तंबाकू और निकोटीन मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसे मौन और क्रूर शत्रु रहे हैं, जिन्होंने हर दौर में जनस्वास्थ्य को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। पिछले कई दशकों में वैश्विक स्तर पर हुए सैंकड़ों वैज्ञानिक अनुसंधानों ने निर्विवाद रूप से यह सिद्ध किया है कि तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन, चाहे वह धूम्रपान हो या धूम्ररहित तंबाकू, मानव शरीर के लिए सीधे तौर पर जानलेवा है।
इसके बावजूद, जब हम अपने आसपास कम उम्र के किशोरों, स्कूली बच्चों और युवाओं को सिगरेट, वेपिंग डिवाइसेज, ई-सिगरेट, गुटखा या नए जमाने के निकोटीन पाउच का सेवन करते देखते हैं तो यह केवल एक चिकित्सा या स्वास्थ्य संबंधी चिंता नहीं रह जाती बल्कि यह वास्तव में हमारी सामाजिक, नैतिक और मानसिक चेतना के गहरे संकट का संकेत है। प्रतिवर्ष 31 मई को मनाया जाने वाला ‘विश्व तंबाकू निषेध दिवस’ इस बार केवल एक रस्मी स्वास्थ्य अभियान या प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है बल्कि यह दुनियाभर की सरकारों, नीति-निर्माताओं और समाजों के लिए अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुनियोजित दलदल से बचाने की अंतिम वैश्विक चेतावनी बनकर सामने आया है। वर्ष 2026 के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा घोषित आधिकारिक विषय ‘आकर्षण का पर्दाफाश: निकोटीन और तंबाकू की लत का मुकाबला करना’ आधुनिक निकोटीन साम्राज्य की उस भयावह और अनैतिक रणनीति का पर्दाफाश करता है, जिसके तहत मासूम बच्चों को रंगीन, मीठे, सुगंधित और भ्रामक रूप से सुरक्षित दिखने वाले उत्पादों के जरिए ‘लाइफटाइम कस्टमर’ बनाने का घृणित खेल खेला जा रहा है। तंबाकू अब केवल पारंपरिक बीड़ी, सिगरेट, खैनी या गुटखे के बदबूदार और खुरदुरे रूप तक सीमित नहीं रह गया है; बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट्स ने इसका चेहरा पूरी तरह बदल दिया है। आज यह जहर आधुनिकता, तकनीक, गैजेट्स, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और ‘कैंडी फ्लेवर’ की आड़ में परोसा जा रहा है, जिससे हमारी अगली पीढ़ी की मासूमियत और स्वास्थ्य दोनों दांव पर लग गए हैं।
‘कैंडी-फ्रूटी स्वाद’ वाला मीठा जाल
विश्व स्वास्थ्य संगठन और वैश्विक तंबाकू उद्योग पर कड़ी निगरानी रखने वाली वैश्विक संस्था ‘स्टॉप’ की संयुक्त वैश्विक रिपोर्ट ‘हुकिंग द नेक्स्ट जनरेशन’ इस बात के रोंगटे खड़े करने वाले प्रमाण दे चुकी है कि तंबाकू कंपनियां किस प्रकार युवाओं की मानसिकता, उनके डिजिटल व्यवहार, फैशन बोध और साथियों के दबाव का गहन मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके अपने नए उत्पादों को डिजाइन कर रही हैं। आज बाजार में पारंपरिक सिगरेट के विकल्प के रूप में ई-सिगरेट, निकोटीन पाउच, हिट-नॉट-बर्न डिवाइसेज जैसे उत्पाद पेश किए जा रहे हैं। इन उत्पादों को इंटरनेट और सोशल मीडिया पर इस प्रकार प्रचारित और ग्लैमराइज किया जाता है, मानो ये पारंपरिक धूम्रपान की तुलना में अत्यंत सुरक्षित, हानिरहित और आधुनिक जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा हों परंतु वैज्ञानिक और चिकित्सीय सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। इन इलैक्ट्रॉनिक और सिंथेटिक उत्पादों में प्रयुक्त लिक्विड निकोटीन और सॉल्ट-निकोटीन की खुराक इतनी तीव्र होती है कि यह विकासशील किशोर मस्तिष्क पर सामान्य सिगरेट की तुलना में कहीं अधिक तेजी से और गहरा रासायनिक असर डालती है, जिससे ‘न्यूरोनल पाथवे’ बदल जाते हैं और बच्चा बहुत कम समय में इसका गंभीर रूप से आदी हो जाता है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर 13 से 15 वर्ष की आयु के लगभग 3.7 करोड़ किशोर किसी न किसी रूप में तंबाकू या नए जमाने के निकोटीन उत्पादों का नियमित सेवन कर रहे हैं। यह संख्या किसी भी समाज को झकझोरने के लिए पर्याप्त है। तंबाकू उद्योग ने इस आयु वर्ग को आकर्षित करने के लिए उत्पादों में स्ट्रॉबेरी, आम, पुदीना, चॉकलेट, तरबूज और बबलगम जैसे हजारों लुभावने और मीठे स्वादों को शामिल किया है। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने वैश्विक मंच से कड़ी चेतावनी देते हुए इसे तंबाकू उद्योग द्वारा बच्चों के लिए बुना गया एक ‘कैंडी-फ्रूटी स्वाद वाला जाल’ कहा है। अमेरिका और यूरोप में हुए व्यावहारिक अध्ययनों से यह साफ हुआ है कि यदि इन आधुनिक निकोटीन उत्पादों से कृत्रिम मीठे और फलों के स्वादों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाए तो लगभग 70 प्रतिशत से अधिक किशोर इन उत्पादों को तुरंत छोड़ देंगे। इससे यह पूरी तरह प्रमाणित होता है कि तंबाकू उद्योग जानबूझकर ‘स्वाद आधारित लत’ की सोची-समझी रणनीति पर काम कर रहा है ताकि बच्चों के मन में तंबाकू के कड़वे और हानिकारक होने का जो स्वाभाविक डर या अरुचि होती है, उसे चालाकी से समाप्त किया जा सके।
सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर्स का दुरुपयोग
18वीं या 19वीं सदी में पारंपरिक विज्ञापनों पर सरकारों ने कानूनी रूप से जो प्रतिबंध लगाए थे, तंबाकू उद्योग ने 21वीं सदी के डिजिटल युग में उनका तोड़ निकाल लिया है। आज ये कंपनियां इंस्टाग्राम, यूट्यूब, ऑनलाइन लाइव स्ट्रीमिंग व गेमिंग प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले रही हैं। लोकप्रिय सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, गेमर्स और युवा आइकॉन को गुप्त रूप से या ‘सरोगेट मार्किटिंग’ के जरिए स्पॉन्सर किया जाता है, जो अपने वीडियो में बेहद स्टाइलिश अंदाज में धुएं के छल्ले उड़ाते या वेपिंग गैजेट्स को फ्लॉन्ट करते नजर आते हैं। चूंकि ये विज्ञापन सीधे स्मार्टफोन स्क्रीन के जरिए बच्चों की बंद कमरों की दुनिया में प्रवेश करते हैं, इसलिए अक्सर अभिभावकों, शिक्षकों और यहां तक कि देश की नियामक एजेंसियों को भी इस ‘साइलेंट इन्वेजन’ (मौन आक्रमण) की भनक तक नहीं लग पाती।
किशोरों के मानसिक विकास को निगलता निकोटीन
