पुण्यश्लोका लोकमाता वीरांगना अहिल्याबाई होल्कर, नारी से नारायणी तक की महान् यात्रा कर कीर्ति की अवस्था पर पहुंच गयी थीं, जिसकी व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में की थी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के दशम अध्याय के 34वें श्लोक में विभूति योग के आलोक में स्त्रियों की सर्वोत्तम विमाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि
“मृत्युः सर्वहरश्चाःमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।।
अर्थात् सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पत्ति होनेवालों का उद्भव मैं हूँ, तथा स्त्री-जाति में कीर्ति, श्री, वाक, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूं।
‘कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा’- कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा – ये सातों संसार भर की स्त्रियों में श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इनमें से कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा – ये पाँच प्रजापति दक्ष की कन्याएँ हैं, ‘श्री’ महर्षि भृगुकी कन्या है और ‘वाक्’ ब्रह्मा जी की कन्या है।
नारी से नारायणी तक की महान् यात्रा
कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा,धृति और क्षमा – ये सातों स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी संसार में प्रसिद्ध हैं। सद्गुणों को लेकर संसार में जो प्रसिद्धि है, प्रतिष्ठा है, उसे कीर्ति कहते हैं। कीर्ति की यही अवस्था देवी अहिल्याबाई होल्कर को प्राप्त हुई थी। लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर, नारी से नारायणी तक की महान् यात्रा में स्त्रियों के विविध स्वरूपों को निष्ठापूर्वक आत्मसात कर न केवल भारत वरन् संपूर्ण विश्व में नारी विमर्श का आदर्श स्थापित करती हैं।
बेटी से बहू, बहु से महारानी, महारानी से मालवा की सुनबाई, महारानी से राजमाता, राजमाता से लोकमाता, लोकमाता से पुण्यश्लोका, पुण्यश्लोका से देवी तक, अहिल्या बाई होल्कर ने नारी से नारायणी तक स्त्रियों की सभी विमाओं को सफलतापूर्वक चरितार्थ किया।

ऋग्वेद के देवी सूक्त में मां आदिशक्ति स्वयं कहती हैं,
“अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां,
अहं रूद्राय धनुरा तनोमि “…
अर्थात् मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूँ, और मैं ही रुद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं। हमारे तत्वदर्शी ऋषि मनीषा का उपरोक्त प्रतिपादन वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता का द्योतक है, जिसका स्वरुप महान् वीरांगना लोकमाता देवी अहिल्या बाई होल्कर में आलोकित होता है।
मातृशक्ति हिंदुत्व का मूलाधार
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कल्चरल मार्क्सिज्म ने नारी विमर्श को लेकर न केवल भारत वरन् संपूर्ण विश्व में घिनौना वातावरण निर्मित किया है, उसके परिहार के लिए लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का इतिहास रामबाण है। अहिल्याबाई होल्कर भारतीय नारी का आदर्श प्रस्तुत करती हैं,कि किस तरह जीवन के संग्राम में स्त्रियाँ स्व के लिए मां,बेटी, बहन, पत्नी के रुप में देश की रक्षा के लिए अनादि काल से पूर्णाहुति देती आ रही हैं और दे रहीं हैं, जिनकी आस्था और समर्पण अटल है और उन्हें विपरीत परिस्थितियाँ भी हरा नहीं सकीं। हिन्दुओं में बेटी का जन्म एक परिवार, एक कुटुम्ब का जन्म है इसलिए मातृशक्ति हिंदुत्व का मूलाधार है।
