मैकाले की कक्षा से बहुभाषी भारत तक: समझें त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता
June 11, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम शिक्षा

मैकाले की कक्षा से बहुभाषी भारत तक: समझें त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और CBSE के नए निर्देशों के बाद त्रिभाषा सूत्र (Three Language Formula) पर बहस तेज हो गई है। मैकाले की शिक्षा नीति के औपनिवेशिक प्रभाव को समाप्त कर भारत कैसे 'ज्ञान-स्वराज' की ओर बढ़ सकता है, इस पर एक विस्तृत विश्लेषण

Written byडॉ. मुकेश शर्माडॉ. मुकेश शर्मा — edited by Shivam Dixit
Jun 11, 2026, 10:30 pm IST
in शिक्षा
Three Language Formula NEP 2020 India Education System

भारत में त्रिभाषा सूत्र को लेकर चल रही बहस केवल शिक्षा नीति की बहस नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रश्न से जुड़ी हुई है कि 21वीं सदी का भारत अपनी भाषाई, सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान को किस प्रकार परिभाषित करना चाहता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा–स्कूल शिक्षा 2023 के अंतर्गत बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करने की दिशा में उठाए गए कदमों ने इस विमर्श को पुनः राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में ला दिया है। हाल के वर्षों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा भी इन प्रावधानों के अनुरूप विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र के प्रभावी क्रियान्वयन पर बल दिया गया है। वस्तुतः यह विषय भाषा चयन से कहीं अधिक भारत के भविष्य, उसकी ज्ञान-व्यवस्था, सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और ज्ञान-सम्प्रभुता से जुड़ा हुआ है।

मैकाले की शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं पर उसका प्रभाव

इस बहस को समझने के लिए हमें इतिहास की ओर लौटना होगा। सन् 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले द्वारा प्रस्तुत शिक्षा संबंधी विचारों ने ब्रिटिश भारत की शिक्षा नीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। उस समय का उद्देश्य भारतीय समाज में ऐसी शिक्षित श्रेणी तैयार करना था, जो औपनिवेशिक प्रशासन और भारतीय जनता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सके। अंग्रेज़ी को प्रशासन, न्याय, उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं की प्रमुख भाषा के रूप में स्थापित किया गया। परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया और भारतीय भाषाएँ आधुनिक उच्च शिक्षा तथा औपचारिक ज्ञान-सृजन के प्रमुख संस्थागत ढाँचों में अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व वाली होती चली गईं।

औपनिवेशिक काल में भाषा और सत्ता का संबंध

औपनिवेशिक काल में भाषा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं थी, बल्कि सत्ता और अवसरों तक पहुँच का साधन भी थी। अंग्रेज़ी जानने वाला वर्ग प्रशासनिक पदों, न्यायिक संस्थाओं और आधुनिक रोजगार के अवसरों से जुड़ता गया, जबकि भारतीय भाषाओं में शिक्षित समाज का बड़ा भाग निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं से क्रमशः दूर होता गया। इससे एक ऐसी मानसिक संरचना विकसित हुई, जिसमें अंग्रेज़ी को ज्ञान, आधुनिकता और प्रगति का प्रतीक माना जाने लगा, जबकि भारतीय भाषाओं को भावनाओं, संस्कृति और परंपरा तक सीमित समझा जाने लगा।

स्वतंत्रता के बाद भी बना रहा औपनिवेशिक प्रभाव

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजनीतिक सत्ता अवश्य भारतीय हाथों में आ गई, किंतु शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में औपनिवेशिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। आज भी अनेक परिवारों में अंग्रेज़ी माध्यम को सफलता, प्रतिष्ठा और बेहतर भविष्य का पर्याय माना जाता है। यह स्थिति किसी भाषा के विरोध का विषय नहीं है, बल्कि इस प्रश्न का विषय है कि क्या भारत अपनी भाषाओं को भी ज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार का प्रभावी माध्यम बना पा रहा है? इसी प्रश्न के संदर्भ में त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता उभरकर सामने आती है।

त्रिभाषा सूत्र का उद्देश्य: संतुलित भाषा व्यवस्था

यह समझना आवश्यक है कि त्रिभाषा सूत्र अंग्रेज़ी का विरोध नहीं करता। इसका उद्देश्य अंग्रेज़ी को हटाना नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को भी शिक्षा और ज्ञान-व्यवस्था में उचित स्थान प्रदान करना है। इसका मूल दर्शन संतुलित है—एक भाषा स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक जड़ों के लिए, दूसरी राष्ट्रीय संवाद और भारतीय समाज से व्यापक जुड़ाव के लिए तथा तीसरी वैश्विक संपर्क और अंतरराष्ट्रीय अवसरों के लिए। भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में यही संतुलन भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रतीत होता है।

