स्वातंत्र्यवीर सावरकर पर इस सप्ताह से एक विशेष श्रृंखला की शुरुआत की जा रही है। इसके माध्यम से उनके जीवन के बहुआयामी पक्षों के बारे में जानकारी दी जाएगी। प्रस्तुत है पहली कड़ी
वीर सावरकर बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। सावरकर जी में महर्षि वाल्मीकि व ज्ञानेश्वर की प्रतिभा, महर्षि व्यास-सा सर्वगामित्व, छत्रपति शिवाजी का शौर्य, चाणक्य की नीति, श्रीहर्ष की बुद्धि, चार्वाक का तर्क, कालिदास का काव्य, भीष्म का निग्रह, पतंजलि व वशिष्ठ-सी स्थितप्रज्ञता, मनु के नवनिर्माण का आवेश, बुद्ध की उदारता, शंकर का समन्वय, नचिकेता का अदम्य साहस, अष्टावक्र की निर्भीकता, दधीचि का आत्मयज्ञ, गुरु गोविंद सिंह का सपरिवार बलिदान, कृष्ण का कर्षण व राम की रमणीयता आदि का अपूर्व संगम दृष्टिगोचर होता है।
वे सशस्त्र क्रांति के पुरोधा तो थे ही, निःशस्त्र आंदोलन के भी प्रणेता थे। वे मात्र हिंदुत्वनिष्ठ नहीं, अपितु हिंदुत्व के निर्माता भी थे। वे पुरोगामी, विवेकी, बुद्धिनिष्ठ चिंतक थे। जितने वे तर्ककठोर विचारक थे, उतने ही संवेदनशील कवि भी थे।
कवि भी ऐसे कि बिना कुछ साधन-सामग्री के, बेड़ियों में जकड़े हाथ-पांवों के साथ, “मैं एक-दो नहीं, पूरे पचास साल के लिए बंदी रहने वाला हूं।” ऐसी घोर निराशामयी परिस्थिति में भी कांटा, कील अथवा जो भी साधन उपलब्ध हुआ, उससे कालापानी की दीवारों पर कालिदास-सा सुकोमल काव्य अंकित करते गए। काव्य भी ऐसा, जिस पर कालापानी की यातनाओं की तनिक भी छाया नहीं पड़ती। उन्होंने जीवनभर मृत्यु से दो हाथ किए और अंत समय प्रायोपवेशन द्वारा स्वयं उसका वरण किया।
साहित्यकार
गद्य और पद्य साहित्य की दो प्रमुख विधाएं हैं। गद्य में कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध और जीवनी प्रमुख प्रकार माने जाते हैं, जबकि पद्य में कविता, गीत, खंडकाव्य और महाकाव्य का समावेश होता है। सामान्यतः कोई प्रतिभाशाली साहित्यकार इनमें से एक अथवा कुछ विधाओं में ही विशेष प्रावीण्य प्राप्त कर पाता है। अधिकांश साहित्यकार एक ही भाषा में साहित्य-सृजन करते दिखाई देते हैं। अध्ययन और अध्यापन के साथ साहित्य-निर्माण करना स्वाभाविक माना जाता है, किंतु राजनीति, समाजनीति और राष्ट्रकारण जैसे क्षेत्रों में सक्रिय रहते हुए, वह भी नेतृत्व के उच्च पद पर कार्यरत होकर, उच्चकोटि तथा विपुल मात्रा में साहित्य-रचना करना अत्यंत विरल है। साहित्यकार सावरकर ऐसे ही विरलतम साहित्यकारों में गिने जाते हैं।
सावरकर जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सृजन किया। उनका साहित्य लगभग सोलह लाख शब्दों, छह हजार पृष्ठों तथा 49 ग्रंथों में विस्तृत है। वे सिद्धहस्त लेखक और प्रतिभासंपन्न कवि थे। कहानी, उपन्यास, नाटक और काव्य जैसी ललित विधाओं के साथ-साथ लेख, आलेख, निबंध, प्रबंध, इतिहास और जीवनी जैसी चिंतनप्रधान विधाओं में भी वे समान रूप से पारंगत थे।
कहानियां
1924 से 1937 के बीच उन्होंने लगभग 22 कहानियां लिखीं। इनका प्रमुख उद्देश्य समाज से अंधश्रद्धा और अस्पृश्यता का उन्मूलन था। इन कथाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदू समाज में प्रचलित गो-पूजा, प्रार्थना, व्रत, अनशन आदि का मार्मिक एवं कथात्मक शैली में विश्लेषण किया। कुछ कथाओं में इस्लाम में पनप रही अंधश्रद्धाओं का भी यथार्थ चित्रण मिलता है।
उपन्यास
