वर्तमान में स्वस्थ शरीर मानव मात्र की आकांक्षा और समय की आवश्यकता है। स्वस्थ दिनचर्या के साथ योग का अवलंबन इसका समाधान है। किन्तु योग शारीरिक व्यायाम से अधिक एक आध्यात्मिक साधना है। यह आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया और कैवल्य (मोक्ष ) प्राप्ति का द्वार है जो सबके लिए खुला है। विश्व का प्रत्येक मानव अपना आत्म-विकास करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है।
योग एवं अध्यात्म साधना की परम्परा भारत में अविच्छिन्न रूप से चली आ रही है।
‘योग’ शब्द यहां भिन्न भिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। कुछ विचारकों ने योग का ‘जोड़ने’ के अर्थ में प्रयोग किया है, तो कुछ चिन्तकों ने उसका ‘समाधि’ अर्थ में भी प्रयोग किया है। वैदिक सरणि में ‘योग’ समाधि अर्थ में प्रयुक्त हुआ। महर्षि पतंजलि ने ‘चित्त-वृत्ति के निरोध’ को योग कहा है।¹
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। — पतंजल योगसूत्र
बौद्ध विचारकों ने योग का अर्थ ‘समाधि’ किया है।
जैन परम्परा में यह ‘संयोग’ या ‘जोड़ना’ है।
मोक्षेण योजनाद् योगः।
जैन आचार्य हरिभद्र ने उन सब व्यापारों को योग कहा है, जिनसे प्राणों की विशुद्धि होती है, कर्म-मल का नाश होता है और उसका मोक्ष के साथ संयोग होता है।
हमारे यहां जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं -धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष। मोक्ष सबसे प्रधान और काम्य है। भारतीय ऋषि-मुनियों एवं विचारकों के चिंतन-मनन तथा तत्त्वज्ञान, आचार, इतिहास, काव्य, नाटक, रूपक आदि साहित्य का कोई भी भाग लें, उसका अंतिम ध्येय मोक्ष है।
वैदिक साहित्य में बाहरी दृष्टि से तो वेदों का अधिकांश प्राकृतिक दृश्यों, देवों की स्तुतियों तथा क्रिया-काण्डों के वर्णन से भरा हुआ है परन्तु यह वेद का बाह्य शरीर मात्र है। उसकी आत्मा इससे भिन्न है, वह है परमात्म-चिंतन। उपनिषदों का भव्य भवन तो ब्रह्म-चिंतन की आधारशिला पर ही स्थित है।
रामायण और महाभारत के चरित नायकों का महत्त्व इसलिए नहीं है कि वे राजा या राजकुमार थे, परन्तु उसका कारण यह है कि वे जीवन के अन्तिम समय में सत्याचरण या तप साधना के द्वारा मोक्ष पुरुषार्थ में संलग्न रहे।
कालिदास जैसे महाकवि भी अपने प्रमुख पात्रों का महत्त्व मुक्ति की ओर झुकने में देखते है।
शब्द-शास्त्र में शब्द-शुद्धि को तत्त्वज्ञान का द्वार मानकर उसका अन्तिम ध्येय परम श्रेय ही माना है।
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति। (हेमचन्द्रानुशासनम्)
और तो और, काम-शास्त्र जैसे काम विषयक ग्रन्थ का अन्तिम ध्येय भी मोक्ष माना है।³
स्थाणिरे धर्मं मोक्षं च।
दार्शनिक दृष्टि से देखें तो भारतीय-संस्कृति तीन धाराओं में प्रवाहमान रही है—
१. वैदिक, २. जैन, और ३. बौद्ध। योग-साधना या योग-साहित्य की भी तीन परम्पराएँ मानी जा सकती हैं—
१. वैदिक योग परंपरा
२. जैन योग परंपरा और
३. बौद्ध योग-परंपरा।
तीनों परम्पराओं का अपना स्वतंत्र चिन्तन है। सबने अपने दृष्टिकोण से योग पर सोचा-विचारा एवं लिखा है। फिर भी तीनों परंपराओं के विचारों में भिन्नता के साथ बहुत-कुछ साम्य भी है।
वैदिक परंपरा
वैदिक परंपरा में वेद प्रमुख हैं। वस्तुतः वेदों में आध्यात्मिक वर्णन बहुत कम देखने को मिलता है। ऋग्वेद में ‘योग’ शब्द अनेक स्थानों पर आया है, परन्तु सर्वत्र उसका अर्थ-जोड़ना, मिलाना, संयोग करना इतना ही है; ध्यान एवं समाधि अर्थ नहीं है। योग-विषयक ग्रन्थों में भी योग के अर्थ में प्रयुक्त, ध्यान, वैराग्य, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि अर्थ में योग शब्द का उल्लेख नहीं किया है। उपनिषदों में भी ‘योग’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ में प्रयोग नहीं हुआ है।