मालवा की महान् वीरांगना लोकमाता देवी अहिल्याबाई की वीर गाथा का स्मरण करता हूँ, तो उनमें विश्व की श्रेष्ठतम वीरांगना गढ़ा-कटंगा साम्राज्य की राजमाता रानी दुर्गावती का अक्स दिखता है, वही देवीय स्वरूप, वही तेज, वही स्वाभिमान, वही कर्तव्य बोध, वही मातृ बोध, वही राष्ट्र के लिए आत्मोत्सर्ग की ललक दिखती है। इन दोनों महान् वीरांगनाओं की विषम पारिवारिक परिस्थितियाँ भी एक जैसी ही बनी थीं,परन्तु उन परिस्थितियों में भी विजय प्राप्त कर दोनों नारी सशक्तिकरण की अभूतपूर्व मिसाल बनी।

चुनौतियों से भरा अहिल्याबाई का जीवन
महारथी पेशवा बाजीराव प्रथम की धमक से मुगल साम्राज्य का मृत्युनाद बज गया था और सर्वत्र हिंदुत्व की जय-जयकार हो रही थी। ऐसे स्वर्णिम काल में चौंडी गाँव के पाटिल मनको जी राव शिंदे और सुशीला बाई शिंदे के यहां 31मई, सन् 1725 को एक देदीप्यमान कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम अहिल्याबाई रखा गया। मालवा के स्वामी मल्हार राव होल्कर ने चौंडी प्रवास के समय अहिल्याबाई के गुणों को देखकर अपने बेटे खंडेराव से विवाह के लिए प्रस्ताव रखा। विवाह के उपरांत अहिल्याबाई होल्कर की बिंदु से विराट तक की यात्रा आरम्भ हुई।
अहिल्याबाई का जीवन उतार-चढ़ाव और चुनौतियों की अनोखी दास्तान है। सन् 1754 में उनके पति खंडेराव कुंभेर के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। सन् 1766 में उनके ससुर मल्हार राव होल्कर की भी मृत्यु हो गई। सन् 1767 में उनके पुत्र मालेराव होल्कर की भी मृत्यु हो गई। फिर भी अहिल्याबाई विचलित नहीं हुई और कुशलता पूर्वक भगवान शिव की सेविका (प्रतिनिधि ) के रूप में मालवा का साम्राज्य संभाला।

भगवान शिव की अनन्य भक्ति
मालवा साम्राज्य की महान् साम्राज्ञीअहिल्याबाई होल्कर भगवान शिव की अनन्य और परम भक्त थीं। उनकी शिव भक्ति इतनी गहरी थी कि उनका जीवन और शासन इसी पर केंद्रित था। वे राजकाज को अपना नहीं बल्कि भगवान शिव का कार्य मानती थीं। उनकी सभी राजाज्ञाओं (आधिकारिक फैसलों) पर ‘श्री शंकर आज्ञा’ लिखा होता था। उन्होंने राजदरबार के मुख्य सिंहासन पर भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की थी और स्वयं एक साधारण गद्दी पर बैठकर पूरे राज्य का संचालन करती थीं।
लोकमाता का शासन प्रबंध रामराज्य का उत्कृष्ट उदाहरण
इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर (1766 –1795) का शासन प्रबंध “रामराज्य” का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है, जिसे मालवा का ‘स्वर्ण युग’ भी कहा गया है। उनके तीन दशकों के शासनकाल को प्रजा कल्याण, न्याय और सुशासन का स्वर्ण युग कहा जाता है। उन्होंने स्वयं को कभी शासक नहीं माना, बल्कि जनता का सेवक समझकर राज-काज चलाया। उनकी शासन व्यवस्था कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर केंद्रित थी। उनका मानना था कि राज्य की संपत्ति जनता की भलाई के लिए है। उन्होंने कृषि को बढ़ावा दिया, कर (टैक्स) की दरें कम रखीं, और व्यापार-उद्योग को प्रोत्साहित किया। उनकी न्याय प्रणाली अत्यंत निष्पक्ष थी। अपराधी चाहे कोई भी हो, उन्हें कानून के अनुसार सजा मिलती थी।

