दुनिया भर में हर साल लगभग 87 लाख से 95 लाख लोग तम्बाकू से जुड़ी बीमारियों ( कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की बीमारी) के कारण मरते हैं। गौरतलब हो कि निष्क्रिय धूम्रपान अर्थात जो लोग धूम्रपान नहीं करते, लेकिन धूम्रपान के धुएं के संपर्क में आने लगभग 14 लोग भी हर साल जान गंवा देते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, तम्बाकू के कारण हर 6 सेकंड में दुनिया में 1 व्यक्ति की मौत होती है।
भारत में हर साल लगभग 13.5 लाख लोग तम्बाकू (धूम्रपान और खैनी-गुटखा जैसे चबाने वाले तम्बाकू उत्पाद) के इस्तेमाल से असमय काल के गाल में समा जाते हैं। बावजूद इसके; तम्बाकू उत्पादन आज दुनिया के सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाले उद्योगों में शामिल है। आज वैश्विक स्तर पर चीन दुनिया का सबसे बड़ा तम्बाकू उत्पादक देश है। इसके अलावा ब्राजील, इंडोनेशिया, भारत, अमेरिका और जिम्बाब्वे भी दुनिया के बड़े तम्बाकू उत्पादक देशों में शामिल हैं।
मानव स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण के लिए भी विनाशकारी है तम्बाकू
तम्बाकू मानव स्वास्थ्य के लिए तो बेहद खतरनाक है ही, इसकी खेती भी पर्यावरण के लिए उतनी ही विनाशकारी है। विशेषज्ञों के मुताबिक तमाम खतरनाक रोग देने वाली तम्बाकू की खेती से मिट्टी के अनुर्वर होने, वनोन्मूलन, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के नष्ट होने का खतरा बढ़ जाता है। हर साल करीब साढ़े चार ट्रिलियन सिगरेट फिल्टर समुद्रों, नदियों, सड़कों और पार्कों को प्रदूषित करते हैं। स्वाभाविक है कि उनकी सफाई में अतिरिक्त मानव श्रम की जरूरत पड़ती है। इसके अवशेष इन स्थानों के सौंदर्य पर भी ग्रहण लगाते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि ऐसे उत्पादों के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाए। यह मानव स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह है।
ग्लोबल वार्मिंग के लिए काफी हद तक जिम्मेदार
एक उत्पाद के रूप में तम्बाकू बहुत अहितकारी है। खेतों में इसे उपजाने से लेकर उसके वितरण, खपत और उसके पश्चात कचरे के रूप में यह पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है। तम्बाकू की खेती को आर्थिक समृद्धि और गरीबी दूर करने का जरिया माना जाता है, लेकिन हर साल दो लाख हेक्टेयर जंगलों को तम्बाकू की खेती के लिए समतल किया जाता है। यह 60 करोड़ पेड़ों के नष्ट होने के बराबर है। यही नहीं, इसकी खेती के लिए बड़ी मात्रा में पानी और ऊर्जा की भी खपत होती है। तम्बाकू उत्पाद अपनी निर्माण प्रक्रिया और उसके पश्चात भी बड़े पैमाने पर कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन करते हैं। यह उद्योग हर साल आठ करोड़ टन कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन करता है। यानी ग्लोबल वार्मिंग के लिए यह काफी हद तक जिम्मेदार है।
मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तम्बाकू उत्पादन किसानों के लिए भी बेहद हानिकारक है। रासायनिक कीटनाशकों और तम्बाकू के धुएं के संपर्क में आने से तम्बाकू उत्पादन करने वाले किसानों में फेफड़ों की बीमारियां और निकोटीन पॉइजनिंग जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। तम्बाकू की खेती में लगे श्रमिक रोजाना 50 सिगरेट के बराबर निकोटिन अवशोषित कर लेते हैं। सिगरेट के इस्तेमाल के बाद जब उसके फिल्टर को फेंका जाता है, तो उसमें मौजूद माइक्रोप्लास्टिक के अंश टूट-टूटकर मिट्टी में मिल जाते हैं, हवा में तैरते हैं या जलस्रोतों में घुल जाते हैं। इसके खतरनाक रसायन बड़ी आसानी से वहा, खाद्य पदार्थों और पेयजल के जरिये मानव शरीर में पहुंचकर आनुवांशिकी परिवर्तन, मस्तिष्क विकास और श्वसन तंत्र की समस्या उत्पन्न करते हैं।
ई-सिगरेट के चिन्ताजनक नतीजे
वर्तमान समय में तम्बाकू उद्योग लगातार नए उत्पाद और तकनीकें बाज़ार में ला रहा है। इनमें ई-सिगरेट, निकोटीन पाउच, गर्म तम्बाकू आदि उत्पाद प्रमुख हैं। इस समय दुनियाभर में लगभग 10 करोड़ से अधिक लोग वेपिंग के जरिए धूम्रपान कर रहे हैं। इसमें वयस्कों की संख्या करीब 8 करोड़ 60 लाख है, जो मुख्य रूप से उच्च-आय वाले देशों में रहते हैं। वहीं, किशोरों के लिए भी यह काफी चिन्ताजनक है। आज विकसित देशों में 13 से 15 वर्ष की उम्र के लगभग 1 करोड़ 50 लाख किशोर ई-सिगरेट का सेवन कर रहे हैं। जानकर कहते हैं कि “ई-सिगरेट निकोटीन लत बढ़ा रही हैं। हालाँकि इन्हें कम हानि वाले उत्पादों के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन यह बच्चों को समय से पहले ही निकोटीन की लत में फँसा देता है।
ओरल कैंसर की बड़ी वजह
आईसीएमआर के सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में मुंह में होने वाला कैंसर भारत में मौतों की बड़ी वजह बन चुका है। बेशक शौक बड़ी चीज है लेकिन यही शौक जब मौत से मिलवा दे तो उससे दूर ही रहना चाहिए। फिर भी लोग इस दिशा में बेपरवाह बने हुए हैं। तम्बाकू सेवन की लत के चलते देश में हर साल 13 लाख से ज्यादा लोग असमय अपनी जान गंवा देते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज हमारा भारत ओरल कैंसर का गढ़ बन चुका है। इसका सबसे बड़ा कारण है गुटखा, खैनी, बीड़ी, सिगरेट और पान मसाला का बढ़ता इस्तेमाल। शौक कब लत में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता; और जब गलती का अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है। ग्लैमरस ऐड और सस्ती कीमतें लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि “थोड़ा बहुत चलता है।” लेकिन यहीं से खतरा शुरू होता है।
वर्ष 2026 के लिए तम्बाकू निषेध दिवस का केंद्रीय विषय
हर साल 31 मई को ‘विश्व तम्बाकू निषेध दिवस’ मनाया जाता है, लेकिन यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है। तम्बाकू आपकी सोच से अधिक सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। तम्बाकू लोगों के शरीर, आवाज और चेहरे के साथ क्या कर सकता है, एक आम आदमी सोच भी नहीं पाता। इसलिए हर साल लोगों के बीच तम्बाकू के सेहत पर खतरनाक दुष्प्रभाव और जोखिमों के बारे जागरूकता बढ़ाने के लिए तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 के लिए विश्व तम्बाकू निषेध दिवस का केंद्रीय विषय है- तम्बाकू के छद्म आकर्षण का पर्दाफाश कर निकोटीन की लत का मुकाबला करना। बच्चों और किशोरों को तम्बाकू व निकोटीन उत्पादों के प्रति लुभाने के लिए अपनायी जाने वाली चालाकी भरी रणनीतियों को उजागर कर लोगों को यह समझाना कि कैसे तम्बाकू कंपनियां नए-नए उत्पाद बनाकर अगली पीढ़ी को नुकसान पहुँचा रही हैं।