त्रिभाषा सूत्र का ऐतिहासिक और वैचारिक आधार

त्रिभाषा सूत्र कोई आकस्मिक निर्णय नहीं है। इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि स्वतंत्र भारत की शिक्षा-चर्चाओं में कई दशकों से मौजूद रही है। कोठारी आयोग (1964–66) ने राष्ट्रीय एकता, शैक्षिक अवसरों की समानता और आधुनिक ज्ञान तक व्यापक पहुँच के लिए बहुभाषी शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया था। इसके बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968, 1986 तथा बाद के संशोधित दस्तावेज़ों में भी त्रिभाषा सूत्र की अवधारणा विभिन्न रूपों में उपस्थित रही। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस दीर्घकालिक चिंतन को नए सामाजिक, तकनीकी और वैश्विक संदर्भों के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया है। इस दृष्टि से त्रिभाषा सूत्र कोई नया प्रयोग नहीं, बल्कि छह दशकों से विकसित होती भारतीय शिक्षा-दृष्टि का परिष्कृत रूप है।

भारत की बहुभाषिक परंपरा

यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय शिक्षा परंपरा स्वयं बहुभाषिक रही है। गुरुकुलों, बौद्ध विहारों और जैन शिक्षण संस्थानों में संस्कृत, पालि, प्राकृत तथा विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग ज्ञान-संचार के लिए किया जाता था। भारतीय व्यापारी, यात्री, विद्वान और धर्मदूत सदियों तक अनेक भाषाओं के माध्यम से विश्व से संवाद करते रहे। दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर अरब जगत और मध्य एशिया तक भारत का सांस्कृतिक एवं व्यापारिक प्रभाव बहुभाषिक क्षमता के कारण ही संभव हुआ था। इस दृष्टि से बहुभाषिकता भारत के लिए कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक शक्ति रही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और CBSE की भूमिका

हाल में CBSE द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा-विद्यालय शिक्षा 2023 के अनुरूप विद्यालयों को यह सुनिश्चित करने की दिशा में निर्देश दिए गए हैं कि विद्यार्थियों को तीन भाषाओं के अध्ययन का अवसर उपलब्ध हो। नीति का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि विद्यार्थियों को कम से कम दो भारतीय भाषाओं से परिचित कराया जा सके। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भाषा को किसी राज्य या विद्यार्थी पर थोपना इस नीति का उद्देश्य नहीं है तथा राज्यों और विद्यालयों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त लचीलापन प्रदान किया गया है।

भारत की भाषाई विविधता: एक सामाजिक यथार्थ

भारत विश्व के सबसे बड़े बहुभाषी देशों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 121 प्रमुख भाषाएँ और 19,500 से अधिक मातृभाषाएँ, उपभाषाएँ एवं भाषाई रूप दर्ज किए गए थे। यह आँकड़ा स्वयं इस तथ्य का प्रमाण है कि बहुभाषिकता भारत के लिए कोई कृत्रिम अवधारणा नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ है।

मातृभाषा में शिक्षा का महत्व

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का एक महत्वपूर्ण आधार मातृभाषा या स्थानीय भाषा में प्रारंभिक शिक्षा को प्रोत्साहित करना भी है। UNESCO सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने यह संकेत दिया है कि प्रारंभिक वर्षों में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी अवधारणाओं को अधिक गहराई से समझते हैं, उनकी साक्षरता क्षमता बेहतर विकसित होती है तथा सीखने की प्रक्रिया अधिक स्वाभाविक बनती है। इसलिए बहुभाषिकता केवल अतिरिक्त भाषाएँ सीखने का प्रश्न नहीं, बल्कि प्रभावी अधिगम का भी प्रश्न है।

बहुभाषिकता के शैक्षिक और बौद्धिक लाभ

बहुभाषिकता के शैक्षिक लाभ व्यापक रूप से स्वीकार किए गए हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने बहुभाषिकता को बेहतर संज्ञानात्मक लचीलेपन, स्मृति, समस्या-समाधान क्षमता तथा रचनात्मक सोच से जोड़ा है। विभिन्न भाषाओं के संपर्क में आने वाला विद्यार्थी केवल नए शब्द नहीं सीखता, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने की क्षमता भी विकसित करता है।

