सीपीएम का तर्क है कि सत्ता चली गई मगर वामपंथियों का अहंकार नहीं गया। वामपंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इसी क्रम में केरल के विपक्षी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने राष्ट्रगान वंदे मातरम के खिलाफ जहर उगला। वो राष्ट्रगान का अपमान करते हुए कहते हैं कि वंदे मातरम को पूरी गाना गाने की कोई आवश्यकता नहीं है। राष्ट्रगान के सम्मान को विजयन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा करार दिया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पिनारायी विजयन ने साफ कहा कि पहले ही यह तय हो चुका है कि वंदे मातरम को पूरा गाने की जरूरत नहीं। सिर्फ शुरुआती दो छंद (स्तोत्र) गाने काफी हैं। उन्होंने कहा, “जब केवल पहले दो छंद गाए जाते हैं तो खड़े होने की भी कोई जरूरत नहीं है। पूरा गाना गाना आरएसएस का एजेंडा है।” उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह का जिक्र करते हुए बताया कि वहां पूरा गाना गाया गया, जो नहीं होना चाहिए था। उसके बाद सरकार ने सख्ती से फैसला लिया है और यही रुख अपनाया जाना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
मामला कुछ यूं है कि केरल विधानसभा में बीते दिनों राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की नीति भाषण के दौरान वंदे मातरम का पूरा गाना नहीं गाया गया था। इसका भाजपा ने विरोध भी किया था। राज्यपाल के भाषण से पहले और बाद में बैंड ने केवल शुरुआती छंद ही बजाए। भाजपा के वरिष्ठ नेता और कझाक्कूटम विधायक वी मुरलीधरन ने कहा कि केंद्र सरकार के निर्देश के मुताबिक राज्यपाल की मौजूदगी वाले कार्यक्रमों में पूरा वंदे मातरम गाया जाना चाहिए, लेकिन केरल विधानसभा ने इसका पालन नहीं किया।
मुरलीधरन ने फेसबुक पर लिखा कि यह लोक भवन और राज्यपाल का अपमान है। वंदे मातरम अपने 150वें साल में है। उन्होंने यूडीएफ सरकार (सीएम वीडी सतीशन के नेतृत्व वाली) पर जमात-ए-इस्लामी और सीपीएम के सामने झुकने का आरोप लगाया। कहा कि सरकार यह मान रही है कि राष्ट्रगान धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।
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कांग्रेस का रुख
मुरलीधरन ने कांग्रेस से भी सवाल किया कि आखिर उनका वंदे मातरम पर क्या स्टैंड है। याद दिलाया कि यह गाना सबसे पहले 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। शपथ ग्रहण समारोह में पूरा वंदे मातरम गाया गया था। उस समय सीपीएम और अन्य वामपंथी दलों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि गाने के कुछ हिस्से धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी समाज के लिए उचित नहीं हैं।
सीपीएम राज्य सचिवालय ने बयान में कहा कि 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने भी गाने के कुछ हिस्सों को छोड़ने की सिफारिश की थी। संविधान सभा की 1950 की चर्चा का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि केवल पहले आठ लाइनें ही आधिकारिक राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार की गई थीं।












