24 मई को दिल्ली के लाल किला मैदान में “जनजाति सांस्कृतिक समागम” आयोजित होगा। यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की पहचान, परंपरा, आस्था और स्वाभिमान का राष्ट्रीय उद्घोष बनकर सामने आया।
एक लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति, पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच सबसे बड़ा संदेश — “जड़ों को बचाइए, संस्कृति को बचाइए।”
Panchjanya के विशेष कार्यक्रम परख में संपादक हितेश शंकर जी ने बात की है-
▪️ जनजातीय समाज की प्रमुख आकांक्षाएं क्या हैं?
▪️ विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बने?
▪️ PESA Act और Forest Rights Act का महत्व क्या है?
▪️ भाषा, परंपरा और पहचान पर क्यों बढ़ रही है चिंता?
▪️ कन्वर्जन, डीलिस्टिंग और संवैधानिक विमर्श का क्या पक्ष है?
क्या भारत अपने जनजातीय समाज की आवाज को पर्याप्त स्थान दे पा रहा है?
देखिए ‘परख’ का यह विशेष विश्लेषण।

















