पिछले दिनों पाकिस्तान में पंजाब प्रांत में लाहौर के कई स्थानों के गैर-इस्लामिक नामों की वापसी को लेकर बहुत शोर मचा था। इस्लामपुर को कृष्णनगर किये जाने की योजना थी, सुन्नत नगर को संत नगर और मुस्तफाबाद को धर्मपुरा, तो वहीं मौलाना ज़फ़र अली खान चौक को लक्ष्मी चौक किये जाने की योजना थी। यही नाम इन स्थानों के पहले थे। मगर विभाजन के बाद जब हिन्दू और सिख ही पाकिस्तान में वांछित नहीं हैं तो ये नाम कैसे हो सकते थे?
कुछ अंग्रेजों के नाम पर भी स्थानों के नाम थे, और उन्हें भी वापस किये जाने की योजना थी, जिसे लेकर पाकिस्तान की उदार छवि पेश की जाती। मगर जैसे ही यह खबर सामने आई थी कि पाकिस्तान की पंजाब प्रांत की सरकार कुछ स्थानों के नाम पूर्ववत कर रही है अर्थात 1947 से पहले का कर रही है तो वैसे ही एक तरफ तो वाहवाही हुई कि उसका कितना उदार दिल है, मगर मरियम नवाज और नवाज शरीफ द्वारा संयुक्त रूप से अध्यक्षता वाली बैठक में अनुमोदित इस प्रस्ताव को लेकर सरकार अपने कदम वापस ले रही है।
लाहौर हेरिटेज एरियाज़ रीवाइवल कमिटी ने अब इस घोषणा से अपने पैर वापस खींच लिए हैं और लाहौर के डेप्यूटी कमिश्नर कैप्टन आर मोहम्मद अली इजाज ने कहा कि “इस तरह का कोई भी निर्णय अभी तक नहीं लिया गया है।“ जब उन्हें यह याद दिलाया गया कि इस आशय की तो घोषणा ही नवाज शरीफ और मरियम नवाज कर चुके हैं तो इजाज ने कहा कि यह मामला अभी भी “विचाराधीन है।“
ऐसा क्यों हुआ?
अब यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि ऐसा क्यों हुआ? दरअसल जैसे ही यह घोषणा हुई वैसे ही ऐसा कहा जाता है कि सरकार की आलोचना होने लगी और इसे मजहबी रंग दिया जाने लगा।
सोशल मीडिया पर इंफ्लुएंसर्स और कट्टरपंथियों ने इस निर्णय की आलोचना करनी शुरू कर दी। ऐसा कहा गया कि यह मजहब विरोधी काम है। क्योंकि जो भी नाम वर्तमान में हैं वे सभी इस्लामिक नाम हैं तो वहीं जो नाम पुराने प्रस्तावित थे, वे सिख और हिन्दू पहचान के थे। तो यह आरोप लगने लगा कि पंजाब सरकार महजब का अपमान कर रही है।
कट्टरपंथी समूहों ने इसे इस्लामी पहचान का अपमान तो बताया ही, साथ ही यह भी आलोचना की कि इसके माध्यम से हिन्दू-सिख एजेंडे को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनका कहना था कि अब पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क है, इसलिए यहाँ पर इस्लामिक नाम होने चाहिए। हिन्दू या सिख नामों से क्या मतलब है।
कुछ ने कहा कि जब भारत का विभाजन ही इस आधार पर हुआ था कि पाकिस्तान मुस्लिमों का मुल्क होगा और तो फिर ऐसे में लाहौर में इन जगहों के पुराने नाम करना दो-राष्ट्र सिद्धांत को ही नकार देना है। उनका कहना था कि हमने पाकिस्तान बनाया ही क्यों, अगर यहाँ पर राम और कृष्ण के ही नाम आएंगे।
कुछ का कहना था कि यह भारत के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है। कुछ ने कहा कि यह मुल्क की इस्लामिक पहचान पर प्रहार है।
फिर कुछ ने कहा कि ऐसे नाम इस्लामिक भावनाओं को आहत करते हैं और उन्होनें इस कदम को शिरक और कुफ्र बताया और लोगों को भड़काया कि क्या इसी के लिए शहीदों ने कुर्बानी दी थी कि हिन्दू नाम वापस आएं।
मगर इसके साथ ही यह भी बात सच है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथ की राजनीति ही चलती है। पाकिस्तान में उदारवादी कदम उठाना कम से कम अभी तो संभव नहीं है। इस समय कट्टरपंथी मुस्लिम पार्टियां राजनीति के अखाड़े में आने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं तो ऐसे में लोगों को मजहब के नाम पर भड़काने से बेहतर और क्या हो सकता है? और टीएलपी (तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान) ने तो खुली चुनौती ही दे डाली कि अगर नाम वापस हिन्दू किये गए तो अच्छा नहीं होगा।
पाकिस्तान सरकार ने हमेशा कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेके
ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की सरकार ने पहली बार कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेके हैं, बल्कि यह तो उसकी आदत है। जो 1974 में अहमदी समुदाय को गैर मुस्लिम घोषित करने से लेकर अभी तक चल रहा है। जनरल जिया उल हक ने पहले तो खुद ही कट्टरपंथियों को बढ़ावा दिया तो वहीं बाद में खुद ही इतने कट्टर हो गए कि उन्होनें बेअदबी के कानून को ही ऐसा कानून बना दिया, जिसे लेकर आज तक पाकिस्तान में लिंचिंग तक हो जाती है।
ऐसा कर दिया है कि अगर कोई उसमें सुधार की बात करे तो उसे ही गोली मार दी जाती है, फिर वह कोई भी क्यों न हो। 2011 में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उनके गार्ड मुमताज कादरी ने की थी और मुमताज कादिरी को कितनी इज्जत मिली थी, वह भी सभी ने देखा था।
आसिया बीबी पर आए हुए निर्णय के बाद हिंसा को कोई कैसे भूल सकता है। ईसाई आसिया बीबी को अदालत ने बेअदबी के कानून से मुक्त कर दिया, मगर इस फैसले के बाद टीएलपी ने हिंसक प्रदर्शन किया और सरकार झुकी और आसिया बीबी को पाकिस्तान छोड़कर कहीं और जाना पड़ा था।
हाल ही में पाकिस्तान में बाल-निकाह को लेकर कानून लाया जा रहा था, वह भी शायद वापस ले लिया गया है क्योंकि उसमें हिन्दू लड़कियों का मतांतरण करने में बाधा आ सकती थी।
ऐसे एक नहीं तमाम मामले हैं जिनमें पाकिस्तान सरकार ने कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेके हैं और अब लाहौर वाला मामला सामने आया है।

















