ईरान, होर्मुज और परमाणु प्रश्न: संभावित अमेरिका–ईरान समझौते के पीछे असली दांव
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ईरान, होर्मुज और परमाणु प्रश्न: संभावित अमेरिका–ईरान समझौते के पीछे असली दांव

क्या प्राथमिकता केवल होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और युद्धविराम तक सीमित होनी चाहिए, या किसी भी समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी शामिल किया जाना चाहिए?

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Jun 8, 2026, 11:30 pm IST
inविश्व
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

जैसे-जैसे ईरान–इज़राइल–अमेरिका टकराव एक संभावित कूटनीतिक मोड़ की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है, नीति-निर्माताओं के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा है: क्या प्राथमिकता केवल होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और युद्धविराम तक सीमित होनी चाहिए, या किसी भी समझौते में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी शामिल किया जाना चाहिए?

पहली दृष्टि में केवल होर्मुज को खोलने वाला समझौता आकर्षक प्रतीत होता है। इससे ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे, व्यापक युद्ध का खतरा कम होगा और आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव झेल रही सरकारों को राहत मिलेगी। लेकिन, ऐसा समझौता तात्कालिक संकट का समाधान तो कर सकता है, जबकि मूल रणनीतिक समस्या को भविष्य के लिए छोड़ सकता है।

होर्मुज क्यों महत्वपूर्ण है?

होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसमें किसी भी प्रकार की बाधा तेल और गैस आपूर्ति, समुद्री परिवहन लागत, मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान जैसे खाड़ी देशों के लिए होर्मुज का खुला रहना आर्थिक आवश्यकता है। अमेरिका और यूरोप के लिए भी यह वैश्विक बाजारों की स्थिरता के लिए आवश्यक है। इसलिए सामान्य नौवहन की बहाली से सभी को तात्कालिक लाभ मिलेगा। लेकिन होर्मुज का महत्व हमें बड़े प्रश्न से विचलित नहीं करना चाहिए।

परमाणु प्रश्न ही वास्तविक मुद्दा है

मूल रणनीतिक प्रश्न यह है कि क्या ईरान इस संकट से अपनी परमाणु अवसंरचना और संवर्धन क्षमता को सुरक्षित रखते हुए बाहर निकलता है। यदि तेहरान अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार, तकनीकी विशेषज्ञता और भविष्य की संवर्धन क्षमता को बनाए रखने में सफल रहता है, तो वह यह दावा कर सकता है कि उसने सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना करते हुए भी अपनी सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति को बचाए रखा। ऐसी स्थिति में वर्तमान संकट तो समाप्त हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक विवाद बना रहेगा।

क्या है अमेरिकी दृष्टिकोण

वॉशिंगटन के लिए परमाणु प्रसार को रोकना एक प्रमुख उद्देश्य है। साथ ही अमेरिकी नीति-निर्माताओं को रणनीतिक लक्ष्यों के साथ घरेलू राजनीति, आर्थिक चिंताओं और लंबे सैन्य संघर्षों के प्रति जनता की अनिच्छा का भी ध्यान रखना पड़ता है। इसलिए केवल होर्मुज को खोलने वाला समझौता राजनीतिक रूप से आकर्षक हो सकता है। लेकिन यदि ईरान की क्षमता बढ़ती रहती है, तो भविष्य की अमेरिकी सरकारों के लिए परमाणु प्रश्न को सुलझाना और कठिन हो सकता है।

इजरायल की चिंताएं

इजरायल की चिंताएं केवल प्रत्यक्ष सैन्य टकराव तक सीमित नहीं हैं। परमाणु क्षमता वाला ईरान क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को बदल सकता है, तेहरान के प्रभाव को बढ़ा सकता है, उसके सहयोगी संगठनों को प्रोत्साहित कर सकता है और इजरायल की सुरक्षा गणनाओं को जटिल बना सकता है। भले ही प्रतिरोधक क्षमता प्रत्यक्ष युद्ध को रोक दे, फिर भी इजरायल ईरान के अनियंत्रित परमाणु कार्यक्रम को गंभीर रणनीतिक चुनौती के रूप में देखेगा।

खाड़ी देशों के लिए दांव सबसे बड़ा क्यों?