उन्होंने अपने ससुर के नियमों को आधार बनाकर सरल और सुलभ न्याय की व्यवस्था की। सामाजिक समरसता की प्रबल पक्षधर थीं, उन्होंने जाति या वर्ग के आधार पर कभी भेदभाव नहीं किया। भील और गोंड जैसे वंचित जनजाति समुदायों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा और उनकी आजीविका के साधन सुनिश्चित किए। धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किए। उन्होंने देश भर में मंदिरों, घाटों, धर्मशालाओं और कुओं का निर्माण कराया। इसमें काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार और महेश्वर (उनकी राजधानी) का विकास शामिल है। सैन्य एवं रक्षा प्रबंध उच्च कोटि का था। उनके पास एक सुसज्जित सेना थी। बाहरी आक्रमणों से निपटने के लिए उन्होंने अपनी सेना को मजबूत किया और स्वयं भी युद्ध के मैदान में रणनीतियां बनाईं।
महान योद्धा और कूटनीतिज्ञ
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर एक महान योद्धा और दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ थीं। उनके व्यक्तिगत जीवन और शासनकाल में कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े गए, जिनमें उनका योगदान ऐतिहासिक और प्रेरणादायक है। प्रथम कुंभेर का युद्ध (सनन् 1754 ) यह वह युद्ध था,जिसमें अहिल्याबाई के पति, खांडेराव होल्कर वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस दुखद घटना के बाद उनके ससुर, मल्हारराव होल्कर ने उन्हें सती होने से रोका और उन्हें युद्ध-कौशल और कूटनीति में प्रशिक्षित किया। द्वितीय -गोहद का युद्ध (सन् 1765 )जब अहमद शाह अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण किया और मल्हारराव होल्कर दिल्ली में युद्ध कर रहे थे, तब अहिल्याबाई ने अपनी घुड़सवार सेना का नेतृत्व करते हुए ग्वालियर के पास गोहद के किले पर विजय प्राप्त की और मराठा पताका फहराई। तृतीय उदयपुर और रामपुर की संयुक्त सेना से युद्ध – रामपुर के सरदार ने उदयपुर की सेना की सहायता से मालवा से विद्रोह किया, तो अहिल्याबाई ने इंदौर की कमान संभाली, और विजयश्री प्राप्त की। अन्य पड़ोसी राज्यों को भी परास्त किया।
चतुर्थ – राघोबा ( अल्पकालिक पेशवा) का आक्रमण (सन् 1768 )-इंदौर की सत्ता हथियाने के लिए रघुनाथराव (राघोबा) ने अपनी सेना भेजी। अहिल्याबाई ने डटकर मुकाबला किया और राघोबा को कड़ा पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि युद्ध में हार-जीत तो लगी रहती है, लेकिन एक महिला से युद्ध करके राघोबा इतिहास में अपना नाम कलंकित करेंगे। परिणामस्वरूप, शर्मिंदा होकर राघोबा को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। इस तरह अहिल्याबाई होल्कर ने बिना लड़े ही रघुनाथ राव को हरा दिया। यह अहिल्याबाई होल्कर की सबसे बड़ी कूटनीतिक विजय थी।
राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किया
राजमाता अहिल्याबाई होल्कर एक महान् और दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ थीं,उन्होंने 1766 से 1795 तक अपने शासनकाल में युद्ध और कूटनीति के जरिए मालवा की सीमाओं की रक्षा की। क्षेत्रीय शांति के लिए उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीतिक संधियों और बुद्धिमत्ता का सहारा लिया मराठा साम्राज्य के अन्य प्रमुख शासकों-सिंधिया, भोसले और गायकवाड़-के साथ उन्होंने हमेशा मधुर और सहयोगी संबंध बनाए रखे। उन्होंने मालवा में लूटपाट करने वाले भीलों और डाकुओं से लड़ने के बजाय, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की कूटनीति अपनाई। उन्होंने उन्हें अपनी सुरक्षा और कृषि कार्य में लगाकर शांति स्थापित की।धार्मिक एवं सांस्कृतिक कूटनीति के अंतर्गत अहिल्याबाई ने भारत के विभिन्न हिस्सों में मंदिर (जैसे काशी विश्वनाथ), घाट और धर्मशालाएं बनवाई यह केवल उनकी धर्मपरायणता नहीं थी, बल्कि इसके पीछे संपूर्ण भारत को सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से एकजुट रखने की एक गहरी और महान् राजनीतिक दूरदर्शिता थी।
