“संघ की स्पष्ट दृष्टि है- भारत हर क्षेत्र में परम वैभवशाली राष्ट्र के रूप में खड़ा हो” – डॉ. कृष्ण गोपाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष चल रहा है। ऐसे में देश-दुनिया के लोग संघ के बारे में अधिक से अधिक जानने-समझने की न केवल जिज्ञासा लिए हुए हैं, बल्कि अनेक ऐसे सवाल और विमर्श के विषय हैं, जिन पर समाज संघ का स्पष्ट विचार जानना चाहता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष चल रहा है। ऐसे में देश-दुनिया के लोग संघ के बारे में अधिक से अधिक जानने-समझने की न केवल जिज्ञासा लिए हुए हैं, बल्कि अनेक ऐसे सवाल और विमर्श के विषय हैं, जिन पर समाज संघ का स्पष्ट विचार जानना चाहता है। इसी के निमित्त उत्तराखंड स्थित श्री केदारनाथ धाम में स्वामी विवेकानंद हेल्थ मिशन सोसाइटी द्वारा संचालित अस्पताल के लोकार्पण अवसर पर सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काम, आयाम, देश-समाज के विभिन विमर्श के विषयों पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश:-
डॉ. कृष्णगोपाल से बातचीत करते हुए हितेश शंकर
संघ शताब्दी में एक ओर समाज में हर्ष दिखाई देता है, तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों के मन में विषाद भी दिखाई देता है। आप इसे कैसे देखते हैं? देखिए, हमारा मानना है कि संघ को लेकर सामान्य जन न केवल प्रसन्न है, बल्कि उत्साहित भी है और आशावान भी। लोग मानते हैं कि संघ सारे देश में देशभक्ति के भाव के साथ पूरे भारत को एक करने के काम में जुटा हुआ है। जब हम एक करना कहते हैं, तो उसका भाव यह है कि सारे देश के 144 करोड़ लोग एक मनोभाव से देश के बारे में विचार करें। देशहित के बारे में लोगों के मन में कोई विरोधाभास और कोई द्वंद्व नहीं होना चाहिए।
इसी कारण से संघ को जिन्होंने 100 वर्ष तक देखा है, अनुभव किया है, संघ के स्वयंसेवकों को देखा है, उनका देशभक्ति से परिपूर्ण जीवन देखा है, वे संघ की वृद्धि और विकास से अत्यंत प्रसन्न हैं और आश्वस्त हैं। फिर आपने कहा कि कुछ लोगों को थोड़ा-सा विषाद है। तो हम इसमें इतना ही कहना चाहेंगे कि हां, चिंता है। हमारा इसमें अभिमत यह है कि यह थोड़ी-सी हमारी कमी है कि हम उन तक संघ के सही विचार को नहीं पहुंचा सके हैं।
हमें पूरा विश्वास है कि जिस दिन लोग हमारे इस कार्य को अच्छे से समझ लेंगे, तो संघ का विरोध करने का कोई कारण ही नहीं रहेगा। विरोध और विषाद का भी कोई कारण नहीं रहेगा। देखिए, जवाहरलाल नेहरू जी को भी ऐसा लगता था कि संघ ठीक काम नहीं करता, लेकिन जब उन्हें 1962 के युद्ध के बाद समझ में आ गया, तो उन्होंने 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में संघ को आमंत्रित किया। लोकनायक जयप्रकाश जी को भी ऐसा लगता था कि संघ क्या करता है, क्या नहीं करता है। उनके बारे में जो आप कह रहे हैं, वही उनके मन में विषाद और दुख था, लेकिन 1975 के बाद उन्हें ध्यान आया कि नहीं, संघ से विषाद करने का कोई कारण नहीं है और वे संघ के समर्थन में खड़े हो गए। संघ के कार्यों के विविध आयामों को उसके शताब्दी वर्ष में समझना चाहें, तो एक ओर शाखा और संगठन का कार्य है, दूसरी ओर जागरण जैसे कार्य हैं। इसी प्रकार सेवा और अन्य कार्यक्रमों का भी विस्तार हुआ है। इसके पीछे क्या विचार रहा और ये कार्यक्रम क्रमिक रूप से कैसे विकसित हुए? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल कार्यकर्ताओं का अच्छा विकास करना चाहता है। सामान्य जन इस देश को अपना समझे। मातृभूमि को अपना माने। इस मातृभूमि के प्रति अपने उत्तरदायित्व को गहराई से समझे और प्रामाणिकता तथा सत्यनिष्ठा के साथ देश के लिए काम करे। हम इतना ही कार्य करते हैं। इसके बाद व्यक्ति की रुचि, प्रकृति, स्वभाव, क्षमता और जानकारी के आधार पर समाज निर्माण के लिए जिस-जिस क्षेत्र में जो-जो आवश्यक कार्य होगा, वे उसमें काम करेंगे। वह शिक्षा का क्षेत्र हो, सेवा का क्षेत्र हो, विज्ञान का क्षेत्र हो, अध्यात्म का क्षेत्र हो, मजदूरों का क्षेत्र हो या कोई अन्य क्षेत्र।
स्वयंसेवक उन क्षेत्रों में काम करने के लिए जाएंगे। वहां वे समाज के अच्छे लोगों को साथ लेकर कार्य को आगे बढ़ाएंगे। इस प्रकार जो नई-नई रचनाएं खड़ी होंगी, वे सब स्वतंत्र होंगी। ऐसा नहीं है कि संघ ही उन सभी कार्यों को करेगा। समाज के लोगों के साथ मिलकर कार्य होगा। ये दोनों बातें ध्यान में रखनी चाहिए। केवल स्वयंसेवक ही सब कुछ करेंगे, ऐसा नहीं है। यह समाज का कार्य है। पर्यावरण का कार्य हो, कुटुंब प्रबोधन का कार्य हो, मजदूर क्षेत्र का कार्य हो, लोगों को अच्छा रोजगार मिले, रोजगार सृजन का कार्य हो, लोगों के मन में सद्भाव जागे, देश के प्रति अच्छे नागरिक बनने का भाव जागे, ऐसे सैकड़ों प्रकार के कार्य हैं। स्वयंसेवक वहां जाएंगे, समाज के अच्छे लोगों को साथ लेंगे और मिलकर आगे बढ़ेंगे।
यदि हम संघ की इस पूरी यात्रा और उसके क्रमिक विकास को समझना चाहें, तो ऐसे कौन-से तीन-चार प्रमुख चरण हैं, जिनमें आप संघ का विकास देखते हैं ? और उनकी विशेषताएं क्या हैं? देखिए, अगर मैं इस 100 वर्ष की यात्रा को देखूं, तो इसे विभिन्न चरणों में समझा जा सकता है। पहले चरण में संगठन का कार्य। फिर उसके बाद अन्य आयामों में विस्तार। यदि इस दृष्टि से देखें, तो इस यात्रा के कुछ प्रमुख पड़ाव भी रहे हैं, जिनके आधार पर इसे समझा जा सकता है। जैसे-जैसे संघ की शक्ति बढ़ती गई और समाज की समस्याओं के समाधान को लेकर स्वयंसेवकों में आत्मविश्वास बढ़ता गया, वैसे-वैसे कार्य का विस्तार भी विभिन्न क्षेत्रों में होता गया।
स्वयंसेवकों का सामर्थ्य बढ़ा और उन्हें ऐसा लगा कि हम समाज के लोगों के साथ मिलकर इन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। तब विभिन्न क्षेत्रों को चिन्हित किया गया। प्रारंभ के लगभग 25-30 वर्ष संघ के कार्य को पूरे देश में व्यापक दृष्टि से फैलाने और विस्तारित करने में लगे। इसके बाद लगभग 10-15 वर्ष और लगे, जिनमें संघ धीरे-धीरे विभिन्न स्थानों पर मजबूती के साथ खड़ा होता गया। हम समझते हैं कि 1925 से लेकर लगभग 1948 तक का समय ऐसा ही रहा। लगभग 25 वर्ष बाद संघ के स्वयंसेवक देश के बारे में गहराई से समझने लगे, अध्ययन करने लगे और सामर्थ्यवान भी होने लगे। इसके बाद 1948 का वह कालखंड आया, जब पहला प्रतिबंध लगा। गांधी जी की हत्या के बाद मिथ्या आरोप लगाकर संघ के स्वयंसेवकों को जेल में भेजा गया। उस समय स्वयंसेवकों को गहराई से विचार और चिंतन करने का अवसर मिला।