वास्तव में योग को सम्पूर्ण और समीचीन अर्थ विस्तार देने वाला शीर्ष ग्रन्थ पातंजल योग- दर्शन ही है। यह ग्रन्थ संक्षिप्त और सरल तो है ही, विषय की स्पष्टता एवं पूर्णता के साथ अनुभवसिद्धि का मेल भी है । यह कम सम्भव नहीं कि पातंजल योग-शास्त्र के समय अन्य योग-शास्त्र भी इतने ही प्रसिद्ध रहे हों।
आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में योग-दर्शन का खण्डन करते हुए लिखा है—
‘अथ सम्यग्दर्शनाभ्युपायो योगः।’
सम्भव है भाष्यकार के सामने पातंजल योग-शास्त्र से भिन्न योग-शास्त्र भी रहा है। क्योंकि पातंजल योग-शास्त्र—‘अथ योगानुशासनम्’ सूत्र से शुरू होता है। दुर्भाग्य से अन्य योग-शास्त्र आज अनुपलब्ध है। इसलिए वैदिक परंपरा के योग विषयक साहित्य में पतंजलि का योग-दर्शन सबसे अधिक महत्वपूर्ण और उपयोगी ग्रंथ है। इसमें अन्य शास्त्रों के खंडन मंडन के लिये युक्तिवाद का सहारा न लेकर सरलतापूर्वक बहुत ही अल्प शब्दों में सिद्धांत निरुपण किया गया है।
योग-दर्शन चार चरणों (पादों) में विभक्त है और इसमें कुल १९५ सूत्र हैं।
- प्रथम समाधि पाद
- द्वितीय का साधन पाद,
- तृतीय विभूति पाद
- और चतुर्थ कैवल्य पाद है।
प्रथम पाद में प्रमुख रूप से योग के स्वरूप, उसके साधन और चित्त को स्थिर बनाने के उपायों का वर्णन है। चित का निरोध योग है किन्तु इस निरोध को साधा किस प्रकार जाए? तब ऋषि ने कहा –
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥
चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य—ये दो उपाय हैं। चित्तवृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक भोगोंकी ओर चल रहा है। उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है।
अभ्यास क्या है?
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३ ॥
व्याख्या—जो स्वभावसे ही चञ्चल है ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारम्बार चेष्टा करते रहनेका नाम ‘अभ्यास’ है।
गीता में भी कहा है—
अभ्यासैन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते (६ । ३५)
‘हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! अभ्यास अर्थात् स्थितिके लिये बारम्बार यत्न करनेसे और वैराग्यसे मन वशमें होता है।
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥ १४ ॥
अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधन में कभी उकताये नहीं। यह दृढ़ विश्वास रखे कि किया हुआ अभ्यास कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकता।
द्वितीय पाद में क्रिया-योग, योग के आठ अंग, उनका फल और हेय, हेयहेतु, हान और हानोपाय—इस चतुरव्यूह का वर्णन है।
तृतीय पाद में योग की विभूतियों का उल्लेख किया गया है।
चतुर्थ पाद में परिणामवाद का स्थापन और कैवल्य अवस्था के स्वरूप का वर्णन है।
यह योग-शास्त्र सांख्य दर्शन के आधार पर रचा गया है। यही कारण है कि महर्षि पतंजलि ने प्रत्येक पाद के अन्त में यह अंकित किया है—योग-शास्त्रे सांख्य-प्रवचने। ‘सांख्य-प्रवचने’ इस विशेषण से यह स्पष्टतः ध्वनित होता है कि सांख्य-दर्शन के अतिरिक्त अन्य दर्शनों के सिद्धांतों के आधार पर निर्मित योग-शास्त्र भी उस समय विद्यमान थे।
जैन योग परम्परा