तो अंग्रेजों का प्रभुत्व नहीं होता
उल्लेखनीय है कि यदि तत्कालीन पेशवा और रघुनाथ राव ने राजमाता अहिल्याबाई होल्कर की बात मान ली होती तो भारत में अंग्रेजों का प्रभुत्व कभी स्थापित न हो पाता! अहिल्याबाई होल्कर ने अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति को देखते हुए, एक पत्र के माध्यम से पेशवा और रघुनाथ राव से अंग्रेजों को कुचल देने की सलाह दी थी। इसका खुलासा जॉन मेल्कम ने भी किया है। जिसमें संदेश था कि “शेर जैसे जानवर को तरकीब या ताकत से मारा जा सकता है परंतु रीछ को मारना कठिन होता है, वह तभी मारेगा जब उसका मुंह कुचला जा जाएगा।”
अहिल्याबाई होल्कर की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था
महारानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था अद्भुत थी। महेश्वर को अपनी राजधानी बनाकर दूरदर्शी और निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। उनका न्याय निष्पक्ष और पारदर्शी था, जहाँ राजा या राजपरिवार भी कानून से ऊपर नहीं था। अपने पुत्र को भी नियम तोड़ने पर उचित दंड देने में उन्होंने संकोच नहीं किया। कृषि को बढ़ावा देने के साथ-साथ उन्होंने महेश्वर में कपड़ा उद्योग को स्थापित किया। प्रजा की सुविधा के लिए सड़कों, कुओं और धर्मशालाओं का जाल बिछाया।सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने अयोध्या, काशी, सोमनाथ और बद्रीनाथ जैसे देशभर के प्रमुख मंदिरों, तीर्थस्थलों और घाटों का जीर्णोद्धार कराया। धार्मिक सद्भाव को सर्वोपरि रखा उनके राज्य में हिंदू और मुस्लिम सभी समुदायों को सम्मान और समान सुरक्षा प्राप्त थी, जिसके कारण उनके शासनकाल में कोई भी सांप्रदायिक विद्रोह नहीं हुआ।
विश्वासपात्र मंत्री और सेनापति
महारानी अहिल्याबाई होलकर की प्रशासनिक व्यवस्था अत्यंत कुशल और सुव्यवस्थित थी। उनके प्रमुख मंत्रियों, सेनापतियों और प्रशासनिक अधिकारियों में तुकोजीराव होल्कर को अहिल्याबाई ने उन्हें अपनी सेना का प्रमुख सेनापति नियुक्त किया था। उन्होंने अहिल्याबाई के साथ मिलकर 28 वर्षों तक सैन्य अभियानों और प्रशासनिक मामलों का कुशलतापूर्वक संचालन किया। गंगाधर यशवंत एक प्रमुख मंत्री और विश्वासपात्र थे, जो प्रारंभिक दौर में अहिल्याबाई के सलाहकार के रूप में कार्य करते थे। विश्वजी शामराज देशपांडे कूटनीतिक मामलों में अत्यंत निपुण अधिकारी थे, जिन्होंने अहिल्याबाई के समय में पेशवा दरबार और अन्य मराठा शासकों के साथ संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फ्रांसीसी अधिकारी शेवेलियर डुड्रेनेक, अहिल्याबाई द्वारा नियुक्त किए गए, जिन्होंने होल्कर सेना की आधुनिक बटालियनों के आधुनिकीकरण का कार्यभार संभाला था।
कल्याणकारी अर्थव्यवस्था
महारानी अहिल्याबाई होल्कर की अर्थव्यवस्था जन-कल्याणकारी और व्यापार-समर्थक थी। उन्होंने कृषि विकास को बढ़ावा दिया, कर प्रणाली को सरल बनाया और हथकरघा उद्योग (माहेश्वरी साड़ी) को स्थापित कर स्थानीय कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाया। उनके दूरदर्शी आर्थिक निर्णयों ने मालवा को एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य बना दिया। कर प्रणाली सुधार कर पारदर्शिता रखी। उन्होंने व्यापारियों और किसानों पर से भारी कर हटाए और एक पारदर्शी एवं भ्रष्टाचार-मुक्त प्रणाली लागू की। व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने चुंगी कर में विशेष छूट दी।