एक स्थान पर लोग सात-आठ महीने, दस महीने, यहां तक कि एक-एक वर्ष तक रहे। वहां शांत वातावरण में देश और समाज के विषयों पर गंभीर चिंतन हुआ। हम समझते हैं कि कारागृह में रहते हुए जो अवसर प्राप्त हुआ, उसी से आगे के विस्तार की भूमिका तैयार हुई। यह विचार सामने आया कि एक ओर संगठन का विस्तार किया जाए और दूसरी ओर स्वयंसेवक भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यों के माध्यम से समाज में व्यापक परिवर्तन लाने के लिए तैयार हों। मेरा विचार है कि उस समय अधिकारियों और कार्यकर्ताओं को एकांत में शांतिपूर्वक चिंतन करने का पर्याप्त समय मिला। जैसे ही वे जेल से बाहर आए और सरकार ने प्रतिबंध वापस लिया, क्योंकि सरकार को भी वास्तविकता का पता चला, तब से संघ का कार्य और अधिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ा।
कुल मिलाकर कहें कि जो संघ की प्रार्थना को जानते हैं या संघ की प्रतिज्ञा को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि संघ का दूरगामी लक्ष्य क्या है। सामान्यतः लोगों को दिखता है कि कुछ स्वयंसेवक शाखा पर मैदान में कबड्डी खेल रहे हैं, कुछ परेड कर रहे हैं या गणवेश पहनकर कार्यक्रम करते हैं। उन्हें यही संघ दिखता है, लेकिन संघ केवल इतना ही नहीं है। इन सबके माध्यम से हम यह प्रयास करते हैं कि स्वयंसेवक एक अच्छा व्यक्तित्व प्राप्त करे। मिलकर काम करना सीखे। मिलकर विचार करना सीखे। देश के लिए हम और क्या-क्या कर सकते हैं, यह सब योजनाबद्ध तरीके से तय हो। हम मिलकर उन योजनाओं को क्रियान्वयन तक ले जाएं।
हमने अपनी प्रतिज्ञा में कहा है, अपने इस राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति। अर्थात् हम इस देश को सभी दिशाओं में सर्वोत्कृष्ट रूप में देखना चाहते हैं। हमने प्रार्थना में भी कहा है कि हम अपने देश को परम वैभवशाली देखना चाहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि समाज जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, वह आर्थिक क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, आचरण का क्षेत्र हो या कोई अन्य क्षेत्र। वहां भारत वैभवशाली राष्ट्र के रूप में खड़ा हो। संघ में इसी उद्देश्य से कार्यकर्ता निर्माण का कार्य निरंतर चलता रहता है।संघ की शाखा में प्रार्थना के बाद प्रातःस्मरण में हमारे महापुरुषों का समग्र रूप से स्मरण होता है। उसमें अलग-अलग अंचलों, भाषाओं और कालखंडों के महापुरुषों, विदुषियों, यहां तक कि नदियों और पर्वतों तक का पुण्य स्मरण मिलता है। लेकिन दूसरी ओर देश में महापुरुषों को खंडित रूप में देखने और अपनी सुविधा अनुसार प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। कहीं गांधी जी और संघ को आमने-सामने खड़ा किया जाता है, तो कहीं बाबा साहब को केवल एक जाति विशेष का नेता बताने का प्रयास होता है। महापुरुषों को लेकर राजनीति की यह संकीर्ण दृष्टि, जो समाज में उद्वेलन और रस्साकशी पैदा करती है, उसे आप कैसे देखते हैं ? हमारे देश के जितने भी महापुरुष हैं, उन सभी की दृष्टि अखिल भारतीय रही है। यदि आप देखें, तो रामायण के रचयिता वाल्मीकि जी पूरे भारत का वर्णन करते हैं। महाभारत के रचयिता वेदव्यास जी पूरे भारत को एक रूप में देखते हैं। कालिदास ने अपने ग्रंथों में समग्र भारत का चित्र प्रस्तुत किया है। महर्षि पाणिनि ने अपने व्याकरण में भारत के सैकड़ों नगरों, जनपदों और क्षेत्रों का उल्लेख किया है। गुरु नानकदेव जी ने पूरे भारत में भ्रमण करते हुए यात्राएं कीं। आद्य शंकराचार्य जी ने भी संपूर्ण भारत की यात्रा की। हमारे महापुरुषों के मन में भारत एक था और वे सभी पूरे भारत के महापुरुष हैं। इसलिए सभी लोगों को सभी महापुरुषों का सम्मान करना चाहिए। हमारा जो एकात्मता स्तोत्र है, उसमें हम प्रातः और सायंकाल पूरे भारत के महापुरुषों का पुण्य स्मरण करते हैं।
भारत की नदियों का स्मरण करते हैं और पर्वतों का स्मरण करते हैं। इसलिए महापुरुषों को न उनके प्रांत तक सीमित रखना चाहिए, न भाषा तक, न जाति-समुदाय तक और न ही किसी मत-पंथ तक। यह संकीर्ण दृष्टि उचित नहीं है। बाबा साहब ने भी इस विषय पर लिखा है कि महापुरुषों को जातियों के दायरे में बांधना ठीक नहीं। यदि ऐसा किया जाएगा, तो कबीर केवल उत्तर प्रदेश के हो जाएंगे।
शंकराचार्य जी का जन्म केरल में हुआ लेकिन वे पूरे देश के हैं। रामानुजाचार्य जी का जन्म तमिल क्षेत्र में हुआ लेकिन वे पूरे देश के हैं। गुरु नानक देव जी पूरे देश के हैं। डॉ. आंबेडकर पूरे देश के हैं। गांधी जी पूरे देश के हैं। महापुरुषों को केवल उनके प्रांत, भाषा, जाति या कुल-परिवार तक सीमित रखना, या केवल उसी समाज का नेता मानना उचित नहीं है। जिन्होंने भी इस देश और समाज के लिए अच्छा किया है, वे पूरे देश के लिए महापुरुष हैं।
केदारनाथ धाम में स्वामी विवेकानंद हेल्थ मिशन सोसाइटी का आधुनिक अस्पताल बनाया गया है। इस अस्पताल की संकल्पना और इसके महत्व को आप कैसे देखते हैं? जैसा कि मैंने पहले बताया कि संघ के स्वयंसेवक समाज में जहां भी आवश्यकता देखते हैं, वहां कार्य करने का प्रयास करते हैं। यदि समाज में कहीं कष्ट है, कहीं कोई समस्या है, तो उसका समाधान करने का प्रयत्न अवश्य करेंगे। जब हम कहते हैं कि देश को वैभवशाली बनाना है, तो उसका अर्थ यही है कि समाज की समस्याएं दूर होनी चाहिए। ऐसे ही स्वयंसेवकों के ध्यान में आया कि चारधाम यात्रा के लिए लाखों लोग यहां आते हैं, लेकिन उन्हें यहां की परिस्थितियों का पूरा ज्ञान नहीं होता। यहां का तापमान अचानक माइनस 10 तक पहुंच जाता है। लोग उसके लिए तैयार नहीं होते हैं।
12-13 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद उन्हें दिक्कत होने लगती है। भारत की इस दूरस्थ सीमा तक आने वाले तीर्थयात्री हमारे देश के प्रहरी जैसे हैं। केदारनाथ जी के दर्शन करते हुए वे देखते हैं कि मेरा भारत यहां तक है। हमारे पहाड़ कैसे हैं, जंगल कैसे हैं, यहां के लोग कैसे रहते हैं, नदियां कैसी हैं, इस भूमि के साथ वे एकरूप हो जाते हैं। हमारी ये यात्राएं राष्ट्रीय एकता का बहुत बड़ा प्रमाण हैं। यहां मौसम कई बार अचानक खराब हो जाता है। ऐसे में कई बार यात्री संकट में आ जाते हैं। उनका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। ऐसे में स्वयंसेवकों के ध्यान में आया कि तीर्थयात्रा के लिए आए इन देशभक्त यात्रियों को उचित सुविधा मिलनी चाहिए।