तंबाकू उद्योग का यह सुनियोजित अभियान केवल अपने व्यावसायिक उत्पाद बेचना नहीं है बल्कि यह एक अत्यंत खतरनाक मनोवैज्ञानिक युद्ध है। मानव विज्ञान और तंत्रिका विज्ञान के अनुसार, किशोरावस्था और प्रारंभिक युवावस्था (25 वर्ष की आयु तक) वह नाजुक समय होता है, जब मानव मस्तिष्क का ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’, जो निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने, आवेग नियंत्रण और इच्छाशक्ति के लिए जिम्मेदार होता है, तेजी से विकसित हो रहा होता है। इस संवेदनशील अवस्था में जब निकोटीन जैसा अत्यधिक नशीला और न्यूरो-टॉक्सिक रसायन बार-बार मस्तिष्क में पहुंचता है तो वह स्थायी रूप से मानसिक स्वास्थ्य को क्षतिग्रस्त कर देता है। चिकित्सा शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि किशोरावस्था में निकोटीन का शिकार बनने वाले बच्चों में भविष्य में गंभीर अवसाद, तीव्र एंग्जायटी, एकाग्रता की कमी तथा आगे चलकर अन्य कड़े मादक पदार्थों (जैसे ड्रग्स और अल्कोहल) की ओर झुकाव की संभावना सामान्य बच्चों की तुलना में चार गुना अधिक बढ़ जाती है। ‘यूनियन फॉर इंटरनेशनल कैंसर कंट्रोल’ ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए चेताया है कि यदि युवाओं को लक्षित करने वाली इस डिजिटल और फ्लेवर्ड रणनीति को वैश्विक स्तर पर तुरंत नहीं कुचला गया तो आने वाले दो दशकों में दुनिया को कैंसर, विशेषकर फेफड़ों और मुंह के कैंसर की एक ऐसी भयावह और अनियंत्रित महामारी का सामना करना पड़ेगा, जिससे निपटना किसी भी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए असंभव होगा।
वैश्विक आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो तंबाकू इस समय दुनियाभर में प्रतिवर्ष लगभग 25 लाख से अधिक लोगों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जान ले रहा है। सभी प्रकार के कैंसरों में से अकेले 40 प्रतिशत का सीधा संबंध तंबाकू से है जबकि फेफड़ों के कैंसर से होने वाली लगभग 85 प्रतिशत मौतें सीधे तौर पर धूम्रपान के कारण होती हैं। हालांकि, व्यापक जन-जागरूकता और कई देशों की कठोर नीतियों के कारण वैश्विक स्तर पर कुल तंबाकू उपयोगकर्ताओं की संख्या वर्ष 2000 के 1.36 अरब से घटकर अब लगभग 1.25 अरब रह गई है लेकिन यह राहत केवल व्यस्कों तक सीमित है। व्यस्कों में जहां उपभोग गिरा है, वहीं किशोरों और स्कूली बच्चों में ग्राफ तेजी से ऊपर की ओर भागा है। इसका सीधा और डरावना अर्थ यह है कि तंबाकू उद्योग ने अपने पुराने मर रहे या तंबाकू छोड़ रहे ग्राहकों की भरपाई करने के लिए हमारे मासूम बच्चों के रूप में अपना ‘नया और दीर्घकालिक उपभोक्ता वर्ग’ तैयार कर लिया है।
भारत में धूम्ररहित तंबाकू का संकट
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ‘ग्लोबल रिपोर्ट ऑन ट्रेंड्स इन प्रीवलेंस ऑफ टोबैको यूज 2000-2030’ के अनुसार, भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 25.1 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपभोग करते हैं। इस विशाल संख्या में पुरुषों की हिस्सेदारी (लगभग 79 प्रतिशत) भले ही अधिक हो परंतु पिछले कुछ वर्षों में कामकाजी महिलाओं, महानगरीय युवतियों और स्कूल-कॉलेज जाने वाली किशोरियों में भी तंबाकू और निकोटीन उत्पादों का प्रचलन चिंताजनक रूप से बढ़ा है। भारत के तंबाकू संकट की सबसे बड़ी विशिष्टता और चुनौती यहां का धूम्ररहित तंबाकू बाजार है। जहां पश्चिमी देशों में सिगरेट और वेप प्रमुख समस्याएं हैं, वहीं भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देशों में चबाने वाला तंबाकू जनस्वास्थ्य की रीढ़ को तोड़ रहा है।