खाड़ी देशों के लिए यह मुद्दा अमेरिका से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। अमेरिका भौगोलिक रूप से दूर है और विशाल सैन्य शक्ति से सुरक्षित है। खाड़ी देश ईरान के पड़ोसी हैं और किसी भी क्षेत्रीय शक्ति परिवर्तन के परिणामों को प्रत्यक्ष रूप से झेलेंगे। उनकी चिंता केवल सैन्य नहीं है। अधिक शक्तिशाली और आत्मविश्वासी ईरानी धर्मतांत्रिक शासन पूरे क्षेत्र में सांप्रदायिक और कट्टरपंथी तत्वों को प्रेरित कर सकता है। इसी कारण अनेक खाड़ी नेता निजी तौर पर चाहेंगे कि परमाणु प्रश्न का समाधान अभी हो, न कि अनिश्चित भविष्य पर छोड़ दिया जाए।

भूला हुआ पक्ष: उदारवादी ईरानी

इस बहस का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर उपेक्षित पक्ष उदारवादी, सुधारवादी और धर्मतंत्र-विरोधी ईरानी भी हैं। दशकों से अनेक ईरानी राजनीतिक दमन का विरोध करते रहे हैं और अधिक स्वतंत्रता की मांग करते रहे हैं। उनमें से कुछ ने अंतरराष्ट्रीय दबाव को शासन को कमजोर करने के साधन के रूप में देखा है। यदि कोई समझौता शासन को लगभग यथावत बनाए रखते हुए उसकी प्रमुख रणनीतिक क्षमताओं को भी सुरक्षित रखता है, तो अनेक विपक्षी ईरानी यह महसूस कर सकते हैं कि परिवर्तन की उनकी आशाएं एक बार फिर टाल दी गई हैं।

रूस का प्रस्ताव: एक संभावित समझौता

चर्चा में आए विभिन्न प्रस्तावों में रूस का यह सुझाव ध्यान देने योग्य है कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम को विदेश में सुरक्षित रखा जाए या उसका रूपांतरण किया जाए। ऐसी व्यवस्था परमाणु प्रसार की आशंकाओं को कम कर सकती है और सभी पक्षों को कूटनीतिक सफलता का दावा करने का अवसर दे सकती है। यद्यपि इसकी राजनीतिक व्यवहार्यता अनिश्चित है, फिर भी यह उन कुछ प्रस्तावों में से एक है जो सीधे मूल समस्या को संबोधित करते हैं।

मूल प्रश्नों को अनसुलझा छोड़ दिया तो

ईरान को लेकर चल रही बहस केवल होर्मुज जलडमरूमध्य तक सीमित नहीं है। यह आज का संकट है; परमाणु प्रश्न आने वाले कल की चुनौती है। केवल नौवहन बहाली पर आधारित समझौता आर्थिक राहत और राजनीतिक अवसर प्रदान कर सकता है। लेकिन यदि वह ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं से जुड़े मूल प्रश्नों को अनसुलझा छोड़ देता है, तो क्षेत्र संभवतः एक बड़े संकट को केवल भविष्य के लिए टाल रहा होगा। सबसे टिकाऊ समाधान वही होगा जो तनाव-नियंत्रण, नौवहन की स्वतंत्रता और परमाणु प्रसार पर विश्वसनीय नियंत्रण – तीनों को साथ लेकर चले। किसी भी समझौते की वास्तविक सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसने आज का संकट समाप्त किया या नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि उसने कल के संकट को रोका या नहीं।

 

Topics: ईरान परमाणु कार्यक्रमपश्चिम एशिया संकटईरान अमेरिका तनावईरान अमेरिका इजरायल संघर्ष
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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