राष्ट्रीय एकात्मता और त्रिभाषा सूत्र

त्रिभाषा सूत्र का एक महत्वपूर्ण पक्ष राष्ट्रीय एकात्मता से भी जुड़ा हुआ है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती; वह साहित्य, इतिहास, दर्शन, लोकज्ञान और सांस्कृतिक स्मृतियों की वाहक भी होती है। जब विभिन्न राज्यों के विद्यार्थी अन्य भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों से परिचित होंगे, तब भाषाई विविधता विभाजन का नहीं, बल्कि संवाद और परस्पर सम्मान का आधार बनेगी।

त्रिभाषा सूत्र को लेकर उठने वाली चिंताएँ

निश्चित रूप से इस नीति के आलोचक भी हैं। उनका तर्क है कि अतिरिक्त भाषा विद्यार्थियों पर शैक्षणिक दबाव बढ़ा सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ प्रशिक्षित भाषा-शिक्षकों की कमी है या संसाधन सीमित हैं। कुछ राज्यों में भाषाई पहचान और सांस्कृतिक स्वायत्तता से जुड़ी आशंकाएँ भी समय-समय पर व्यक्त की जाती रही हैं। इन चिंताओं को पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। किंतु समाधान नीति को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके संवेदनशील, लचीले और गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और भारतीय भाषाएँ

21वीं सदी का सबसे बड़ा परिवर्तन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन अनुवाद और डिजिटल ज्ञान अर्थव्यवस्था का उदय है। आज भारतीय भाषाओं के लिए बड़े भाषा मॉडल, डिजिटल कॉर्पस, मशीन अनुवाद प्रणालियाँ तथा बहुभाषी AI संसाधन विकसित किए जा रहे हैं। यह संकेत है कि भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल अंग्रेज़ी आधारित नहीं होगी, बल्कि बहुभाषिक स्वरूप ग्रहण करेगी।

भारतीय भाषाओं में ज्ञान-सृजन की आवश्यकता

किन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है—यदि भारतीय भाषाओं में पर्याप्त ज्ञान-सामग्री, शोध, पाठ्यपुस्तकें, वैज्ञानिक लेखन और डिजिटल संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारतीय भाषाओं में प्रभावी रूप से कैसे विकसित होगी? भविष्य के AI मॉडल उन्हीं भाषाओं में अधिक सक्षम होंगे, जिनमें व्यापक और गुणवत्तापूर्ण ज्ञान-संसाधन उपलब्ध होंगे। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं में ज्ञान-सृजन का विस्तार भविष्य की तकनीकी प्रगति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

ज्ञान-स्वराज की अवधारणा

इसी संदर्भ में “ज्ञान-स्वराज” की अवधारणा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ज्ञान-स्वराज से आशय ऐसी स्थिति से है, जिसमें कोई समाज अपनी भाषाओं में ज्ञान का सृजन, संरक्षण, प्रसार और नवाचार करने में सक्षम हो। जिस प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन ने राजनीतिक स्वराज का लक्ष्य सामने रखा था, उसी प्रकार ज्ञान-आधारित युग में भाषाई रूप से सशक्त ज्ञान-व्यवस्था भी राष्ट्रीय विकास का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

रोज़गार और बहुभाषिकता का बढ़ता महत्व

रोज़गार की दृष्टि से भी बहुभाषिकता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। पर्यटन, मीडिया, अनुवाद, कंटेंट निर्माण, शिक्षा, प्रशासन, ग्राहक सेवा, डिजिटल प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक व्यापार जैसे अनेक क्षेत्रों में बहुभाषी युवाओं की मांग निरंतर बढ़ रही है।

21वीं सदी के भारत की भाषाई आवश्यकता

मैकाले की शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य औपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं की पूर्ति था। 21वीं सदी के भारत की आवश्यकता इससे भिन्न है। आज भारत को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है, जो अपनी मातृभाषा में सोच सकें, भारतीय भाषाओं में संवाद कर सकें, वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ सहभागिता कर सकें और ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकें।

निष्कर्ष: क्या भारत ज्ञान-स्वराज की ओर बढ़ेगा?

