दिल्ली दंगा-2020 : इस्लामी आग भड़काने का षड्यंत्र
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दिल्ली दंगा-2020 : इस्लामी आग भड़काने का षड्यंत्र

दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय में एक शपथपत्र दिया है, जिसमें कहा गया है कि 2020 में दिल्ली में हुए दंगे केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए कराए गए थे। आरोपियों के विरुद्ध पर्याप्त प्रमाण हैं। इसलिए ये एक दिन भी जेल से बाहर रहने लायक नहीं हैं

Written byआशीष रायआशीष राय
Nov 11, 2025, 02:49 pm IST
in विश्लेषण, दिल्ली
दिल्ली दंगे के दौरान शाहरुख पठान नामक एक दंगाई पुलिस पर पिस्ताैल तानते हुए

दिल्ली दंगे के दौरान शाहरुख पठान नामक एक दंगाई पुलिस पर पिस्ताैल तानते हुए

वर्ष 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के मुख्य अभियुक्तों उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा और शिफा उर रहमान की जमानत याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा दायर किए गए 177 पृष्ठों के शपथपत्र ने देश को चौंका दिया है।

आशीष राय
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय

शपथपत्र में दिल्ली पुलिस का कहना है कि 2020 के दिल्ली दंगे ‘स्वतःस्फूर्त’ नहीं थे, बल्कि एक गहरी सुनियोजित आपराधिक साजिश का परिणाम थे। इस साजिश का उद्देश्य राज्य को अस्थिर करके सत्ता परिवर्तन करना था। यह षड्यंत्र तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के वक्त रचा गया था, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान आकर्षित किया जा सके और नागरिकता संशोधन कानून (सी.ए.ए.), 2019 के विरोध प्रदर्शनों को एक सांप्रदायिक तनाव के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

पर्याप्त साक्ष्य

शपथपत्र में यह भी बताया गया है कि साक्ष्य (जैसे व्हाट्सएप चैट, दस्तावेज आदि) से यह पता चलता है कि ऐसी अशांति को पूरे देश में फैलाने की योजना बनाई गई थी। पुलिस ने उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका को ‘प्रथम दृष्टया गंभीर’ बताया है। उन पर आरोप है कि उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए, समुदायों के बीच तनाव पैदा किया और विरोध प्रदर्शन को हिंसक रूप देने की दिशा में समूहों को संगठित किया। पुलिस ने कहा है कि उनके पास मौखिक, दस्तावेजी और तकनीकी साक्ष्य पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। शपथपत्र में यह भी कहा गया है कि संविधान अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता की गारंटी तो देता है, लेकिन विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसक या षड्यंत्रकारी गतिविधियां स्वीकार्य नहीं हैं।

सीएए कानून

दरअसल, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2019 में दुबारा सत्ता में आई राजग सरकार ने जुलाई में तीन तलाक पर मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम संसद से पारित कराकर कानून बना दिया। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 9 दिसंबर, 2019 को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम संसद में प्रस्तुत किया। यह कानून कहता है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई मत के शरणार्थियों को, जो 31 दिसंबर, 2014 तक भारत में प्रवेश कर चुके हैं, अब ‘गैरकानूनी प्रवासी’ नहीं माना जाएगा और वे भारतीय नागरिकता के पात्र होंगे। इस कानून में मुसलमानों को शामिल नहीं किया
गया था।

उत्तेजक भाषण

‘इकोसिस्टम’ ने षड्यंत्र पूर्वक सरकार के विरोध की कमान राजनैतिक हाथों में न देकर तथाकथित नागरिक संगठनों, छात्रों, युवाओं और महिलाओं को सौंपी जिससे यह संदेश जाए कि यह विरोध देश का आम नागरिक कर रहा है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह डर दिखा कर कि सी.ए.ए. को एन.आर.सी. (नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स) से जोड़ कर देश के मुसलमानों को ‘डिटेंशन सेंटर’ में डाल दिया जाएगा। इसके विरोध की शुरुआत उत्तर-पूर्वी राज्यों से कराई गई। फिर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, बिहार के साथ दिल्ली में प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली के जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय को केंद्र बना दिया गया।

15-16 दिसंबर, 2019 से दिल्ली के शाहीन बाग़ में लंबे समय तक सड़क बंद करके आंदोलन चलाया गया, फिर जाफराबाद दिल्ली को केंद्र बनाया। जनवरी–फरवरी 2020 के बीच मुंबई, लखनऊ, पटना, अमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलुरु आदि में रैलियां करके सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का प्रयास किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की यात्रा के दौरान 23-27 फरवरी, 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे कराए गए, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो गई।

751 एफ.आई.आर.