ज्ञात हो कि सभी भारतीय विचारकों, दार्शनिकों एवं साहित्यकारों के चिन्तन का आदर्श मोक्ष रहा है। परन्तु, मोक्ष के स्वरूप के सम्बन्ध में सभी विचारक एकमत नहीं हैं। कुछ विचारक मुक्ति में शाश्वत सुख नहीं मानते। उनका विश्वास है कि दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है। इसके अतिरिक्त वहाँ शाश्वत सुख जैसी कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है। कुछ विचारक मुक्ति में शाश्वत सुख का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि जहाँ शाश्वत सुख है, वहाँ दुःख का अस्तित्व रह ही नहीं सकता, उसकी निवृत्ति तो स्वतः ही हो जाती है। जैन आगमों में आत्मा का साध्य “मोक्ष” माना है। समस्त आगमों का सार “मुक्ति” है और उसमें मुक्ति-मार्ग का ही विस्तार से वर्णन किया गया है।
जैन परंपरा में योग-साधना पर क्रम-बद्ध साहित्य सृजन करने का श्रेय आचार्य हरिभद्र को है। योग-साहित्य पर सर्वप्रथम उन्होंने लेखनी चलाई। उनके बाद दिगम्बर-श्वेताम्बर अनेक आचार्यों एवं विचारकों ने योग पर साहित्य लिखा और कई विचारकों ने वैदिक एवं बौद्ध परंपरा की योग प्रक्रिया का जैन परंपरा के साथ समन्वय करने का भी प्रयत्न किया। वस्तुतः इस विषय में समन्वयात्मक शैली के जन्मदाता भी आचार्य हरिभद्र ही थे। हरिभद्र ने योग विंशिका, योग बिंदु, योग शतक नामक ग्रन्थ लिखे।
आचार्य हेमचन्द्र जिन्हें विशाल एवं गहन अध्ययन एवं ज्ञान के कारण ‘कलिकाल सर्वज्ञ’ के नाम से सम्बोधित किया जाता रहा है, ने योग पर योग-शास्त्र लिखा। उसमें पातञ्जल योग-सूत्र में निर्दिष्ट अष्टांग योग के क्रम से गृहस्थ जीवन एवं साधु जीवन की आचार साधना का जैनागम के अनुसार वर्णन किया है। वे लिखते हैं –
चतुर्वर्गे अग्रणी मोक्षो योगस्तस्य च कारणम्।
ज्ञान श्रद्धान चारित्ररूपं रत्नत्रयं च स:।।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—यह चार पुरुषार्थ हैं। इन चारों में मोक्ष पुरुषार्थ मुख्य है। मोक्ष का जो कारण हो, वही योग कहलाता है। इस व्याख्या के अनुसार सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र रूप ‘रत्नत्रय’ ही योग है।
यद्यपि इसका प्रारम्भ वैदिक धर्म के तीक्ष्ण खंडन से प्रारम्भ होता है। हिंसा के लिए वह यज्ञ, बलि, श्राद्ध, यहां तक की वैदिक ऋषियों और देवताओं को भी कोसते हैं।
कोदंडदंडचक्रासि शूलशक्तिधरा सुरा:।
हिंसका अपि हा कष्टा पूज्यन्ते देवताधिया।।
धनुष, दण्ड, चक्र, खड्ग, त्रिशूल और शक्ति को धारण करने वाले हिंसक देवों को भी लोग देव समझ कर पूजते हैं। इससे अधिक खेद की बात क्या हो सकती है?
इस ग्रन्थ में आसन, प्राणायाम आदि से सम्बन्धित बातों का भी विस्तृत वर्णन है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता गृहस्थ भी पालन कर सके ऐसे योग मार्ग का प्रतिपादन है। इस विषय पर अन्यान्य विद्वानों ने अपना अभिमत प्रकट किया। शुभचंद्र ने ज्ञानर्णव में योग और प्राणायाम की महिमा विशद वर्णन किया। उपाध्याय यशोविजय ने अध्यात्मसार, अध्यात्म उपनिषद और सटीक बत्तीस बत्तीसियाँ लिखी।योगसार ग्रन्थ श्वेतांबर मत का प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
बौद्ध योग परम्परा
,यहां योग के आशय समाधि से है जिसका प्रारम्भ शील और प्रकर्ष प्रज्ञा का प्रज्वलन है।
जब साधक चित्त को एकाग्र कर लेता है, तो समझना चाहिए उसने समाधि-मार्ग में प्रवेश कर लिया है। अब उसे चाहिए कि वह चित्त की एकाग्रता के अभ्यास को इतना दृढ़ कर ले कि भय, शोक एवं हर्ष आदि के समय भी चित्त विभ्रान्त न हो सके।
