कुछ सैकड़ों साल के इतिहास वाला अमेरिका, हजारों साल की फली फूली सभ्यता को ध्वस्त करने पर तुला हो, और पल-पल की अनिश्चितता के बीच भारत के तपते इलाकों में अपनी नहीं, पशु-पक्षियों की चिंता में लोग जीवन खपा रहे हों, ये अद्भुत बात है। हजारों साल की ‘सभ्यता जनित साख’ (सिविलाइजेशनल गुडविल) ने जिस भारत को जागृत रखा है, वहीं के लोग सीमित संसाधनों में अपनी बसर करना तो जानते ही हैं, जीव-जंतुओं की बस्तियां भी उनका अपना परिवार ही हैं, ये उन्हें सिखाना नहीं पड़ा कभी। आधुनिक जीवनशैली में अपने हिसाब की बात ‘छांट’ कर, बाकी व्यर्थ का सब ‘काट’ कर एक तरफ रख दिया है इन ग्रामीण समाजों ने। किसी एसडीजी (सतत विकास लक्ष्य) के भरोसे नहीं बैठे हैं वो, अपने जीवन को सजा-संवारा रखना और सीमाओं को बांधने के साथ, समय की मांग हो तो उसे लांघ भी लेना, ये संकल्प शक्ति है इनमें।
ये सीख उनके पुरखों से, उनकी लोक संस्कृति, बोलियों और लू-आंधी-खारे कुओं से मिले कष्टों से उपजी है। प्रकृति का ये कड़ा प्रशिक्षण ही इन्हें उजड़ने से बचाए रखेगा, ये आश्वस्ति जीवन-धन है और अध्ययन का विषय भी। यहां सिर पर पानी ले जाती ‘पणिहारी’ के गीत तो गाये ही जाते हैं, पर इस दौर में पंक्ति से हट कर चल रहे ‘पणिहार’ भी हैं, जिन पर अगर कोई कथा-काव्य लिखा गया है, तो अवश्य प्रचलन में आना चाहिए। ये यहां का पुरुष समाज है, जो पानी, ओरण-गोचर, प्राकृतिक खेती और देसी रहन-सहन, और उसके लिए सही रीति-नीति सबके लिए अथक मेहनत करता दिख रहा है। इनके पीछे-पीछे लहंगा-लूगड़ी पहले मां, बहनें, पत्नी, बेटियां, भाई-बंधु तो हैं ही, जिनके सम्बल के बिना, पूर्ण समर्पण से सामाजिक कार्य करना संभव नहीं।
ढाणी की अगुवाई में नवाचार
भारत का पश्चिम भाग, देश के लिए सौभाग्य का प्रतीक रहा है। इसने भारत पाक युद्धों में कई आक्रमण झेले हैं और जमकर पलटवार किए हैं। इन दिनों सीमा से सटा हुआ ये इलाका, विश्व में तेल और गैस के संकट के बीच, देश की सबसे बड़ी रिफाइनरी को अपनी गोद में पलता देख रहा है। आत्मनिर्भरता की ओर दृढ़ता से बढ़ रहे भारत के इसी भू-भाग में एक ढाणी वो भी है जिसके सपने भी छोटे नहीं हैं। यहां के सूझ-बूझ वाले लोग, जीवन से अपने लगाव में कहीं पानी की बावड़ियां बना रहे हैं, कहीं पौधे रोप रहे हैं, कहीं ओरण-गोचर के आंदोलन से जन-जन को जोड़ रहे हैं और कहीं ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ (सर्कुलर इकॉनामी) के जीवन्त मॉडल खड़े कर रहे हैं।
ये बाड़मेर-जैसलमेर वह सीमावर्ती क्षेत्र है, जहां तापमान 50 डिग्री पार जाने में कभी नहीं हिचकता। यहां लगे बड़े-बड़े सोलर प्लांट, देश के लिए ऊर्जा तो पैदा कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए ये वही सौदेबाजी है, जिसमें जमीनें बिक जाती हैं, महंगी हो जाती हैं, संसाधन खप जाते हैं, और स्थानीय लोग ठगे से रह जाते हैं। स्थानीय जलवायु पर इसका कितना असर है इसके कोई भरोसेमंद आंकड़े नहीं हैं, लेकिन लोगों को हर साल बढ़ती गर्मी, बदलते मौसम चक्र से चकित वन्य जीव और पक्षियों के प्रजनन काल से ये आभास तो हो गया है कि विकास की दिशा ठीक किए बगैर पार नहीं पड़ेगी।
यहां की लंगेरा पंचायत में एक है ‘कोजाणियों की ढाणी’, जहां पर्यावरण पर जी तोड़ काम करने वालों द्वारा छेड़ा एक आंदोलन दशक भर से चल रहा है। सिर्फ पानी बचाने का नहीं, नए जलकुण्ड तैयार करने, पीपल वाटिका लगाने, गौरैया के लिए मिट्टी और नारियल के खोल से घोंसले तैयार करने, और दहेज जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ खुलकर बोलने का, साथ ही पर्यावरण चेतना जगाकर प्रेम भाव और गोचर-ओरण के प्रति संवेदना जगाने का भी। सोशल मीडिया की वजह से इन सब अच्छे कामों की भनक देश भर को लगने लगी है। यहां तक कि पड़ोसी देशों के यूट्यूबर भी इस काम को कवर करने आए और भारत के गुणगान में पीछे नहीं रहे। बाड़मेर शहर से 12 किलोमीटर दूर इस ढाणी में कई वनस्पतियां ऐसी हैं जो सूरज की तपिश में ही फलती-फूलती हैं, अनगिनत रेगिस्तानी जीव ऐसे हैं जो कम खान-पान में भी लम्बा जीवन जी लेते हैं, गोडावण जैसी दुर्लभ प्रजातियां हैं जिन्हें बचाने के लिए पक्षी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में काम कर रहे हैं।
अंधाधुंध विकास के पसरते पांव और जलवायु पर पड़ते दबाव के कारण पशु-पक्षी भी भूख प्यास से बिलखते हैं। लेकिन उन पर ध्यान उसी का जाता है, जिसे वो अपने घर परिवार के सदस्य जैसे लगते हैं। कोजाणियों की ढाणी के निवासी नरपत सिंह राजपुरोहित को न सिर्फ प्रकृति और प्राणियों से प्रेम है बल्कि पर्यावरण के लिए जूझने, पेड़ लगाने, वन्य जीव बचाने का काम किसी न किसी रूप में गांव-समाज के स्वभाव में रहा है। वो अपने घर के आस-पास के पेड़ और जीवों के लिए दाने-पानी की व्यवस्था तो करते ही रहे, घर के दायित्व को भी समझते हुए नरपत ने साल 2012-13 में मिठाई की दुकान खोल ली। पर उनका ‘जीव’ तो पर्यावरण-पशु-पक्षियों में अटका रहा। साल 2020 में सब काम-धंधा छोड़ कर रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के काम में अपने को पूरी तरह झोंक दिया। काम के व्यवस्थित स्वरूप के लिए ‘ग्रीन डेजर्ट संस्थान’ भी बना और सोशल मीडिया की भीड़ में एक साफ-सुथरा, सीधा-सादा काम भी दिखाई देने लगा।
कंठ रहें ‘तर’
घर खर्च का दायित्व घरवालों और भाई पर छोड़ कर, नरपत प्रकृति की सेवा में जिस तरह लगे हैं, उसमें माता-पिता तो साथ हैं ही, पूरा गांव, दूर-दराज के लोग इनकी पोस्ट देखकर, पूछताछ करने लगे हैं। सुझाव भी खूब आते हैं और इस तरह काम फैलने लगा है। धीरे-धीरे संसाधन जुटाकर, अपनी मोटर साइकल पर ही पूरी दौड़ धूप करने वाले नरपत से बात हुई, तो उन्होंने पहली ही बातचीत में स्नेह के सम्बन्ध जोड़ लिए। कहा, ‘दीदी, आप आकर देखो काम, आपका भाई जो कर रहा है, उस पर आपको गर्व होगा। यूं लोग उलाहना देने में पीछे कहां रहते हैं इसलिए समाज की सोच बदलने में जुटा हुआ हूं। मेरे साथ जो लोग शुरुआत में जुड़े थे, 80 प्रतिशत तो आज भी वही लोग साथ बने हुए हैं। राजनीतिक लोगों से दूरी रखता हूं, लेकिन सबको बुलाता हूं, काम दिखाता हूं। ये सोच सबके काम आए बस इतनी-सी बात है।’