सावरकर जी ने ‘कालापानी’ और ‘मोपला कांड’ नामक दो उपन्यास लिखे। ‘कालापानी’ में बाबागिरी और पाखंड का चित्रण है, जिसमें यह दिखाया गया है कि हिंदू समाज किस प्रकार सरलता से पाखंड में फंस जाता है तथा मुसलमान किस प्रकार उसका लाभ उठाते हैं। ‘मोपला कांड’ का दूसरा शीर्षक ‘मुझे उससे क्या?’ भी है, जो हिंदू समाज की आत्मघाती उदासीन मानसिकता को व्यक्त करता है। 1921 में केरल के मोपला विद्रोह के दौरान हिंदुओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों पर आधारित यह उपन्यास उन घटनाओं का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करता है। वीभत्स, भयानक और करुण रस से परिपूर्ण यह कृति जनमानस को झकझोर देती है। साथ ही यह हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत और “मुझे उससे क्या?” जैसी आत्मघाती प्रवृत्ति पर तीखा प्रहार करती है।
नाटक
उन्होंने ने चार नाटक लिखे। अस्पृश्यता पर प्रहार करने वाला ‘संगीत उःशाप’, पानीपत की पराजय का प्रतिशोध लेने की प्रेरणा देने वाला ‘संगीत उत्तरक्रिया’ तथा अहिंसक राजनीति की आलोचना करने वाला ‘संगीत संन्यस्त खड्ग’-ये तीनों नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत किए गए और जनता द्वारा सराहे गए। चौथा नाटक ‘बोधिवृक्ष’ भगवान बुद्ध पर आधारित था, जो अधूरा रह गया।
जीवनी और संस्मरण
सावरकर जी ने चरित्र-चित्रण, जीवन-वृत्त तथा संस्मरण-तीनों क्षेत्रों में लेखन किया। 1906 में उन्होंने मराठी में ज्युसेपे मेजिनी (इटली के क्रांतिकारी, राजनेता, लेखक और पत्रकार थे, जिन्होंने 19वीं सदी में इटली के एकीकरण (रिसोर्जिमेंटो) में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।)की जीवनी लिखी। 1924 से 1937 के बीच उन्होंने शचींद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल, लाला हरदयाल, अशफाक उल्ला खां, पांडुरंग खानखोजे तथा शशिमोहन डे जैसे क्रांतिकारियों पर चरित्रात्मक लेख लिखे।
उन्होंने स्वातंत्र्यशाहिर गोविंद, शचींद्रनाथ सान्याल की माताजी क्षीरोदवासिनी देवी तथा वी. वी. एस. अय्यर आदि पर मृत्युलेख भी लिखे। 1927 में उनका ‘मेरा आजीवन कारावास’ नामक संस्मरण प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात ‘माझ्या आठवणी : पूर्वपीठिका’, ‘भगूर’, ‘नाशिक’ और ‘शत्रूच्या शिबिरात’ जैसे संस्मरण लिखे। कांग्रेस शासन की क्रांतिकारियों के प्रति उपेक्षापूर्ण दृष्टि के कारण अनेक क्रांतिकारी अपना परिचय सार्वजनिक नहीं करना चाहते थे; परिणामस्वरूप ‘शत्रूच्या शिबिरात’ अधूरा रह गया।
लेख और आलेख
सावरकर जी ने सैकड़ों लेख और आलेख लिखे। ‘प्राचीन अर्वाचीन महिला’ ग्रंथ में मनुस्मृति-कालीन महिलाओं, प्राचीन यहूदी महिलाओं तथा तत्कालीन चीन, इटली और अबीसीनिया के शासकों की पत्नियों पर लेख संकलित हैं। रूस में प्रचलित ‘विवाह-विच्छेद स्वातंत्र्य’ तथा ‘ललना के सौंदर्य के हानि-लाभ’ जैसे विषयों पर भी उन्होंने लेख लिखे। इन लेखों में उनकी प्रगतिशील दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।
‘क्ष-किरणे’ हिंदू समाज में व्याप्त अंधश्रद्धाओं और कुरीतियों की समीक्षा करने वाला लेख-संग्रह है। ‘गांधी गोंधळ’ और ‘गरमागरम चिवड़ा’ महात्मा गांधी की अहिंसा, सत्याग्रह, ब्रिटिश-समर्थक नीति और मुस्लिम तुष्टीकरण पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने वाले लेख-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त ‘हिंदुत्वाचे पंचप्राण’, ‘रणशिंग’ तथा ‘स्फुट लेख-संग्रह’ भी उल्लेखनीय हैं।
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निबंध