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि विद्यार्थी तीन भाषाएँ क्यों पढ़ें। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी भाषाई विविधता को भविष्य की शक्ति में बदलना चाहता है या नहीं। यदि भारत ज्ञान, तकनीक, संस्कृति और नवाचार के क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करना चाहता है, तो भारतीय भाषाओं को शिक्षा और ज्ञान-सृजन की मुख्यधारा में पर्याप्त स्थान देना आवश्यक होगा।

प्रश्न यह नहीं है कि भारत तीन भाषाएँ पढ़ाए या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत 21वीं सदी में अपनी भाषाओं में ज्ञान रचने वाला राष्ट्र बनेगा या केवल दूसरों द्वारा निर्मित ज्ञान का उपभोक्ता बना रहेगा। यदि 20वीं सदी का लक्ष्य राजनीतिक स्वराज था, तो 21वीं सदी में ज्ञान-स्वराज की अवधारणा भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती है। त्रिभाषा सूत्र इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है।

Topics: CBSE Language Policyज्ञान स्वराजराष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020NEP 2020Panchjanya AnalysisThree Language Formulaत्रिभाषा सूत्रमैकाले की शिक्षा नीति
डॉ. मुकेश शर्मा
डॉ. मुकेश शर्मा
प्रान्त युवा गतिविधि प्रमुख, जयपुर प्रान्त, जयपुर [Read more]
ShareTweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

Social Media Double Standard Sejal Pawar 370 Biryani Controversy

सेजल पवार और 370 बिरयानी विवाद : दोहरा मापदंड और जब फेम का खेल कानून और समाज पर भारी पड़ने लगे

2026 Election Results BJP Win West Bengal Assam

बंगाल में प्रचंड बहुमत, असम में हैट्रिक और केरल-पुडुचेरी में वामपंथ का अंत; जानें 5 राज्यों के नतीजों का सटीक विश्लेषण

Congress Strategy Bengal Election 2026 and UP 2027 Target

ममता से ‘दुश्मनी’ और अखिलेश को ‘चेतावनी’? बंगाल चुनाव में कांग्रेस की इस चाल ने उड़ाई इंडी गठबंधन की नींद!

जम्मू यूनिवर्सिटी के सिलेबस में ‘जिन्ना’ की एंट्री पर बवाल, भड़के छात्रों ने दी आंदोलन की चेतावनी

क्यों डिग्री की अधिकता और औद्योगिक कौशल की कमी भारत के लिए चिंता का विषय है?

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान से बदलेगा शिक्षा का परिदृश्य

Load More

ताज़ा समाचार

Three Language Formula NEP 2020 India Education System

मैकाले की कक्षा से बहुभाषी भारत तक: समझें त्रिभाषा सूत्र की प्रासंगिकता

Belfast Riots Ireland Sudanese Asylum Seeker Attack Stephen Social Media Ban

आयरलैंड में सूडानी शरणार्थी ने सरेआम रेता गला, भड़के दंगों के बीच नेताओं ने कहा- ‘X’ पर लगाओ बैन

Haridwar Kumbh Mela 2027 NMCG Cleanliness Project CM Pushkar Singh Dhami

Haridwar Kumbh Mela 2027: कुंभ मेले की स्वच्छता के लिए केंद्र से ₹115.61 करोड़ स्वीकृत, सीएम धामी ने जताया आभार

CM Pushkar Singh Dhami PM Narendra Modi Niti Aayog Meeting Delhi

Niti Aayog Meeting: नीति आयोग की बैठक में CM पुष्कर सिंह धामी ने रखा उत्तराखंड के विकास का रोडमैप, दिया कुंभ का न्योता

Social Media Double Standard Sejal Pawar 370 Biryani Controversy

सेजल पवार और 370 बिरयानी विवाद : दोहरा मापदंड और जब फेम का खेल कानून और समाज पर भारी पड़ने लगे

Governor Anandiben Patel Order Conversion Cell UP Medical Colleges KGMU SGPGI

यूपी के मेडिकल कॉलेजों में कन्वर्जन रोकने को बनेगी निगरानी सेल, KGMU और SGPGI के मामलों पर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल सख्त

Amritsar Heroin Seizure Police Commissioner Gurpreet Singh Bhullar Punjab

Amritsar Heroin Seizure: अमृतसर पुलिस ने दुबई-पाकिस्तान ड्रग नेटवर्क के 6 तस्कर किए गिरफ्तार, 30 किलो हेरोइन जब्त

Kapurthala Crime News Pastor Harbhajan Singh Arrested Punjab Police

Kapurthala Crime News: कपूरथला में पादरी ने किया बलात्कार, 18 वर्षीय पीड़िता ने की आत्महत्या, हरभजन सिंह गिरफ्तार

क्या तमिलनाडु में शुरू हो गई मीडिया ‘सेंसरशिप’? बड़े न्यूज चैनल अचानक गायब TVK सरकार की कमियां दिखाना बनी वजह?

WB Madhyamik Result 2026 Vidya Bharati Students Toppers Sharda Vidya Mandir

पश्चिम बंगाल माध्यमिक परीक्षा में विद्या भारती का जलवा, टॉप-10 में शामिल हुए 13 छात्र, लोकभवन में हुआ सम्मान

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies