कुरुक्षेत्र के एलएनजेपी (LNJP) अस्पताल में नाबालिग मरीज से कथित दुष्कर्म के मामले ने हरियाणा की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह मामला केवल एक डॉक्टर के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों तक सीमित नहीं है। इसने अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही और नियुक्ति प्रक्रिया पर भी कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। डॉ. शैलेंद्र शैली का नाम पहली बार विवादों में नहीं आया है। वर्ष 2017 में उन पर एक महिला ने इलाज के बहाने नशीला इंजेक्शन देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया था।
उस मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई, गिरफ्तारी हुई और उन्हें जेल भी जाना पड़ा था हालांकि बाद में अदालत ने उन्हें उस मामले में बरी होने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद यह तथ्य अपनी जगह मौजूद है कि उनका नाम पहले भी महिला से छेड़खानी और अन्य गंभीर आरोपों से जुड़ चुका था। अब वर्ष 2026 में एक बार फिर उन्हीं पर एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती 15 वर्षीय नाबालिग बच्ची के साथ यौन शोषण और दुष्कर्म के आरोप लगे हैं।
आरोप इतने गंभीर हैं कि सरकार को तत्काल कार्रवाई करते हुए उनकी सेवाएं समाप्त करनी पड़ी, लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर अस्पताल के भीतर ऐसा माहौल कैसे बना, जहां एक भर्ती मरीज के साथ कथित तौर पर बार बार यौन उत्पीड़न होने के आरोप सामने आये। घटना के खुलासे के वक्त अस्पताल डॉक्टर ने मीडिया को जानकारी दी थी कि पीड़िता बच्ची का रक्त नहीं रुका तो उन्हें पता चला। यह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था की भी बड़ी विफलता है। अस्पताल में सुरक्षा कर्मी कहां थे।अस्पताल में नाबालिग बेटी पर लगातार यौन अत्याचार होता रहा है और अस्पताल के सुरक्षा प्रबंध गौण रहे। वार्डों की निगरानी कौन कर रहा था ? सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी ?

नाबालिग मरीजों और महिला मरीजों की सुरक्षा के लिये बने प्रोटोकॉल का पालन हो रहा था या नहीं ? ऐसे अनेक सवाल हैं, जिनका जवाब अभी तक सामने नहीं आया। इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू नियुक्ति और प्रशासनिक जांच से जुड़ा है। जिस व्यक्ति का नाम पहले गंभीर आपराधिक आरोपों में आ चुका हो, उसकी सेवा संबंधी फाइलों की समीक्षा किस स्तर पर हुई। यदि वह सेवानिवृत्ति के बाद दोबारा कंसलटेंट के रूप में नियुक्त किया गया था तो उसके लिये क्या प्रक्रिया अपनाई गई ? क्या उसके पूरे रिकॉर्ड की जांच की गई थी। यदि की गई थी तो उसके निष्कर्ष क्या थे, यदि नहीं की गई थी तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
हरियाणा सरकार ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई कर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है,लेकिन जनता केवल कार्रवाई नहीं, जवाब भी चाहती है। स्वास्थ्य विभाग को यह बताना होगा कि अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये कौन से कदम उठाये जा रहे हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये क्या नई व्यवस्था लागू की जाएगी। एलएनजेपी अस्पताल का यह मामला एक चेतावनी है। यह बताता है कि किसी भी अस्पताल की पहचान केवल भवनों और मशीनों से नहीं होती, बल्कि वहां भर्ती मरीज की सुरक्षा और सम्मान से होती है। यदि मरीज खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच के साथ साथ स्वास्थ्य विभाग को आत्ममंथन भी करना होगा,क्योंकि इस बार सवाल केवल एक डॉक्टर (सेवानिवृत्त चीफ मेडिकल आफिसर) पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर खड़े हो गए हैं।
विषय केवल इस पर खत्म नहीं होता कि आरोपी गिरफ्तार हो चुका है,उस पर सख्त कार्रवाई हुई है,उसे रिमांड पर भेजा है,बल्कि सबसे अहम यह है कि वे कौन प्रभावशाली लोग हैं, जिनकी बदौलत सेवानिवृत्त विवादित डाक्टर दुबारा 7 साल की सेवाओं के लिए वापस आया। और इस बार उसका शिकार बनी एक नाबालिग,हद तो यह है कि आरोपी ने इस घृणित कथित कांड को सरकारी भवन में बेखौफ अंजाम दिया और अस्पताल का पूरा सिस्टम धृतराष्ट्र बना रहा।आरोपी डॉक्टर ने पीड़िता बच्ची के साथ साथ अपने परिजनों की प्रतिष्ठा का भी बेशर्मी से हरण किया, इनके साथ उस पेशे के सम्मान पर भी कालिख पोती,जिसे लोग भगवान का दर्जा देते हैं।

