दिल्ली दंगों में 751 एफ. आई. आर. दर्ज हुई हैं। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ के समक्ष अभियुक्तों के सभी अधिवक्ताओं ने यही प्रश्न बार-बार उठाया कि इतनी एफ. आई. आर. में सिर्फ एक एफ. आई. आर. में इनके नाम हैं, लेकिन शायद वे भूल जाते हैं कि आतंकी घटना की एक एफ. आई. आर. ही पूरी साजिश से पर्दा उठाने के लिए काफी है, क्योंकि वही एफ. आई. आर. इस पूरे षड्यंत्र को सामने लाने वाली है।

ये सारे अभियुक्त भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए कानून अवैध गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) के अंतर्गत निरुद्ध हैं। सभी अभियुक्त लगभग साढ़े पांच साल से जेल में हैं और इनकी इसी अवधि को आधार बनाकर उनके अधिवक्ता उनकी जमानत पर जोर दे रहे हैं, जबकि अवैध गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 की धारा 43 डी के अनुसार ऐसे मामलों में प्रथम दृष्ट्या साक्ष्य मजबूत होने पर जमानत नहीं मिलती है। कांग्रेस व समाजवादी पार्टी से जुड़े इनके अधिवक्ताओं ने हिरासत की अवधि को आधार बनाकर अपनी बहस से अपराध की गंभीरता से पीठ का ध्यान भटकाने का प्रयास किया है।

न्यायालय को भ्रमित करने का प्रयास

शरजील इमाम की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अरविन्द कुमार ने उसके अधिवक्ता से जब यह प्रश्न किया कि भाषण में उसने क्या कहा है तब उसके अधिवकता ने न्यायालय को यह कहकर भ्रमित करने का प्रयास किया कि उसने सिर्फ चक्का जाम की बात की थी, जबकि शरजील इमाम के अपने कुछ भाषणों में साफ कहते हुए दिख जाता है कि यह केवल सी.ए.ए. का मामला नहीं है। वह तीन तलाक के कानून की भी बात करता है।

सड़क के साथ शहर बंद करने के लिए उकसाता है। ‘डिटेंशन सेंटर’ को आग लगाने की बात करता है और तो और उत्तर-पूर्वी राज्यों को भारत से अलग करने की बात भी करते हुए कहता है, “हम हिंदुस्तान और नॉर्थ ईस्ट को हमेशा के लिए बंद कर रहे हैं, हमेशा के लिए नहीं तो 1-2 महीने के लिए तो कर ही सकते हैं…. इतना मलबा डालो पटरी पर कि इनको हटाने में 1 महीना लगे। असम इंडिया से कट के अलग हो जाएगा, तभी यह हमारी बात सुनेंगे।” ऐसे उसके अनेक भाषण हैं। उसके सभी भाषण देश-विरोधी और सरकार को सत्ता से हटाने वाले प्रतीत होते हैं।

शिफा उर रहमान के अधिवक्ता ने तो इन विरोध प्रदर्शनों को वियतनाम युद्ध के समय हुए शिकागो ट्रायल से जोड़ कर दूसरी दिशा देने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि सरकारें कभी-कभी राजनीतिक असहमति को साजिश मान लेती हैं, पर वियतनाम युद्ध विरोध और दिल्ली दंगों की साजिश को एकरूप करना कहीं से भी बौद्धिक तर्क नहीं लगता है। वियतनाम युद्ध एक विदेश नीति विरोधी आंदोलन था, जबकि दिल्ली दंगा मामला घरेलू सांप्रदायिक हिंसा और यू.ए.पी.ए. आरोपों से जुड़ा है। दोनों की परिस्थिति और परिणाम बिल्कुल अलग-अलग हैं।

बिगड़ा खेल

दिल्ली पुलिस के शपथपत्र से यह स्पष्ट हो गया है कि उस देश विरोधी ‘इकोसिस्टम’ का उद्देश्य राज्य को अस्थिर करके सत्ता परिवर्तन करना था, परंतु दिल्ली पुलिस की तत्परता ने उसके पूरे खेल को बिगाड़ दिया। बाद के दिनों में देश ने देखा ही है कि कैसे श्रीलंका, बांग्लादेश फिर नेपाल में ऐसे ‘खेल’ सफल भी हुए हैं। इसीलिए सरकार ने उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा और शिफा उर रहमान की जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए स्पष्ट कहा कि इनके खिलाफ सारे सबूत मौजूद हैं और ये लोग एक दिन भी जेल से बाहर रहने के लायक नहीं हैं।

Topics: मीरान हैदरगुलफिशा फातिमाशिफा उर रहमानShifa Ur Rehman डोनाल्ड ट्रंपशरजील इमामउमर खालिदumar khalidदिल्ली दंगा-2020पाञ्चजन्य विशेषआशीष राय
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