उनके ‘जात्युच्छेदक निबंध’ और ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। प्रथम संग्रह में उन्होंने छुआछूत, जातिभेद और वर्णभेद पर तीखा प्रहार किया। वे केवल जातिगत सुधार नहीं, बल्कि जाति-प्रथा के पूर्ण उन्मूलन के पक्षधर थे। ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ हिंदू समाज के मानसिक सशक्तीकरण के उद्देश्य से लिखे गए। इनमें अंधविश्वासों की आलोचना के साथ विवेकपूर्ण जीवन की संकल्पना प्रस्तुत की गई है। संग्रह में संकलित ‘दो शब्दों में संस्कृति’ निबंध आज भी चिंतन को दिशा देने वाला माना जाता है।
प्रबंध
‘हिंदुत्व’ सावरकर जी का 1923 में लिखा गया अद्वितीय प्रबंध है, जिसे मूलतः अंग्रेज़ी में लिखा गया था। इसमें ‘हिंदू’ शब्द की भारतीय व्याख्या प्रस्तुत की गई है तथा हिंदुत्व की अभिनव परिभाषा दी गई है, जो आगे चलकर हिंदूराष्ट्र की अवधारणा का आधार बनी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक नींव में इस ग्रंथ का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
इतिहास-ग्रंथ
‘1857 का स्वातंत्र्यसमर’, ‘हिंदुपदपादशाही’, ‘सिखों का इतिहास’ तथा ‘भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम पृष्ठ’ जैसे इतिहास-ग्रंथ सावरकर जी की विलक्षण ऐतिहासिक दृष्टि के प्रमाण हैं। इनमें से किसी एक ग्रंथ का लेखन भी लेखक को अमर बनाने के लिए पर्याप्त होता, किंतु सावरकर जी ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उनके इतिहास-ग्रंथ शोधपूर्ण होने के साथ-साथ अत्यंत प्रवाहपूर्ण और प्रेरणादायी भी हैं।
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काव्य-खंडकाव्य
सावरकर जी ने लगभग इक्यानवे कविताएं, कुछ उर्दू गजल तथा चार खंडकाव्य लिखे। उनके काव्य में श्लोक, आर्या, लावणी, पोवाड़े, फटके, आरती, स्तोत्र, आख्यान और उपाख्यान जैसे विविध रूप मिलते हैं। उनकी लगभग तेरह हजार पंक्तियों की काव्य-संपदा उपलब्ध है। मराठी में लिखी गईं।
‘सागरा प्राण तळमळला’, ‘श्रीस्वतंत्रता स्तोत्र’, ‘बाजीप्रभूंचा पोवाडा’, ‘तानाजीचा पोवाडा’, ‘स्वदेशीचा फटका’ तथा ‘शिवरायाची आरती’ जैसी रचनाएं ओज, उत्कटता और राष्ट्रभावना से परिपूर्ण हैं। ‘जगन्नाथाचा रथोत्सव’ काव्य-सौंदर्य के साथ वैश्विक चेतना का अनुभव कराता है। ‘सप्तर्षि’, ‘सांत्वन’, ‘माझे मृत्युपत्र’ तथा ‘अनादि मी अनंत मी’ जैसी कविताएं आत्मबलिदान और वीरत्व की प्रखर अनुभूति कराती हैं।
‘कमला’, ‘गोमांतक’ और ‘विरहोच्छवास’ जैसे खंडकाव्य उनकी असाधारण काव्य-प्रतिभा के प्रमाण हैं। यह सब उन्होंने उस समय रचा, जब वे कालापानी में बेड़ियों से जकड़े हुए थे। बिना कलम और कागज के, स्मृति में कविताएं सुरक्षित रखते हुए, उन्होंने कारागृह की दीवारों पर कांटों और कीलों से लगभग आठ हजार पंक्तियां अंकित कीं। आश्चर्य यह कि इन रचनाओं पर कारावास की पीड़ा की छाया तक नहीं पड़ती। उनकी कविता में वीभत्स रस को छोड़कर लगभग सभी रसों का संचार मिलता है, जिनमें वीररस सर्वोपरि है। इसके अतिरिक्त उनके ‘भाषाशुद्धि’, ‘लिपि-सुधारणा आंदोलन’, ‘नेपाल आंदोलन’, ‘लंदन के वार्तापत्र’, ‘ऐतिहासिक निवेदने’, ‘हिंदुराष्ट्र दर्शन’, ‘अभिनव भारत सांगता समारोह’ तथा ‘विविध भाषण’ आदि ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। उनकी केवल कविता ही नहीं, बल्कि समस्त साहित्यिक कृतियां “राष्ट्राय स्वाहा” का मंत्र जपती और जनमानस को जागृत करती प्रतीत होती हैं। इसी कारण साहित्यकार सावरकर कालजयी सिद्ध होते हैं।
















