पंजाब नगर निकाय चुनावों को लेकर आए परिणामों में चाहे आम आदमी पार्टी ने भारी जीत हासिल की है परंतु भाजपा ने पिछले चुनावों के मुकाबले अपनी स्थिति में आशातीत सुधार किया है। कांग्रेस और अकाली दल (बादल) के प्रदर्शन में गिरावट देखने को मिली है। उधर, नतीजों का दूसरा पक्ष यदि देखें तो इन छोटे चुनावों (वार्डों तक सीमित) में जनादेश का बड़ा संदेश भी सामने आया है जो इस बात का संकेत देता है कि इस बार विधानसभा चुनाव के रण में मुकाबला रोचक होगा।
भाजपा ने मजबूत की सियासी जमीन
भले ही चुनाव में सत्तारूढ़ आप को बढ़त मिली है मगर भाजपा ने भी अपनी सियासी जमीन को मजबूत किया है। भाजपा जो कि पंजाब में अपने जनाधार के लिए बरसों से जूझ रही है, उसका प्रदर्शन सधी हुई रणनीति का नतीजा कहा जा सकता है। साल 2021 के निकाय चुनाव में भाजपा 2215 में से 49 सीटों पर सिमट गई थी मगर इस बार निकाय की कुल 1977 सीटों में से भाजपा ने 172 सीटों पर जीत दर्ज की है। आठ नगर निगमों से दो पर (अबोहर और पठानकोट नगर निगम) तो अपना वर्चस्व भी स्थापित किया है। ऐसा तब है जब वर्तमान में 1977 सीटों में से भाजपा के प्रत्याशी सिर्फ 1316 सीटों पर ही चुनाव लड़ रहे थे, काफी नामांकन रद्द हो गए थे। भाजपा ने अपने इस प्रदर्शन से यह जता दिया है कि आठ माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उसे हल्के में लेना विरोधियों के लिए नासमझी हो सकती है।
कांग्रेस-शिअद का प्रदर्शन लचर
कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत निराशाजनक रहा जबकि शिरोमणि अकाली दल (शिअद) को भी नुकसान हुआ। कांग्रेस और शिअद के प्रदर्शन का जिक्र करना इसलिए जरूरी है क्योंकि दोनों दलों ने लंबा समय तक पंजाब सूबे की सत्ता को संभाला है। ऐसी स्थिति में निकाय चुनाव में इन दलों के ऐसे हश्र की उम्मीद नहीं थी वो भी तब जब पिछले साढ़े चार साल से पार्टी के आला नेता आप सरकार की घेराबंदी में जुटे हुए थे। इन दलों की घेराबंदी ध्वस्त हुई।
कांग्रेस का बिगड़ा गणित
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में 13 में से 7 सीटें जीतने के बाद कांग्रेस इस बात का दावा कर रही थी कि उन्होंने साल 2022 के विधानसभा चुनाव में आप की आंधी (117 में से 92 सीटों पर जीत) को रोक दिया है। आला नेता भी शहरी और ग्रामीण मतदाताओं पर पार्टी की पकड़ को मजबूत बता रहे थे मगर साल 2026 के निकाय चुनाव के नतीजों ने तस्वीर ही बदल दी। साल 2021 के निकाय चुनाव में 2165 सीटों में 1399 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अबकी बार 1977 सीटों में से केवल 384 सीटों पर ही सिमट गई। 2021 के चुनावों में कांग्रेस ने 8 नगर निगमों में से 6 पर कब्जा जमाया था और अब वह केवल कपूरथला में ही अपना परचम लहरा पाई है। कपूरथला में भी उसकी जीत अपनी नहीं बल्कि यहां के प्रभावशाली नेता राणा गुरजीत सिंह उनके बेटे के निजी प्रभाव से जीती गई सीटें मानी जा रही हैं।
कमजोर दिखा बादल का दल
शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल अपने शिरोमणि अकाली दल को इस चुनाव में कुछ खास नहीं दिलवा पाए। साल 2021 में भी शिअद सत्ता से बाहर थी मगर फिर भी निकाय चुनाव में 284 सीटें जीती थी मगर इस बार 191 सीटों पर जीत मिली पाई है। आजाद प्रत्याशी भी साल 2021 में 364 सीटों पर जीते थे इस बार वे 251 सीटों पर सिमट गए हैं जबकि बसपा 5 सीटों से बढक़र 7 सीटों पर पहुंची है। खैर, इन नतीजों पर मंथन के बाद सभी दल आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपनी-अपनी सियासी रणनीति को धार देने में जुटेंगे।
हर बार सत्ताधारी दलों ने जीते निकाय चुनाव पर विधानसभा चुनावों के परिणाम और रहे
2026 के नगर निकाय चुनावों को लेकर चाहे मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने अपनी खूब पीठ थपथपाई है परंतु वे भूलते हैं कि निकाय चुनावों के पिछले तीन परिणामों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि हर बार सत्ताधारी दलों ने इन चुनावों में भारी जीत हासिल की परंतु विधानसभा चुनावों में वे पराजित हुए। साल 2015 के निकाय चुनावों में अकाली दल-भाजपा गठजोड़ ने 8 में से 6 नगर निगमों पर कब्जा जमाया परंतु 2017 के विधानसभा चुनाव यह गठजोड़ हार गया।
इसी तरह 2021 में कांग्रेस ने इन 8 नगर निगमों में कांग्रेस ने 8 में से 6 निगमों पर कब्जा जमाया परंतु 2022 में कांग्रेस विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित हुई। अब आम आदमी पार्टी ने भी 8 में से 5 नगर निगमों में जीत हासिल की है जो इस बात की कोई गारंटी नहीं देती कि 2027 के विधानसभा चुनावों में उसकी जीत गारंटीशुदा हो गई है।
वैसे भी राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि निकाय चुनावों में हमेशा सत्ताधारी पार्टी की ही तूती बोलती है और वर्तमान में आप को मिली जीत इतनी बड़ी जीत भी नहीं है जितना कि दावा किया जा रहा है। इन विश्लेषकों का कहना है कि तमाम तरह के हथकंडे बरतने के बावजूद भी सत्ताधारी पार्टी पचास प्रतिशत जीत हासिल नहीं कर पाई है।