कृषि पर ध्यान दिया
कृषि के विकास के लिए किसानों को वित्तीय सहायता दी जाती थी, सिंचाई के लिए कुएं खुदवाए गए, और बंजर भूमि को खेती योग्य बनाया गया। उद्योग और व्यापार (माहेश्वरी साड़ी) के क्षेत्र में उन्होंने माहेश्वर को अपनी राजधानी बनाया और वहाँ हथकरघा उद्योग की नींव रखी। बेहतरीन कारीगरों को बुलाकर उन्होंने माहेश्वरी साड़ियों का उत्पादन प्रारम्भ करवाया , जिससे राज्य के लिए एक मजबूत आय का स्रोत तैयार हुआ और स्थानीय बुनकरों को रोजगार मिला। व्यापारिक मार्गों का संरक्षण हेतु उन्होंने लुटेरों से व्यापारियों के काफिलों की रक्षा के लिए सुरक्षा बल तैनात किए। उन्होंने व्यापारियों को ऋण और व्यापारिक ढाँचे की सुविधा भी प्रदान की। जन-कल्याण और आय की दृष्टि से राज्य के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं के निर्माण में खर्च किया जाता था, जिससे पूरे भारत से तीर्थयात्री मालवा की ओर आकर्षित होते थे, और राज्य के व्यापार को बहुत बढ़ावा मिलता था।

जल प्रबंधन और संरक्षण
रानी दुर्गावती के समान ही लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का जल प्रबंधन और संरक्षण उनकी दूरदर्शिता का एक बेहतरीन उदाहरण था। उन्होंने अपने शासनकाल में न केवल पीने के पानी की समस्या का समाधान किया, बल्कि कृषि और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए भी व्यापक कदम उठाए। अहिल्याबाई होल्कर का जल प्रबंधन अद्भुत था, उन्होंने सार्वजनिक जल संरचनाओं का निर्माण के अंतर्गत अपने राज्य मालवा (मध्य प्रदेश) और राज्य की सीमाओं के बाहर पूरे भारत में (विशेषकर तीर्थ स्थलों पर) सैकड़ों कुओं, बावड़ियों (सीढ़ीदार कुएं), और जलाशयों का निर्माण करवाया। नियोजित जलापूर्ति के अंतर्गत पीने और सिंचाई की व्यवस्था को आसान बनाने के लिए उन्होंने कई झीलों और तालाबों का निर्माण करवाया (जैसे महाराष्ट्र के अंबड शहर की पेयजल मांग के लिए ‘कावंडी झील’)।
गर्मियों में विशेष प्रबंध: ग्रीष्मकाल में राहगीरों और जानवरों को पानी की कमी न हो, इसके लिए कुओं और बावड़ियों पर विशेष कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता था। पर्यावरण और जल संरक्षण का समन्वय स्थापित करने के लिए,जलस्रोतों के आसपास छायादार वृक्षारोपण करवाया जाता था और पेड़ों की सिंचाई, तालाबों में मछलियों को भोजन देने और पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था के लिए स्थायी कर्मचारी रखे जाते थे। सिंचाई और कृषि: किसानों को उन्नत कृषि के लिए पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु नहरों और छोटे बांधों की व्यवस्था की गई। आज भी उनके द्वारा निर्मित प्राचीन जल स्रोतों, जैसे इंदौर क्षेत्र के अहिल्या कुंड और विभिन्न बावड़ियों का जीर्णोद्धार करके जल संरक्षण की उनकी विरासत को सहेजा जा रहा है।
जनजातियों की भलाई की
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने जनजातियों की भलाई और सुरक्षा के लिए कई क्रांतिकारी और दूरदर्शी कदम उठाए थे। मुग़ल और ब्रिटिश आक्रांताओं की नीतियों के कारण मालवा क्षेत्र के भील, गोंड और रामोशी जैसी जनजातियाँ आजीविका के अभाव में वन क्षेत्रों में रहने और भटके हुए रास्तों पर चलने लगी थीं। इसे नियंत्रित करने के लिए महारानी अहिल्याबाई ने उन्हें ‘रक्षक’ बनाया। उन्होंने व्यापारियों और यात्रियों की सुरक्षा और मार्ग कर वसूली की ज़िम्मेदारी इन्हीं स्थानीय जनजातियों को सौंपकर उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा। आर्थिक स्वावलंबन और पुनर्वास के अंतर्गत जनजातियों को जंगलों से निकालकर कृषि कार्य, हथकरघा (प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के उद्योग) और अन्य आर्थिक गतिविधियों में रोज़गार दिया। इससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी और वे समाज में सम्मानजनक जीवन जीने लगे।अपराध मुक्त समाज का निर्माण हुआ,तत्कालीन परिस्थितियों और विदेशी आक्रांताओं की वजह से कई जनजातीय समूह दंडित या वंचित होकर व्यवस्था के विरोधी हो गए थे। रानी अहिल्याबाई ने उनके साथ प्रेम और विश्वास का रिश्ता स्थापित किया और उन्हें अपराध के रास्ते से दूर किया।
मंदिरों और स्मारकों का जीर्णोंद्धार
लोक माता अहिल्याबाई होल्कर का शासन काल हिंदुओं के मंदिरों और स्मारकों के जीर्णोंद्धार का काल भी है, जिन्हें मुस्लिम आक्रांताओं ने एक लंबे कालखंड के दौरान नष्ट -भ्रष्ट कर दिया था। इंदौर की महान् महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पूरे भारत में 12 ज्योतिर्लिंगों सहित हजारों मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण और जीर्णोद्धार करवाया। उदाहरण के लिए मुगलों द्वारा नष्ट किए गए मूल मंदिर के समीप ही 1780 ई. में वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्याबाई द्वारा ही करवाया गया था। मुस्लिम आक्रांताओं से जर्जर हुए सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। मुख्य मंदिर के समीप स्थित पुराना अहिल्याबाई मंदिर, उनकी आस्था का जीवंत प्रमाण है। बिहार के गया में फल्गु नदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर का 1787 में महारानी अहिल्याबाई द्वारा जीर्णोद्धार कराया गया था। महाराष्ट्र में स्थित प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग, ग्रिशनेश्वर (औरंगाबाद) और औंधा नागनाथ (हिंगोली) का जीर्णोद्धार भी उन्होंने ही करवाया। उन्होंने बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी (चार धाम) के अलावा हरिद्वार में कुशावर्त घाट और वाराणसी में मणिकर्णिका घाट का भी भव्य निर्माण कराया।
नारी सशक्तिकरण की अद्वितीय प्रतीक
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर नारी सशक्तिकरण की एक अद्वितीय प्रतीक और अग्रदूत थीं। उन्होंने महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, और व्यक्तिगत अधिकारों के उत्थान के लिए कई साहसिक कार्य किए। विधवाओं के संपत्ति संबंधी अधिकार को सुरक्षित किया। उस समय विधवाओं को उनके पतियों की संपत्ति से वंचित कर दिया जाता था। अहिल्याबाई ने कानून बनाया कि यदि किसी महिला का पति या बेटा न हो, तो भी उसकी संपत्ति जब्त नहीं होगी और वह अपनी संपत्ति का पूर्ण उपयोग कर सकती है। दत्तक पुत्र के संबंध में उन्होंने विधवा महिलाओं को अपनी इच्छा से वारिस (दत्तक पुत्र) गोद लेने का कानूनी अधिकार दिया। सती प्रथा का विरोध: उन्होंने अपने राज्य में सती प्रथा का कड़ा विरोध किया और इसे रोकने के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन का उदाहरण भी पेश किया। महिला शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण की व्यवस्था की। उन्होंने महिलाओं के लिए नियमित शिक्षा की व्यवस्था की। इसके साथ ही, उन्होंने अपनी सेना में महिलाओं की एक विशेष टुकड़ी (महिला बटालियन) तैयार की और उन्हें युद्ध कौशल का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने गरीब,बेसहारा और संघर्षरत महिलाओं को रोजगार से जोड़ा और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया। आज भी उनके विचारों और कार्यों से प्रेरित होकर ‘देवी अहिल्या नारी शक्ति करण मिशन” और महिला स्टार्टअप योजना जैसी योजना संचालित की जा रही हैं।
