4 जून 2026 को ब्रिटेन की राजधानी लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम अचानक चर्चा का विषय बन गया। इस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने हिस्सा लिया था। वे लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक कॉलेज में “कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अंतरराष्ट्रीय कानून” विषय पर व्याख्यान देने पहुंचे थे। कार्यक्रम के दौरान एक श्रोता द्वारा पूछे गए सवाल और उसके बाद हुई बहस ने पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया।
घटना के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए। भारतीय उच्चायोग ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कार्यक्रम में हुई बाधा और कुछ लोगों के व्यवहार की आलोचना की। बाद में जिस महिला ने सवाल उठाया था, उसकी पहचान बर्कबेक विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कल्पना विल्सन के रूप में हुई। इसके बाद कल्पना विल्सन के विचारों, उनके लेखन और उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई।
क्या हुआ था कार्यक्रम में?
भारतीय उच्चायोग के अनुसार, न्यायमूर्ति सूर्यकांत को बर्कबेक कॉलेज ने विशेष रूप से व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था। उन्होंने अपने संबोधन में एआई, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। भाषण समाप्त होने के बाद प्रश्नोत्तर सत्र शुरू हुआ। इसी दौरान एक महिला ने भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए सवाल पूछना शुरू किया। उन्होंने कहा कि कई कानूनी विशेषज्ञ भारत में असहमति की स्थिति को लेकर चिंता जता रहे हैं। हालांकि, कार्यक्रम के संचालक ने बीच में ही हस्तक्षेप किया और कहा कि यह सवाल कार्यक्रम के मूल विषय से संबंधित नहीं है। इसके बाद सवाल को आगे नहीं बढ़ने दिया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया और विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने इस घटना पर आधिकारिक बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि मुख्य न्यायाधीश के व्याख्यान के बाद चर्चा का माहौल अच्छा था, लेकिन एक व्यक्ति ने कार्यक्रम को बाधित करने की कोशिश की। उच्चायोग ने कहा कि लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें व्यक्त करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में शिष्टाचार और मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है। उच्चायोग ने ऐसे व्यवहार को अनुचित और अस्वीकार्य बताया।
— India in the UK (@HCI_London) June 5, 2026
कौन हैं कल्पना विल्सन?
कल्पना विल्सन एक शिक्षाविद् हैं और सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करती हैं। उनका शोध अंतरराष्ट्रीय विकास, सामाजिक न्याय, नस्ल, लिंग और दक्षिण एशियाई समाजों से जुड़े विषयों पर केंद्रित रहा है। सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर उनके विचार स्पष्ट रूप से वामपंथी और मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्रभावित दिखाई देते हैं। वे स्वयं को मार्क्सवादी नारीवादी बताती हैं और हिंदुत्व, पूंजीवाद तथा राष्ट्रवादी राजनीति की आलोचना कर आलोचकों का कहना है कि कल्पना विल्सन केवल एक अकादमिक नहीं हैं, बल्कि वे उस अंतरराष्ट्रीय वैचारिक नेटवर्क का हिस्सा हैं जो भारत से जुड़े लगभग हर बड़े मुद्दे पर सरकार और राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोध में खड़ा दिखाई देता है। चाहे अनुच्छेद 370 का मुद्दा हो, किसान आंदोलन हो, नागरिकता से जुड़ी बहस हो या फिर हिंदुत्व पर अंतरराष्ट्रीय विमर्श कल्पना विल्सन का रुख अक्सर भारत सरकार की आलोचना के पक्ष में दिखाई देता है।
In the 1st video, the lady interrupting CJI Suryakant is not a student but a Professor of Geography and anti-India activist, Kalpana Wilson. She is daughter of Amrit Wilson whose OCI was cancelled by GoI few months ago. She is ideologically aligned to India's CPI(ML). She has a… https://t.co/AeXxhRa7Ma
— Stop Hindu Hate Advocacy Network (SHHAN) (@HinduHate) June 7, 2026
लीसेस्टर हिंसा और हिंदुत्व विमर्श
साल 2022 में ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में हुए सांप्रदायिक तनाव के दौरान भी कल्पना विल्सन का नाम चर्चा में आया था। उस समय उन्होंने और उनसे जुड़े समूहों ने घटनाओं की व्याख्या हिंदुत्व राजनीति के संदर्भ में की थी। आलोचकों का कहना था कि इस तरह की व्याख्या में हिंदू समुदाय के खिलाफ हुई घटनाओं और चुनौतियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनके अनुसार यह दृष्टिकोण पहले से तय वैचारिक निष्कर्षों पर आधारित था।
भारत के मुद्दों पर लगातार आलोचनात्मक रुख
कल्पना विल्सन ने समय-समय पर कई ऐसे अभियानों का समर्थन किया है जिनका संबंध भारत की राजनीति और नीतियों से रहा है। उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध किया, विभिन्न मानवाधिकार अभियानों का समर्थन किया और कई सरकारी नीतियों की आलोचना की। उन्होंने स्टैन स्वामी और उमर खालिद जैसे विवादित मामलों पर भी सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखी। उनके समर्थक इसे मानवाधिकारों की पैरवी बताते हैं, जबकि आलोचक इसे एकतरफा वैचारिक सक्रियता के रूप में देखते हैं।

















