुंडा, उरांव, नागा समूह, खासी, बोडो, हो, कोय, गरासिया, टोडा, चेचु, अंदमानी जनजातियां है। सामान्यतः सभी जनजातियां अपनी आजीविका के लिए कृषि और वन उत्पादों पर निर्भर हैं। जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम है, परन्तु यहां की संस्कृति अत्यंत समृद्ध है और इनका प्रकृति से संबंध उच्च स्तर का है। दण्डकारण्य क्षेत्र (छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के हिस्सों में फैला हुआ) रामकथा व जनजातीय संस्कृति का प्रमुख क्षेत्र है।

Topics: पाञ्चजन्य विशेषमुण्डारी रामायणभीलकार्बी रामायणजनजातीय रामभीलों के भारथवाचिक परंपरालंबाणी रामायणजंगल के रक्षकमुंडाकार्बीनिषादराज की मित्रताबिरहोरकेवट प्रसंगजनजातीय समुदायजटायु का बलिदानवनवासी रामराम-सीतामानी वारता
रवि कुमार
रवि कुमार
(लेखक : विद्या भारती जोधपुर प्रांत के संगठन मंत्री और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य हैं) [Read more]
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