न्यायप्रियता की प्रमुख विशेषता
लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर अपनी निष्पक्ष न्यायप्रियता, दयालुता और जनकल्याणकारी शासन के लिए इतिहास में अमर हैं। उनके शासन की न्याय प्रणाली समानता, मानवीय दृष्टिकोण और निष्पक्षता पर आधारित थी। उनकी न्यायप्रियता की प्रमुख विशेषता थी कि राजा और रंक में कोई भेद नहीं होना चाहिए।अहिल्याबाई के दरबार में सभी नागरिक समान थे। न्याय करते समय वे कभी अपने पद या रिश्ते का दबाव नहीं आने देती थीं। उनके न्याय में कठोर दंड के साथ-साथ सुधरने का मौका और मानवीय संवेदना भी शामिल होती थी। उनके दरबार में आए गायों से जुड़े न्याय के प्रसिद्ध प्रसंग बताते हैं कि वे अपराधियों को पश्चाताप का अवसर देने और सही मार्ग दिखाने में विश्वास रखती थीं। स्वयं के पुत्र को भी सजा देने से संकोच नहीं किया।सदाचार और सादगीपूर्ण जीवन उनके आदर्श था, वे खुद एक झोपड़ी में सादा जीवन व्यतीत करती थीं। उनका मानना था कि राजकोष का धन प्रजा की भलाई और न्याय के लिए है, न कि राजसी विलासिता के लिए। उनका मूल मंत्र था—”प्रजा ईश्वर का रूप है और उसकी सेवा ही सच्ची पूजा है।” उनके उत्कृष्ट न्याय और सुशासन के कारण ही उन्हें इतिहास में ‘लोकमाता’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। मालवा की महान् रानी अहिल्याबाई होल्कर को उनके ममतामयी, न्यायप्रिय और परोपकारी स्वभाव के कारण ‘मां साहिब की उपाधि भी दी गई है।
प्रशंसा पत्रों को नर्मदा में प्रवाहित किया
वीरांगना रानी अहिल्याबाई होल्कर की एक सबसे बड़ी महानता यह भी रही है कि वे चापलूसी और अपनी झूठी प्रशंसा से दूर रहीं। उन्होंने चाटुकारिता (चापलूसी) और अपनी झूठी प्रशंसा को रोकने के लिए अपनी प्रशंसा में लिखे गए पत्रों और स्तोत्रों को मुख्य रूप से माँ नर्मदा नदी में बहा दिया था। उन्हें अपने गुणगान सुनना बिल्कुल पसंद नहीं था और वे मानती थीं कि उनकी प्रजा और संपत्ति ईश्वर की धरोहर हैं, इसलिए वे केवल उनकी सेविका हैं।
ऐतिहासिक और पुराना पौराणिक संदर्भों में कहा गया है कि
“पुण्यश्लोको नलो राजा,
पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः ।
पुण्यश्लोको विदेहश्च
पुण्यश्लोको जनार्दनः ।।
जहाँ ‘पुण्यश्लोक’ का अर्थ है-वह व्यक्ति जिसका नाम लेने मात्र से मन पवित्र हो जाए और पुण्य की प्राप्ति हो। यह उपाधि उन आदर्श, धर्मात्मा और न्यायप्रिय शासकों को दी जाती है, जिन्होंने प्रजा-कल्याण और धर्म की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।श्लोक के अनुसार राजा नल को अपनी अटूट सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और प्रेम के लिए,राजा युधिष्ठिर को महाभारत काल में धर्म, सत्य और न्याय के प्रतीक के लिए, विदेह राज्य के और राजा जनक को महान ज्ञानी, प्रजापालक और आदर्श राजा के लिए पूर्णश्लोक का दर्जा प्राप्त हुआ है, और जनार्दन तो स्वयं पूर्णश्लोक हैं,परंतु स्त्रियों के भारतीय इतिहास में यह दर्जा वैदेही के उपरांत ,होल्कर राजवंश की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को प्राप्त हुआ,उनके जनहित के कार्यों, मंदिर-निर्माण और न्यायप्रियता के कारण विशेष रूप से ‘पुण्यश्लोका’ की उपाधि से अभिहित कर सम्मानित किया गया है। जिसका शाब्दिक अर्थ ‘पवित्र मन्त्रों की तरह शुद्ध’ से है।

