भारत में खैनी के नियमित उपभोक्ताओं की संख्या 11 करोड़ से अधिक है, गुटखा और जर्दा के उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 7 करोड़ है और पान मसाला तथा सुपारी-मिश्रित तंबाकू के उपभोक्ता लगभग 5 करोड़ के आस-पास हैं। चबाने वाले तंबाकू के इस व्यापक और अनियंत्रित जाल के कारण ही भारत में मुंह के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। देश के प्रमुख कैंसर अस्पतालों में आने वाले मुंह के कैंसर के अधिकांश मामलों में सबसे प्रमुख कारण गुटखा, खैनी और जर्दा का सेवन ही पाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘निकोटीन एंड टोबैको रिसर्च’ में प्रकाशित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक आर्थिक-स्वास्थ्य अध्ययन के अनुसार, यदि भारत में धूम्ररहित तंबाकू और नाबालिगों में इसके प्रसार की वर्तमान प्रवृत्ति पर तुरंत पूर्ण विराम नहीं लगाया गया तो इससे उत्पन्न होने वाली जानलेवा बीमारियों के इलाज का प्रत्यक्ष और परोक्ष आर्थिक बोझ भारत पर 1900 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है। यह रिपोर्ट साफ तौर पर रेखांकित करती है कि यह आर्थिक तबाही केवल अस्पताल के बिलों या दवाओं के खर्च तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि यह देश के मानव संसाधन की कार्यक्षमता में कमी, कामकाजी उम्र के युवाओं की अकाल मृत्यु और लाखों मध्यम व निम्नवर्गीय परिवारों को हमेशा के लिए गरीबी के दुष्चक्र में धकेलने का कारण बनेगी।
‘छद्म-सुरक्षित’ उत्पादों का भ्रम
भारत में ‘सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम 2003’ जैसा कड़ा कानून अस्तित्व में है, जो शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के दायरे में तंबाकू उत्पादों की बिक्री को पूर्णतः प्रतिबंधित करता है और नाबालिगों को तंबाकू बेचना दंडनीय अपराध बनाता है। इसके बावजूद, देश के अधिकांश स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग सेंटरों के आसपास छोटी गुमटियों, पान की दुकानों और किराना स्टोर्स पर खुलेआम गुटखा, सिगरेट और प्रतिबंधित होने के बावजूद अवैध रूप से आयातित चीनी वेपिंग डिवाइसेज व फ्लेवर्ड निकोटीन पाउच बिकते हैं। इनमें से कई उत्पादों पर कानूनन अनिवार्य चित्रमय स्वास्थ्य चेतावनी या तो गायब होती है या उन्हें इस तरह छिपाकर छापा जाता है कि वे बच्चों को दिखाई न दें। इससे भी अधिक खतरनाक बात यह है कि इन आधुनिक निकोटीन पाउच या हर्बल हुक्कों को इंटरनेट पर ‘हर्बल’, ‘टोबैको-फ्री’, ‘स्मोक-फ्री’ या ‘लो-रिस्क’ (कम जोखिम वाले) उत्पाद कहकर भ्रामक रूप से विज्ञापित किया जाता है। आम जनता और अज्ञानी किशोर यह समझ ही नहीं पाते कि भले ही इनमें पारंपरिक तंबाकू की पत्तियां न हों लेकिन इनमें मौजूद लैबोरेटरी-निर्मित सिंथेटिक निकोटीन उनके दिल, फेफड़ों और धमनियों को उतना ही नुकसान पहुंचा रहा है, जितना कि कोई अन्य घातक नशा।
मीठी साजिश का कड़वा सच