नरपत ने सबसे पहले बीड़ा उठाया, जलकुण्ड बनाने का। इक्यावन रुपए से अधिक किसी से अपेक्षा नहीं रखी, तो लोगों ने जी भर कर मदद की। बस बूंद-बूंद ही इकट्ठा करते चले और जन-भागीदारी से 30-40 हजार की लागत से बाड़मेर-जैसलमेर के गांवों में नौ जलकुण्ड तैयार हो पाए। इनमें से एक बेहद ख़ास और सबसे बड़ा दूधरलाई में बना ‘वाइल्डलाइफ जलकुण्ड’ है जिसकी क्षमता एक लाख 12 हजार लीटर की है, और इसे बनाने में एक लाख 80 हजार का खर्च आया। समय-समय पर 800-900 रुपए के पानी के कई टैंकर डलवाने और इन कुण्डों की नियम से सफाई करने का काम नरपत अपने घर और आस-पास के बच्चों की टोली को साथ लेकर पूरी लगन से कर रहे हैं। गांव के बड़े, बुजुर्ग, महिलायें, बच्चे सब मिलकर जो बड़ी लकीर खींच रहे हैं, वो असल में लोभ-लालच की विषैली सोच की चपेट में ले रही जीवन शैली के विरुद्ध छेड़े गए युद्ध जैसा है।
आगे के लिए इस पूरे सीमावर्ती गांवों में नरपत ने 300 जलकुण्ड बनाने का लक्ष्य बनाया है। जिसकी तैयारी में वो अभी से दिन रात जुटे हैं जब गर्मी इतनी तीखी है कि दिन में घर से बाहर पांव रखना और दस मिनट वीडियो शूट करना भी परीक्षा से कम नहीं। अभी तक तैयार हुए जलकुण्डों में लोमड़ी, रेगिस्तानी बिल्लियां, हिरण सहित सभी पशु पक्षी पानी पीने आने लगे हैं। ये सब लिखते समय, इन्हीं इलाकों के कुछ युवा भी याद आते हैं जो प्रकृति और पर्यावरण के लिए इतना जूझे कि उन्हें अपनी जान भी जोखिम में डालनी पड़ी और जान से हाथ भी धोना पड़ा। लेकिन नरपत के जलकुण्ड बनाने के इस काम में कभी किसी ने कोई अड़चन पैदा नहीं की। लोग अपनी खुशी से जुड़ते हैं, नए कुण्ड की संभावना सुझाते हैं। नरपत भी सुझाव के बाद, उस स्थान का आकलन करने, नपाई, खुदाई, बनवाई करने खुद ही जाते हैं। हर तरह की विशेषज्ञता वाले लोग भी उनके साथ आते हैं तो पश्चिम के ‘पणिहार’ के अगाध प्रेम से अनुभूत होकर लौटते हैं।

मिठाई छोड़ी, मिठास घोली
पशु-पक्षी भी जलवायु बदलाव से बदले मौसम चक्र से बेहाल होते हैं। गर्मी में अनाज और पानी दोनों की खोज में रहते हैं तो रेतीले गांवों की सर्दी में छिपने और गर्माहट का आसरा ढूंढते हैं। उनके लिए जो भी कर सकते हैं, नरपत और उनका परिवार मिलजुल कर करता है। उनकी मां के खास लाड़ प्यार से उन्हें हिम्मत भी रहती है। पक्षियों को अनाज खिलाना हो, पानी के परीण्डे टांगना, थक कर घर लौटने पर मां के हाथ का चूरमा खाना, और छुट्टी के दिन बच्चों को ‘कैर’ बटोर कर लाने का काम सौंपना, यही जीवन चर्या रहती है। जलकुण्डों के काम में वो पिछले छह साल से जुटे हैं। इससे पहले उन्होंने तीन साल दो महीने साइकिल यात्रा कर देश-समाज के हाल चाल लिए और पर्यावरण चेतना के लिए पक्का मानस बनाकर जो काम शुरू किया, उसी ने उन्हें नई पहचान दी।
