प्रभात की प्रथम किरण जिसके सात रंग सामवेद से निकले सप्तक के सातों स्वरों को स्पर्श करते ही जो ध्वनि निकलती है, वही है…शास्त्रीय संगीत। धरा पर कोमल मन को जगाकर दूर-दूर तक जाकर ठहर जाना, एक उद्देश्यपूर्ण यात्रा जो जीवन को अर्थ ज्ञान मनोभावों से जुड़ी चेतना, अपने अस्तित्व में ईश्वर को सिद्ध करना, सामवेद का निष्कर्ष, दर्शन की सर्वोच्च और अंतिम शाखा (वेदान्त-दर्शन) यह आत्मा (स्वयं) की दिव्यता, ईश्वर का स्वरूप जो संसार के साथ संबंध की व्याख्या करता है…संगीत।
भारतीय संगीत की प्रमुख विशेषताएं
आधार: यह नाद ब्रह्म (ध्वनि ईश्वर है) के सिद्धांत पर आधारित है।
राग और ताल: प्रत्येक राग का निश्चित नियम होता है जो दिन के प्रहर और मौसम से जुड़ा होता है।
घराना परंपरा: ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से मौखिक रूप से दिया जाता है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत विश्व के सबसे प्राचीन और समृद्ध परम्पराओं में से एक है जो वेदों में साम वेद से उत्पन्न हुआ है स्वर,लय और ताल का एक सुव्यवस्थित और कलात्मक संयोजन है,जो भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। भारतीय कला के अनुसार: गायन,वादन और नृत्य इन तीनों के सम्मिलित रूप है संगीत। सुरीली ध्वनियों के माध्यम से मानव भावनाओं सौंदर्य और आनंद की अभिव्यक्ति है संगीत।

साधना का संचित चेतन रूप है संगीत
संगीत केवल शब्दों का संग्रह नहीं,बल्कि साधना का संचित चेतन रूप है जिसमें जीने की एक सुन्दर शैली है। जब हम इसे हर दिन जीते हैं तो जीवन में शान्ति, आनंद और उत्साह का संतुलन बना रहता है। मन को सुकून देता है और हमें स्वयं से जोड़ता है।
सही स्वर सही श्रुति लगते ही मानो ईश्वर सदृश हो जाते हैं। सुरों में छिपी धुन से ठूंठ पड़े पेड़ों में हरियाली छा जाती है। ईश्वर कहीं दूर नहीं हमारी आत्मा से निकले नाद में है। संगीत, साधना और आराधना, जीवन की सारी खुशियों का एक अनुपम आधार बन जाता है जो हमें बार-बार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करते हैं।
बारिश की पहली गंध भी मौन स्वर से सुर लगाती है। बूंदों की टप-टप भी संगीत में घुल कर हमारी आत्मा हमारी चेतना में ठहर जाती है। मानो जैसे सौन्दर्य और सुगंध युक्त पुष्प को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। काव्य, प्रकृति, मिलन, विरह, उत्कंठा, लालसा, आनंद, व्यथा कला, अनेक भावों में संग्रहित है संगीत। स्वरों में बुनते हैं अन्तर्जगत की गहराई का श्रृंगार है संगीत।
कला का सर्वश्रेष्ठ रूप
ललित कलाओं में शास्त्रीय संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है जो सीधे आत्मा को प्रभावित करता है। भारतीय संगीत मुख्य रूप से शास्त्रीय नियम आधारित और (सुगम) भाव संगीत में विभाजित है। संगीत का संबंध न केवल मनोरंजन से है, बल्कि यह प्राचीन काल से ही साधना योग और भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। संगीत एक कला रूप है जिसका माध्यम ध्वनि और मौन है जो समय के साथ घटित होता है। संगीत के सामान्य तत्व पिच(जो माधुर्य और सामंजस्य) को नियंत्रित करते हैं।
लोक गीत लोगों के जीवन को रंगों से, रगों में खुशियों के माहौल के साथ चित्रित करते हैं और जीवन के सभी अवसरों पर सुखद अनुभूति कराते हैं। भाव हों या फिर प्रकृति या फिर त्योहार सावन बारिश फसल या त्योहार आदि सभी अवसर के उपयुक्त हृदय की भावनाओं को ऊंचा उठाते हैं।
संगीत की परिभाषा भी संस्कृति और सामाजिक संदर्भ के अनुसार बदलती रहती है। संगीत को शैलियों और उपशैलियों में विभाजित किया जा सकता है, हालांकि संगीत शैलियों के बीच विभाजन रेखाएं और संबंध अक्सर सूक्ष्म होते हैं। कला के भीतर, संगीत को एक प्रदर्शन कला, एक ललित कला और एक श्रवण कला के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
स्वर्ण लताओं पर छिटकते इन्द्रधनुष का सरस रंग में जो रश्मियां बिखरतीं वो भी संगीत का रूप है। हमारे हृदय के लय बद्ध स्पंदन भी संगीत है। चन्द्रमा की आभा वीणा के तार पर आलोकित होते दीप भी अपना संगीत सुनाते हैं।
वेदों से जुड़ी हैं संगीत की जड़ें
भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति कहां से हुई। इसकी जड़ें हमारे प्राचीन वेदों से विशेष रूप से सामवेद से जुड़ी मानी जाती है। प्रकृति के हर मधुर रूप में संगीत है। पर्वतों से गिरते झरने सुमधुर स्वर लेकर भूमि के कोने-कोने को आनंदित करते हैं।
जहां मंत्रों का उच्चारण केवल शब्द नहीं था बल्कि सुर और लय के तारतम्य के साथ एक आध्यात्मिक अनुभव था। समय के साथ वही स्वर रागों में ढलते गये और राग केवल संगीत न होकर भावनाओं,ऋतुओं समय और आत्मा की भाषा बन गये। महान संगीतज्ञों ने तानसेन से लेकर भीमसेन जोशी, छन्नूलाल मिश्रा तक हर युग में संगीत को और गहरा किया है। शास्त्रीय संगीत केवल सुनने की वस्तु नहीं, महसूस करने की साधना है।
