इसी उद्देश्य से 2019 में अस्पताल शुरू किया गया। पिछले 6-7 वर्ष में इस चिकित्सालय ने बहुत सेवा की है। एक-एक सत्र के छह महीने में डेढ़ लाख से लेकर एक लाख साठ हजार तक रोगी आते हैं। लेकिन अस्पताल इतना बड़ा नहीं था। कई लोगों को हाइपोथर्मिया हो जाता है। अत्यधिक ठंड से जान का खतरा हो जाता है। ऑक्सीजन का स्तर 40-50 तक पहुंच जाता है। किसी की हड्डी टूट जाती है, तो आगे जाना कठिन हो जाता है। ऐसे लोगों को 4 घंटे, 6 घंटे या एक दिन रुकना पड़ता है, ताकि वे विश्राम कर सकें। ऑपरेशन हो जाए। इंजेक्शन लग जाए और सामान्य होने के बाद आगे जा सकें। पहले अस्पताल इतना बड़ा नहीं था। कई लोग घोड़े पर बैठकर पहुँचते थे, लेकिन अस्पताल में पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। वहाँ केवल 10-15 मरीजों को ही भर्ती किया जा सकता था। बाकी लोगों को औषधि देकर भेजना पड़ता था। इसलिए विचार आया कि बड़ा अस्पताल बने।
जहां 60-70 लोगों को भर्ती किया जा सके, ताकि वे पूरी तरह स्वस्थ हो सकें। इस संस्था में स्वयंसेवक भी हैं और समाज के बहुत अच्छे लोग भी हैं। सब मिलकर इस संस्था को चलाते हैं। इस अस्पताल के शुरू होने से हमारे तीर्थयात्रियों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी। वे स्वस्थ होकर प्रसन्नता के साथ वापस जाएंगे। जो लोग तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र आदि से आते हैं, उनके लिए उत्तराखंड की परिस्थितियां बिल्कुल नई होती हैं। उन्हें अब यहां पर बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएं मिल सकेंगी।
शताब्दी वर्ष में संघ के आयोजनों को देखें तो- हिंदू सम्मेलन, युवा सम्मेलन और प्रबुद्ध जन गोष्ठियों जैसे अनेक कार्यक्रम व्यापक स्तर पर हुए हैं। इन आयोजनों के पीछे के विचार की दृृष्टि क्या है ? शताब्दी वर्ष का उद्देश्य इतना ही है कि हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक जाएं, समाज के लोगों से मिलें और उन्हें एक अच्छे वातावरण में यह बताएं कि संघ क्या कर रहा है और क्या कार्य कर चुका है। इसी उद्देश्य से हमारे स्वयंसेवक घर-घर गए हैं और लगभग 12 करोड़ परिवारों तक पहुंचे हैं। हमें ऐसे लोग भी मिलते हैं, जो कहते हैं कि हमारे योग्य कोई काम बताइए।
यह देखकर मुझे आनंद होता है कि देश में लाखों लोग ऐसे मिले हैं, जो इस कार्य में किसी न किसी प्रकार से सहयोग करना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि हम क्या कर सकते हैं। तब वहां के कार्यकर्ता उनकी रुचि, स्वभाव और क्षमता को देखकर, समाज में जहां जो आवश्यकता है, उस प्रकार के कार्यों से उन्हें जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। हजारों लोगों को इस प्रकार विभिन्न कार्यों में लगाया भी जा चुका है। यह बहुत बड़ा और दीर्घकालिक कार्य है।
