De-listing पर जनजाति सुरक्षा मंच मुखर, PM और राष्ट्रपति से मिलकर रखीं कई मांगें
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संस्कृति छोड़ने पर नहीं मिलेगा आरक्षण: De-listing पर जनजाति सुरक्षा मंच मुखर, PM और राष्ट्रपति से मिलकर रखीं कई मांगें

दिल्ली में जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम मोदी से मुलाकात के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दो टूक कहा कि संस्कृति छोड़ने वालों को अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

Written byShivam DixitShivam Dixit
May 29, 2026, 06:51 pm IST
in भारत, दिल्ली

नई दिल्ली। जनजाति सुरक्षा मंच के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी और माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से भेट की है। इस भेंट के दौरान लाल किला, नई दिल्ली में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक समागम एवं जनजाति समाज के धर्म, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण से जुड़ी अत्यंत महत्वपूर्ण बातों पर उनसे चर्चा हुई है।

इस अत्यंत संवेदनशील और देशव्यापी विषय पर विस्तृत जानकारी साझा करने हेतु जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा एक पत्रकार वार्ता (Press Conference) का आयोजन दिल्ली के संस्कार भारती कला संकुल में किया किया गया।

जिसमे जनजाति सुरक्षा मंच ने बताया गया कि भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में 24 मई को दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित ‘जनजाति समागम 2026’ जनजातीय संस्कृति, परंपरा, आस्था और अस्मिता का विराट राष्ट्रीय प्रतीक बनकर सामने आया।

देश भर के 500 से अधिक जनजातीय समुदायों से आए लाखों जनजातीय बंधु-भगिनी पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, लोकनृत्य, वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ इस ऐतिहासिक समागम में सम्मिलित हुए।

दिल्ली की सड़कों पर उतरी भारत की जनजातीय विरासत

राजधानी दिल्ली की सड़कों पर जनजातीय संस्कृति का अद्भुत दृश्य उस समय देखने को मिला, जब राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कुदसिया बाग और श्यामगिरि मंदिर सहित विभिन्न स्थानों से विशाल शोभायात्राएँ प्रारंभ होकर लाल किला मैदान पहुँचीं। लेह-लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक के जनजातीय समाज ने अपनी वेशभूषा, लोकधुनों, मांदर-ढोल, पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से भारत की जनजातीय विरासत की जीवंत झलक प्रस्तुत की।

“यह जनजातीय समाज का महाकुंभ है” – अमित शाह

कार्यक्रम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने जनजातीय समाज की आस्था, संस्कृति, प्रकृति पूजा, जल-जंगल-जमीन और जीवन-पद्धति को भारत की सांस्कृतिक आत्मा से जुड़ा हुआ बताया।

श्री अमित शाह ने कहा: “यह समागम आने वाले वर्षों में जनजातीय समाज के महाकुंभ के रूप में स्मरण किया जाएगा। जनजातीय समाज ने बिना लिखित नियमों के ‘अनेकता में एकता’ और ‘एकता में अनेकता’ के मंत्र को जीवन में साकार किया है।”

समागम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का रक्षक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्राचीन और जीवंत स्वरूप है। आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब जनजातीय जीवन-दर्शन टिकाऊ विकास का प्रेरक मॉडल प्रस्तुत करता है।

मतांतरण करने वालों का ST दर्जा हो खत्म: जनजाति सुरक्षा मंच

जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि यह समागम केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि 75 वर्षों से लंबित उस न्यायपूर्ण मांग की राष्ट्रीय पुनर्पुष्टि है, जिसकी प्रतीक्षा आज भी देश का समस्त जनजातीय समाज कर रहा है।

मंच ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाजों और सामाजिक आचारों का परित्याग कर देता है, उसे अनुसूचित जनजाति (ST) का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभ प्राप्त नहीं होने चाहिए।

मंच का स्पष्ट मत-

“आस्था का त्याग संस्कृति का त्याग है, और संस्कृति का त्याग पहचान का त्याग है।”

मंच ने न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि धर्मांतरण के बाद कोई व्यक्ति अपने समुदाय की परंपराओं से पूर्णतः विच्छिन्न हो जाता है, तो उसे ST का लाभ नहीं मिलना चाहिए। इसके लिए एक स्पष्ट, सरल और प्रभावी वैधानिक व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिला प्रतिनिधिमंडल, रखीं 3 प्रमुख मांगें

जनजाति सुरक्षा मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 मई 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से राष्ट्रपति भवन में भेंट की। चर्चा मुख्य रूप से तीन मांगों पर केंद्रित रही, जिन्हें मंच पिछले दो दशकों से उठाता आया है:

  • प्रथम: लोकुर समिति के मानदंडों के अनुरूप “अनुसूचित जनजाति” की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा निर्धारित की जाए, जो वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं के अनुकूल हो।
  • द्वितीय: संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की भांति संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में भी आवश्यक संशोधन या स्पष्टीकरण किया जाए। जिससे यह स्पष्ट हो सके कि धर्मांतरण कर चुके व्यक्ति को अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।
  • तृतीय: जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का दीर्घकालीन प्रश्न हल किया जाए, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने चंद्रमोहन बनाम राज्य (2004) तथा हाल ही में चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2026 INSC 283) में भी विचार किया है।

दोहरे लाभ पर सवाल और 1970 से जारी संघर्ष

मंच ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि लगभग 12 करोड़ की कुल जनजातीय जनसंख्या में से अनुमानतः 1.5 से 2 करोड़ व्यक्ति ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो चुके हैं। ये लोग एक ओर अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का भी दोहरा लाभ उठा रहे हैं, जो संवैधानिक समता की मूल भावना के विरुद्ध है।

यह ऐतिहासिक मांग सर्वप्रथम 1970 में स्वर्गीय डॉ. कार्तिक उरांव द्वारा संसद में उठाई गई थी, जिसे उस समय 235 सांसदों का समर्थन प्राप्त हुआ था। इसके अलावा 2009-10 में 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र कर तत्कालीन राष्ट्रपति को सौंपे गए थे। वर्ष 2011 से अब तक प्रधानमंत्री को 5.70 लाख पोस्टकार्ड भेजे जा चुके हैं।

प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि इस विषय को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष प्रेषित किया जाए और संविधान आदेश 1950 में संशोधन कर करोड़ों जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा की जाए। समागम का समापन जनजातीय अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने के मजबूत राष्ट्रीय आह्वान के साथ हुआ।

Topics: जनजाति सुरक्षा मंचलाल किला मैदानजनजाति समागम 2026Janjati Samagam 2026 DelhiJanjati Suraksha Manch Press ConferenceTribal Delisting DemandNo Reservation For Converted TribalsPM Modi President Meet TribalsDr Kartik Oraon 1970 Demandधर्मांतरण
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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