21वीं सदी में चीन वैश्विक राजनीति का ऐसा केंद्र बन चुका है, जिसके प्रभाव से दुनिया का शायद ही कोई क्षेत्र अछूता हो। विशेष रूप से मुस्लिम-बहुल देशों के साथ चीन ने जिस प्रकार व्यापार, निवेश, सैन्य सहयोग और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का विशाल नेटवर्क खड़ा किया है, उसने उसे इन देशों में अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है। चीन का Belt and Road Initiative (BRI) आज पाकिस्तान, सऊदी अरब, ईरान, यूएई, तुर्की, इंडोनेशिया, मिस्र, कतर, मलेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों तक फैला हुआ है। यही कारण है कि चीन में उइगर मुसलमानों और इस्लामी संस्थानों पर कथित दमन के बावजूद अधिकांश मुस्लिम देश सार्वजनिक रूप से मौन दिखाई देते हैं।
चीन की ‘मदद’ और उसके राजनीतिक परिणाम
दरअसल, चीन मुस्लिम देशों को आर्थिक सहायता के साथ उन्हें बड़े पैमाने पर ऋण, ऊर्जा परियोजनाएं, बंदरगाह, रेलवे, हाईवे और रक्षा सहयोग भी प्रदान करता है। पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अरब देशों के साथ चीन के तेल और गैस समझौते अरब अर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ बन चुके हैं। यही कारण है कि जब चीन पर उइगर मुसलमानों के मानवाधिकार हनन के आरोप लगते हैं, तब अधिकांश मुस्लिम राष्ट्र या तो चुप रहते हैं या चीन के समर्थन में बयान देते हैं। चीन के खिलाफ बोलने का अर्थ कई देशों के लिए अरबों डॉलर की परियोजनाओं और निवेश को जोखिम में डालना हो सकता है।
शिनजियांग : जहां मस्जिदें बदल रही हैं अपनी पहचान
चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चिंताएं उठती रही हैं। स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार, 2016 से 2026 के बीच हजारों मस्जिदों को या तो ध्वस्त किया गया या उनका स्वरूप बदल दिया गया। अनुमान है कि शिनजियांग की लगभग 65 प्रतिशत मस्जिदें समाप्त हो चुकी हैं। यह संख्या करीब 16 हजार तक बताई जाती है।
20 मई 2026 को काशगर से सामने आए एक वायरल वीडियो ने वैश्विक बहस को फिर तेज कर दिया है। वीडियो में एक ऐतिहासिक मस्जिद को बंद कर डांस बार में बदला हुआ दिखाया गया। यह क्षेत्र लगभग 98 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाला माना जाता है, लेकिन वहां सार्वजनिक नमाज और (धार्मिक) मजहबी गतिविधियों पर कठोर प्रतिबंधों की खबरें लगातार आती रही हैं।
जब मस्जिदें होटल, बार और शौचालय बनीं
इस संबंध में अब तक सामने आईं रिपोर्टों में कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिन्होंने दुनिया भर में समय-समय पर बहस छेड़ी है। गुलजा की ऐतिहासिक उज़्बेक मस्जिद को “फैनजिंग होटल” में परिवर्तित कर दिया गया, जहां पहले नमाज पढ़ी जाती थी, वहां अब चाय समारोह और नृत्य कार्यक्रम आयोजित होते हैं। सुनताघ गांव की अजना मस्जिद को ध्वस्त कर उसके स्थान पर सुविधा स्टोर बना दिया गया, जहां कथित तौर पर शराब और सिगरेट की बिक्री होने लगी।
इसी प्रकार तोकुल मस्जिद के स्थान पर सार्वजनिक शौचालय बनाया गया। होतान की दुलिंग मस्जिद की जमीन पर होटल परिसर विकसित किया गया। करगिलिक ग्रैंड मस्जिद, जिसे क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक संरचनाओं में गिना जाता था, पूरी तरह मिटा दी गई। कई सूफी तीर्थस्थलों और ऐतिहासिक मस्जिदों को भी या तो ध्वस्त कर दिया गया या उन्हें व्यावसायिक गतिविधियों के लिए पुनः उपयोग में लाया गया।
शिनजियांग के कई क्षेत्रों में मस्जिदों की संख्या को कम कर दिया गया। कहीं 14 में से 13 मस्जिदें बंद हुईं, तो कहीं 65 में से 46 मस्जिदें ध्वस्त कर दी गईं। कई स्थानों पर केवल एक केंद्रीय मस्जिद को कड़ी निगरानी में चालू रखा गया।
मजहबी स्थलों पर नियंत्रण की नीति
चीन सरकार इन कार्रवाइयों को “कट्टरपंथ विरोधी अभियान” और “मजहबी संस्थानों के पुनर्गठन” की नीति का हिस्सा बताती रही है। आधिकारिक तर्क यह दिया जाता है कि अवैध मजहबी गतिविधियों और अलगाववाद को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक हैं। दूसरी ओर समर्थकों का आरोप है कि यह अभियान सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, यह उइगर मुस्लिम पहचान और इस्लामी सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने का प्रयास है।
ओआईसी और मुस्लिम देशों की चुप्पी
आश्चर्य तो दुनिया के 57 मुस्लिम देशों का संगठन Organisation of Islamic Cooperation (OIC) की कार्यप्रणाली को देखकर होता है, जोकि अक्सर फिलिस्तीन, कश्मीर या इस्लामोफोबिया जैसे मुद्दों पर सक्रिय दिखाई देता है, लेकिन चीन के मामले में उसका रुख बेहद नरम रहता है। पाकिस्तान जैसे देश, जो स्वयं को इस्लामी दुनिया का प्रमुख प्रतिनिधि बताते हैं, वे भी चीन के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत नहीं दिखा पाते हैं!