घायल या घरों में भूल से घुसे रेगिस्तानी जीवों के बचाव का काम भी वो करते ही हैं। तीस से अधिक मोर, उल्लू, बाज, सियाही, सांप, हिरण जैसे कई जीवों को उन्होंने नया जीवन दिया है। सबके जीवन की मिठास इसी में है कि हर एक अपने प्राकृतिक आवास और अपनों के बीच रह सकें। सिर्फ अपने लिए ही नहीं, आस पास ‘ओरण’ को लेकर चल रहे आंदोलन में भी नरपत ने सबके साथ महीना भर यात्राएं की। धरोहरों पर धोक लगाया, पुरखों को याद किया, महाराणा प्रताप और चेतक के बलिदान को नमन किया, पुष्कर के ब्रह्मा सरोवर में डुबकी लगाई और बुजुर्गों के साथ युवाओं की टोली ने ओरण-गोचर को बचाने की अलख जगाई। इस यात्रा में लोक गीत गाते कलाकार, रंग बिरंगी पगड़ी पहने बुजुर्ग और जगह-जगह बैठक कर अपनी बात कहने वाले युवा साथ रहे। यात्राओं के पड़ाव में ‘भाई तू कहां? भाई मैं यहां!’ ऐसी पुकार लगाकर खेला जाने वाला आंख मिचौली का खेल, ऐसी उद्देश्यपूर्ण कार्यों के बीच आनंद के क्षण थे और बन्धुत्व भाव का संदेश भी।
स्वस्थ क्रांति की धारा
देश के पहाड़ों में, वन में, रेगिस्तान में, मैदान में हर जगह गांव-ढाणी में ऐसे अनगिनत जुझारू लोग हैं, ऐसे कई चेतन संगठन हैं, जो केवल अपनी धरा, प्रकृति-संस्कृति और जीवों के लिए चिंतित हैं। जिन्हें ओछी राजनीति से चिढ़ है। जिन्हें गोशालाएं देखकर भी दुख होता है। ये लोग कस्बों और शहरों के तौर तरीके देखकर ये कहने में नहीं चूकते कि उन्हें ऐसी जगहें गायों के लिए जेलखाने जैसी लगती हैं और अपने गांव में खुली घूमती, चारा चरती गायें, सुखी और संपन्न। करुणा और समझदारी से भरी ये टोलियां, अपने-अपने गांवों में नए नवाचार कर रही हैं, जिसके लिए किसी भी तरह जन और धन दोनों जुटा लेते हैं, मन तो भरापूरा इनके पास है ही। जहां आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के नवाचार और भारी भरकम फंडिंग से निकले शोध पत्र, लोगों के दैनन्दिन कष्ट का समाधान नहीं दे पा रहे, वहीं आम लोगों के दिमाग की व्यवस्थित सोच से उपजे ‘जुगाड़’ बेहद कारगर हैं। अकादमिक जगत के अधिकांश शोध, लेखन और पेटेंट के अधिकांश नए विषय और खोज इन्हीं पर आकर खत्म होते हैं। गर्भ तो ग्राम ही रहेंगे, उसी भरोसे नगरीय सभ्यता फलती फूलती रही है।
इन्हीं सब के बीच दृष्टि वहां रहे जहां से ‘स्वस्थ क्रांति’ की धारा लगातार बह रही है। पश्चिम के इन गांवों का पानी भले ही खारा हो, मगर बोली खरी है, साग-सब्जी थोड़ी तीखी और सोच एकदम सादी। अपनी भाषा-बोली, देसी खान-पान और मूल विचार को बचाए रखना ही सेवा है। देशज पैमानों पर अपने काम को परखने की पगडंडियां भी इन्हीं प्रयासों और प्रकल्पों से निकलेंगी, ये तय है। हमारा पश्चिमी, समृद्धि की आधारशिला बना रहेगा और विश्व का पश्चिम भाग विनाश का इतिहास लिखते-लिखते हांफता-कांपता रहेगा। दोनों में इतना ही अंतर है, इतनी ही दूरी और इतना ही आकर्षण।
