विसुद्धिमग्ग में प्रधानतः योगशास्त्र का विशद व्याख्यान है। इसमें योगाभ्यास में प्रवृत्त होनेवाले जिज्ञासु के लिये, प्रारम्भ से लेकर सिद्धि तक की समग्र विधियों को क्रमबद्ध ढंग से वर्णित तो की ही गयी है, साथ ही प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर बौद्धदर्शन की अन्य विवेचनात्मक गवेषणाएँ तथा ब्राह्मणदर्शनों की विशेषतः व्याकरण, न्याय, सांख्य, योग, आयुर्वेद तथा मीमांसा शास्त्रो की गुत्थियाँ भी अतीव सरल भाषा में समझा दी गयी है। अतः यदि विद्वान् लोग इस ग्रन्थ को ‘बौद्धधर्म का विश्वकोष’ कहते है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
आचार्य बुद्धघोष बुद्धमत में प्रव्रजित होने से पूर्व पातञ्जल योग मे निष्णात थे। निश्चय ही उन्होंने बौद्धों के इस योगदर्शन को साधको के कल्याण के लिये विसुद्धिमग्ग के रूप में प्रकाशित किया है।
विसुद्धिमग्ग संयुत्तनिकाय में आयी दो गाथाओ के आधार पर रचित, बौद्ध योगशास्त्र का स्वतन्त्र मौलिक प्रकरण-ग्रन्थ है। इन दोनो में, पहली गाथा प्रश्न के रूप में तथा दूसरी गाथा उत्तर के रूप में है। इस दूसरी गाथा का ही आचार्य ने विसुद्धिमग्ग के रूप में विस्तृत व्याख्यान किया है।
पहली गाथा है—
अन्तो जटा बहि जटा जटाय जटिता पजा।
तं तं, गोतम पुच्छामि—को इमं विजटये जटं ? ति॥
[ एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे, उस समय किसी देवता ने आकर भगवान् से पूछा—अन्दर भी जञ्जाल (उलझन) है, बाहर भी जञ्जाल है, यह सारा संसार जञ्जाल में उलझ पड़ा है। भगवन्! मैं आपसे पूछता हूँ कि कौन इस जञ्जाल से छुटकारा पा सकता है? अर्थात् यह समग्र संसार भवबन्धन में जकडा हुआ है, कौन किस उपाय से इससे मुक्त हो सकता है? ]
दूसरी गाथा है—
”सीले पतिट्ठाय नरो सपञ्ञो चित्तं पञ्ञं च भावयं।
आतापी निपको भिक्खु सो इमं विजटये जटं” ति॥
[ इसके उत्तर में भगवान् कहते है—शील (सदाचार) में प्रतिष्ठित हो कर जो प्रज्ञावान् पुरुष जब समाधि और प्रज्ञा की भावना करता है, तब वह उद्योगी तथा ज्ञानवान् पुरुष भिक्षु (त्यागी) हो कर इस जंजाल (भवबन्धन) को सुलझा लेता है। ]
सुत्तपिटक में आन-पान-स्मृति का वर्णन मिलता है। चित्त-वृत्ति को एकाग्र करने के लिए इसका उपदेश दिया गया है। इसमें बताया है कि साधक श्वास ग्रहण करते एवं छोड़ते समय पूरी सावधान रहे , अपने चित्त को इस प्रक्रिया के साथ संलग्न करे। चित्त को स्थिर करने के लिए साधक ‘अरहं’ शब्द पर अपने चित्त को स्थित करके श्वासोच्छ्वास देखे । यदि अरहं शब्द पर चित्त स्थिर नहीं रह पाता है तो उसे गणना, अनुबन्धना, स्पर्श और स्थापना का प्रयोग करना चाहिए।
गणना का अर्थ साँस लेते और छोड़ते समय साँस की गणना की जाए।
जब मन गणना करने में संलग्न हो जाए, तब गणना के कार्य को छोड़कर साँस के अन्दर जाने एवं बाहर आने के साथ चित्त भी अन्दर-बाहर आता-जाता रहे अर्थात् चित्त को श्वासोच्छ्वास के साथ जोड़ दे। इस प्रक्रिया को ‘अनुबन्धना’ कहते हैं।
श्वास और प्रश्वास आते-जाते समय नासिका के अग्र भाग को स्पर्श करते हैं। अतः उस स्थान पर चित्त को लगाना स्पर्श कहलाता है और श्वास एवं प्रश्वास पर चित्त को एकाग्र करने की प्रक्रिया को स्थापना कहते हैं। यही एकाग्रता समाधि में सहयोगिनी बनती है जिसे सनातन मोक्ष कहता है। इस प्रकार भारतीय परम्परा में योग आधिदैविक, आधिभौतिक से भी पार अध्यात्म के शिखर पर आरुढ़ होने का सहायभूत साधन है।
सौजन्य – नीलू शेखावत, रिसर्च स्कॉलर, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर।

