एक तरह से देखा जाए तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक हित माना जाता है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था CPEC पर निर्भर है। खाड़ी देशों के लिए चीन सबसे बड़ा ऊर्जा ग्राहक है। ईरान पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच चीन पर निर्भर है। ऐसे में चीन के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया देना अधिकांश देशों के लिए राजनीतिक और आर्थिक जोखिम बन जाता है।
भारत और चीन के मामलों में अलग-अलग वैश्विक दृष्टिकोण
भारत में जब विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण होता है या सरकारी जमीन से अवैध निर्माण हटाए जाते हैं, तब कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों और मीडिया में इसे “अल्पसंख्यकों पर अत्याचार” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उक्त सभी कार्रवाई कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत होती है, न कि किसी विशेष समुदाय के खिलाफ।
भारत में मुस्लिम समुदाय को संविधान के तहत मजहबी स्वतंत्रता, शिक्षा संस्थान चलाने, वक्फ संपत्तियों के अधिकार और राजनीतिक भागीदारी सहित अनेक अधिकार प्राप्त हैं। देश में लाखों मस्जिदें, मदरसे और धार्मिक संस्थान खुले रूप से संचालित होते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे कई पड़ोसी देशों में हिंदू, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों की आबादी लगातार घटने के आंकड़े सामने आते रहे हैं।
अल्पसंख्यकों की स्थिति पर दोहरा मापदंड?
कई विश्लेषक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय और वैश्विक मीडिया भारत और चीन के मामलों में अलग-अलग मानदंड अपनाते हैं? चीन जैसी महाशक्ति के खिलाफ खुलकर बोलना जहां आर्थिक और रणनीतिक कारणों से कठिन माना जाता है, वहीं भारत एक खुला लोकतंत्र होने के कारण अधिक आलोचना का सामना करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया, न्यायपालिका और विपक्ष की सक्रियता के कारण भारत में हर घटना सार्वजनिक बहस का विषय बन जाती है। इसके विपरीत चीन में सूचना पर सरकारी नियंत्रण अधिक सख्त है, जिससे स्वतंत्र रिपोर्टिंग सीमित हो जाती है।
वैश्विक राजनीति में मानवाधिकार बनाम आर्थिक हित
आज चीन ने अपनी आर्थिक शक्ति के जरिए ऐसा प्रभाव क्षेत्र बना लिया है कि कई देश उसके खिलाफ खुलकर बोलने से बचते हैं। यही कारण है कि शिनजियांग में मस्जिदों के ध्वंस, धार्मिक प्रतिबंधों और सांस्कृतिक नियंत्रण के आरोपों के बावजूद व्यापक इस्लामी विरोध देखने को नहीं मिलता। दूसरी ओर भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में हर प्रशासनिक कार्रवाई वैश्विक बहस का विषय बन जाती है। यह स्थिति बताती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता से अधिक महत्व रणनीतिक और आर्थिक हितों का होता जा रहा है।
बदलती दुनिया का कठोर सच
कहना होगा कि चीन और मुस्लिम देशों के संबंध वर्तमान में सिर्फ गहरे आर्थिक और रणनीतिक हितों पर आधारित हैं। यही कारण है कि शिनजियांग के मुद्दे पर वैश्विक इस्लामी जगत का बड़ा हिस्सा मौन दिखाई देता है। दूसरी ओर भारत में होने वाली घटनाएं अंतरराष्ट्रीय विमर्श में अधिक प्रमुखता से उभरती हैं क्योंकि भारत एक खुला लोकतंत्र है, जहां अभिव्यक्ति और बहस की व्यापक स्वतंत्रता मौजूद है।
अत: यह पूरा परिदृश्य आधुनिक विश्व व्यवस्था का एक कठोर सच सामने लाता है। यह जो सच है, वह यही है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अक्सर आर्थिक शक्ति और रणनीतिक हितों के सामने अन्य बातें पीछे रहती हैं। विश्व को सोचना चाहिए कि आखिर चीन इस्लाम पर इतना नियंत्रण कर क्यों रहा है? क्या इसके पीछे कोई अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं? और यदि हैं, तब फिर इस्लाम के बारे में सभी को एक बार फिर विचार जरूर करना चाहिए कि अन्य गैर मुस्लिम देशों में इस्लाम को कितनी छूट मिले!

