जब हम 10-12 करोड़ परिवारों तक पहुंचे हैं, तो उसका अर्थ है कि लगभग 60-70 करोड़ लोगों तक स्वयंसेवक इस बार पहुंचे हैं। शताब्दी वर्ष का भाव यही है कि समाज इस कार्य को समझे। यह केवल संघ का कार्य नहीं है, यह सबका कार्य है। पूरे 144 करोड़ लोगों की जिम्मेदारी है कि इस देश को अच्छा बनाने में उनकी भूमिका हो। हम केवल उनकी उस भूमिका का स्मरण कराना चाहते हैं।शताब्दी वर्ष के आगे संघ के कार्य की गति और दिशा को आप किस रूप में देखते हैं? हम चाहते हैं कि संघ का कार्य अब तीव्र गति से बढ़े, क्योंकि 99 प्रतिशत से भी अधिक लोगों ने संघ को स्वीकार किया है। उनकी इच्छा है कि यह कार्य बढ़े। उनकी इच्छा है कि देश सभी दृष्टियों से और अधिक सामर्थ्यवान बने। हमारी छोटी-छोटी कमियां भी दूर हों। समाज की यह इच्छा है और हमारी भी यही इच्छा है। इसलिए संघ समाज के ऐसे लोगों के साथ मिलकर आगे बढ़ेगा। पहला, हम अपने सामर्थ्य को बढ़ाएंगे। आज हमारी 90,000 शाखाएं हैं। हम चाहते हैं कि अगले वर्ष यह संख्या 1,00,000 तक पहुंचे।
दूसरा, स्वयंसेवक जो भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य कर रहे हैं, उनमें उनकी गति और आगे बढ़े। तीसरा, सभी संगठन अपने-अपने क्षेत्र में कार्य करते हुए देश को समग्रता के साथ देखें। केवल मेरा क्षेत्र अच्छा हो जाए, इतना ही ध्यान में न रहे। उद्योग जगत आगे बढ़े, श्रमिक परिवार भी अच्छे से आगे बढ़े, प्रकृति भी सुरक्षित रहे, समाज और प्रशासन अच्छा हो।
आज क्लाइमेट चेंज जैसी चुनौतियां सामने हैं, इसलिए पर्यावरण भी सुरक्षित रहना चाहिए। अर्थात एक ओर औद्योगिक उत्पादन बढ़े, दूसरी ओर श्रमिक का परिवार भी संपन्न हो और पर्यावरण भी अच्छा रहे। सब मिलकर देश की सर्वांगीण उन्नति में योगदान दें। देश की सर्वांगीण उन्नति में उद्योग जगत की भूमिका हो, शिक्षा जगत की भूमिका हो, सेवा कार्यों की भूमिका हो। सभी अपने-अपने कार्य करते हुए पूरे देश को समग्रता के साथ देखने का स्वभाव विकसित करें, हम यही चाहते हैं।
हाल ही में देश में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव परिणाम भी आए हैं। इनमें पश्चिम बंगाल भी शामिल है। मैं इसे राजनीतिक सवाल के रूप में नहीं वरन सांस्कृतिक दृष्टि से पूछना चाहता हूं कि इस समय देश का जो मन और स्वभाव मत परिणामों के रूप में अभिव्यक्त हुआ है, संघ उसे कैसे देखता है? आप उसे कैसे देखते हैं? पश्चिम बंगाल की समस्या पिछले लगभग 40 वर्ष से ऐसी ही रही है। यह दुर्भाग्य रहा कि उस समस्या को विभिन्न राजनीतिक दलों ने ठीक प्रकार से नहीं समझा और अपने-अपने स्वार्थ में डूब गए। जनता बहुत दुखी है। सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां से हिंदू पलायन कर चुका है और सैकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां पलायन की स्थिति बन गई है। संदेशखाली की स्थिति सबने जानी है। सीमावर्ती जिले-मुर्शिदाबाद, दिनाजपुर और मालदा सहित अन्य अनेक स्थान हैं, जहां की स्थिति हम सभी जानते ही हैं। ऐसे में तो समाज को ऐसा लगने लगा कि पुराने राजनीतिक लोग केवल अपनी जीत की चिंता करते हैं। राजनीति की ही चिंता करते हैं। वे किसी भी प्रकार सत्ता में बने रहना चाहते हैं, बस। बंगाल कहां जाएगा, इसकी चिंता उन्हें नहीं है।