तंबाकू और निकोटीन उद्योग की इस वैश्विक और चौतरफा ‘मीठी साजिश’ का मुकाबला केवल कागजी प्रतिबंधों, दंडात्मक कार्यवाहियों या साल में एक दिन विज्ञापन छपवा देने से कतई नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक अत्यंत आक्रामक, व्यावहारिक और बहुस्तरीय राष्ट्रीय व अंतरा।ष्ट्रीय रणनीति की तत्काल आवश्यकता है। सरकारों को बिना किसी आर्थिक या कॉरपोरेट दबाव के सभी प्रकार के ई-सिगरेट, वेपिंग उत्पादों और विशेष रूप से तंबाकू उत्पादों में जोड़े जाने वाले ‘कैंडी, फल और चॉकलेट’ जैसे स्वादों पर पूर्ण और बिना शर्त वैश्विक प्रतिबंध लागू करना चाहिए। आईटी मंत्रालयों और साइबर सुरक्षा एजेसियों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर ऐसी सख्त गाइडलाइंस बनानी होंगी, जिससे तंबाकू कंपनियों द्वारा सरोगेट या इन्फ्लुएंसर मार्किटिंग के जरिए किए जा रहे अदृश्य प्रचार को ट्रैक करके उन पर भारी जुर्माना लगाया जा सके और उनके डिजिटल अकाउंट्स को हमेशा के लिए ब्लॉक किया जा सके।विश्व बैंक और डब्ल्यूएचओ के अनेक व्यावहारिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि तंबाकू नियंत्रण का सबसे अचूक और प्रभावी तात्कालिक हथियार है उत्पादों की कीमतों में भारी वृद्धि करना। जब सिगरेट, बीड़ी और गुटखे पर टैक्स इस हद तक बढ़ा दिया जाएगा कि वे अत्यधिक महंगे हो जाएं तो सीमित पॉकेट मनी वाले किशोरों और आर्थिक रूप से कमजोर निम्न-आय वर्ग के लोगों की पहुंच से ये उत्पाद स्वतः बाहर होने लगेंगे, जिससे इनके उपभोग में तत्काल भारी गिरावट दर्ज की जाएगी। आज के डिजिटल युग में शिक्षकों और अभिभावकों को भी अपनी रूढ़िवादी सोच छोड़नी होगी और बच्चों के व्यवहार में आने वाले सूक्ष्म बदलावों (जैसे अचानक मूड स्विंग्स होना, गुप्त रूप से पॉकेट मनी का अधिक खर्च होना या कपड़ों से अजीब मीठी गंध आना) पर पैनी नजर रखनी होगी ताकि वे अपने बच्चे को वेपिंग या निकोटीन पाउच के शुरुआती जाल में फंसने से समय रहते बचा सकें। केवल कानूनी डंडा चलाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। जो युवा या बच्चे पहले से ही इस भयानक लत के शिकार हो चुके हैं, उन्हें अपराधी या सामाजिक तिरस्कार का पात्र मानने के बजाय रोगी मानकर उनकी सहायता करनी होगी।
लापरवाही की अब कोई गुंजाइश नहीं
विश्व तंबाकू निषेध दिवस का वैश्विक संदेश आईने की तरह साफ और डरावना है कि चमकीले और आकर्षक रंगों के मुखौटे के पीछे छिपा निकोटीन उद्योग वास्तव में एक ऐसी ‘धीमी महामारी’ को जन्म दे रहा है, जो हमारी आने वाली नस्लों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से पंगु बना देगी। यदि आज भारत सहित दुनियाभर की सरकारें, नागरिक समाज, अभिभावक और हमारी न्यायप्रणाली इस संगठित अपराध के विरुद्ध एक साथ नहीं उठ खड़े हुए तो आने वाले समय में जो सामाजिक त्रासदी हमारे सामने होगी, उससे उबरने का कोई रास्ता शेष नहीं रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि तंबाकू नियंत्रण को केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की एक विभागीय फाइल न मानकर इसे एक सर्वोच्च राष्ट्रीय सामाजिक आंदोलन बनाया जाए। तंबाकू उद्योग के आकर्षण के इस कृत्रिम मुखौटे को नोचकर फैंकना और बच्चों को एक स्वच्छ, धुआं-मुक्त और नशा-मुक्त वातावरण देना ही इस पृथ्वी और हमारी सभ्यता के सुरक्षित भविष्य की एकमात्र गारंटी है। इसमें अब और लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है।