20 साल बाद बंगाल का क्या होगा, इसकी चिंता नहीं है। लाखों बांग्लादेशी आकर बंगाल में बस गए, स्थापित हो गए। इसकी चिंता नहीं है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद अनेक जिलों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए, ऐसा क्यों हुआ? विभाजन के दौरान कुछ लोगों का षड्यंत्र था कि पूरा बंगाल और असम भी पाकिस्तान में चला जाए। तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी और गोपीनाथ बोरदोलोई खड़े हुए, जिसके कारण असम और बंगाल बचा। गोपीनाथ बोरदोलोई ने संघर्ष किया, तब असम बचा। इधर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने संघर्ष किया, तब पश्चिम बंगाल बचा। लेकिन पिछले कुछ दशकों में वहां जो परिस्थितियां बनीं, उन्हें देखकर लोगों को लगने लगा था कि अब बंगाल खतरे में है। यदि ऐसा ही 20-25 वर्ष और चलता रहा, तो बंगाल को बचाना कठिन हो जाएगा।
वहां हिंदू समाज के लिए रहना कठिन हो जाएगा। इसलिए लोगों ने एकमत से निर्णय दिया कि अब बंगाल को किसी भी प्रकार सुरक्षित रखना है। बंगाल की संस्कृति को सुरक्षित रखना है। बंगाल की डेमोग्राफी को सुरक्षित रखना है। आज क्या बांग्लादेश में वंदे मातरम् गा सकते हैं? नहीं। क्या आज बांग्लादेश को पंथनिरपेक्ष देश कहा जा सकता है? नहीं। जो क्षेत्र बांग्लादेश या पाकिस्तान में चला गया, वहां लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता नहीं बची। लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता तभी तक रहती है, जब तक वहां हिंदू बहुसंख्यक है। यह बात सबको समझनी चाहिए। इसलिए बंगाल के लोगों ने जो निर्णय दिया है, वह अपने अनुभव के आधार पर दिया है। वे बहुत कष्ट में थे, बहुत दुख में थे। यह निर्णय उन्होंने बहुत सोच-विचार करके लिया है और इसके पीछे उनका 40 वर्ष का अनुभव है। सब अनुभवों के आधार पर लोगों को लगा कि परिवर्तन होना ही चाहिए। उन्हें लगा कि बंगाल को सुरक्षित रखने का यही मार्ग है, इसलिए उन्होंने यह मार्ग चुना।
ठीक समय पर यह निर्णय लिया गया है, अन्यथा बंगाल और कठिनाई में चला जाता। आप 1951 से अब तक बंगाल की डेमोग्राफी देखिए, वह कैसे बदली और क्यों बदली? सबको रहने का अधिकार है, तो डेमोग्राफी एकतरफा क्यों बदलती है? 1951 में पूर्वी पाकिस्तान, जो आज बांग्लादेश है, वहां हिंदू जनसंख्या लगभग 22-23 प्रतिशत थी। आज वह घटकर 6-7 प्रतिशत क्यों रह गई? वे लोग कहां गए? वहां ऐसा वातावरण क्यों बना कि उन्हें छोड़कर आना पड़ा? आंकड़े अत्यंत डराने वाले हैं। बाकी 15 प्रतिशत लोग कहां गए?
वहां रहने लायक वातावरण नहीं बचा, इसलिए लोग अपने गांव, मकान और दुकान छोड़कर असहाय होकर यहां आए। यहां नागरिकता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि वहां उनका जीवन सुरक्षित नहीं बचा। इसलिए हम कहते हैं कि लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता तभी तक रहती है, जब तक वहां हिंदू बहुसंख्यक है। यह ध्यान में रखने वाली बात है। इसलिए पश्चिम बंगाल के लोगों ने देर से ही सही, पर निर्णय लिया। यह निर्णय उन्हें 15-20 वर्ष पहले लेना चाहिए था, लेकिन देर से लिया गया निर्णय भी अच्छा है।