झारखंड सरकार ने राज्य के अधिसूचित क्षेत्रों में नई ‘पेसा’ नियमावली को लागू कर दिया है। सरकार का दावा है कि इससे ग्राम सभाएं सशक्त हुई हैं। लेकिन विशेषज्ञ कह रहे हैं कि नई नियमावली से ग्राम सभाएं कमजोर हुई हैं। पहले बालू, मिट्टी, पत्थर, मोरम जैसे लघु खनिजों पर ग्राम सभाओं का अधिकार था। अब उन्हें ‘सरकार के निर्देशों का पालन’ करने वाली इकाई बना दिया गया है। पहले छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट(सी.एन.टी.ए.) या संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (एस.पी.टी.ए.) के उल्लंघन के मामलों में ग्राम सभा को भूमि वापसी की शक्ति प्राप्त थी। अब यह अधिकार वापस ले लिया गया है। पहले अधिसूचित क्षेत्र की जमीन हस्तांतरण करने के लिए उपायुक्त को ग्राम सभा से सहमति लेनी पड़ती थी। अब इसके कई प्रावधानों को या तो कमजोर किया गया है या अस्पष्ट बना दिया गया है। ग्राम सभाओं को जादू-टोना, डायन-बिसाही जैसे अंधविश्वासों को रोकने का तो अधिकार दिया गया है, लेकिन चंगाई सभाओं को वे नहीं रोक सकती हैं, जबकि चंगाई सभा भी अंधविश्वास भरा आयोजन ही है।
इन बदलावों के कारण ही जनजाति समाज नई ‘पेसा’ नियमावली का विरोध कर रहा है। मजेदार बात तो यह है कि राज्य सरकार में शामिल कांग्रेस के विधायक डॉ. रामेश्वर उरांव भी इस नियमावली का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है, “नई नियमावली में प्रथागत कानूनों का पालन नहीं किया गया है।” पूर्व न्यायाधीश प्रकाश कुमार उइके कहते हैं, “नई नियमावली में ‘पेसा’ की मूल भावना से छेड़छाड़ की गई है और ‘रूढ़िजन्य विधि’ को कमजोर किया गया है।” पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास इस नियमावली पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, “क्या ग्राम सभा की अध्यक्षता केवल ‘जनजातीय रूढ़िजन्य परंपरा से आने वालों’ के लिए सुरक्षित रहेगी, या कन्वर्जन कर चुके लोग भी उस पद पर बैठ सकेंगे?” वहीं अर्जुन मुंडा ने नई ‘पेसा’ नियमावली को पेसा एक्ट 1996 की ‘मूल भावना के विपरीत’ बताया है।
यह है पेसा कानून
1992 में 73वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा तो मिल गया, पर अनुच्छेद 243-एम के कारण पांचवीं अनुसूची वाले जनजातीय क्षेत्रों को इससे बाहर रखा गया, जिससे वहां लोकतांत्रिक ढांचा और पारंपरिक स्वशासन के बीच एक तरह का संवैधानिक खालीपन बना रहा। इसी शून्य को भरने के लिए संसद ने सांसद गोपाल सिंह भूरिया की अध्यक्षता में भूरिया समिति गठित की, जिसने 1995 में अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि जनजातीय इलाकों में ग्राम सभा को जल, जंगल, जमीन, परंपरागत रीति-रिवाज, स्थानीय बाजार, लघु वन उपज और विवाद निपटारे जैसे मामलों पर निर्णायक अधिकार दिए जाएं। भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर 24 दिसंबर, 1996 को संसद ने “The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996” यानी ‘पेसा’ अधिनियम पारित किया।

नई ‘पेसा’ नियमावली
प्रकाश कुमार उइके के अनुसार, “झारखंड की नई ‘पेसा’ नियमावली में संविधान के अनुच्छेद 13(3)(क) में वर्णित रूढ़ियों और प्रथाओं की भावना को ही शब्दावली के स्तर पर धुंधला कर दिया गया है। जहां संविधान ‘रूढ़ि’ और ‘प्रथा’ को भी विधि का दर्जा देता है, वहां झारखंड सरकार ने नियमों में ‘रूढ़िजन्य विधि’ और ‘धार्मिक प्रथा’ जैसे शब्दों को हटा या कमजोर कर दिया, जिससे ग्राम सभा की पारंपरिक शक्तियां केवल भावनात्मक और सांस्कृतिक दायरे तक सीमित होकर रह जाएं, विधिक रूप से नहीं।” वे कहते हैं, “जनजाति समुदाय की संस्कृति, आस्था, पहचान, सरना स्थलों की सुरक्षा, कन्वर्जन, ग्राम सभा की अनुमति के बगैर प्रार्थना एवं चंगाई सभा की अनुमति, वक्फ संपत्तियों का पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में निषेध जैसे मुद्दों पर यह नियमावली मौन है।” यह वही बिंदु है जिस पर चम्पाई सोरेन को भी आपत्ति है। वे कहते हैं, “जिस कानून का मकसद जनजातीय समाज की रूढ़िजन्य विधियों और धार्मिक परंपराओं की रक्षा करना था, उसकी झारखंडी व्याख्या में ये शब्द ही गायब कर दिए गए हैं।”
कौन है ‘अन्य’?
नई नियमावली में ग्राम सभा की अध्यक्षता के लिए पारंपरिक ग्राम प्रधानों के साथ-साथ ‘अन्य’ के लिए भी दरवाजा खोला गया है। पूर्व मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन कहते हैं, “अन्य शब्द के सहारे किसी को भी ग्राम सभा के शीर्ष पद पर बैठाया जा सकेगा, यह जनजातीय समाज की रूढ़िजन्य सामाजिक व्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से ध्वस्त करने की शुरुआत है।” वे कहते हैं, “जब जनजातीय क्षेत्रों में जनसांख्यिक संतुलन पहले से बदल रहा हो, घुसपैठ और भूमि पर कब्जों की शिकायतें लगातार बढ़ रही हों, ऐसे समय में ग्राम सभा की अध्यक्षता पर ‘अन्य’ की छाया पड़ना केवल एक प्रशासनिक प्रावधान नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना के नियंत्रण की लड़ाई है।” सोरेन कहते हैं, “पहले ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल से राज्यपाल को हटाया गया, और अब अधिसूचित क्षेत्र में राज्यपाल के अधिकारों को सीमित कर सारे अधिकार उपायुक्त के हाथ में सौंपने की तैयारी है। इसका अर्थ साफ है कि जो व्यवस्था मूलतः ग्राम सभा और राज्यपाल के बीच एक संतुलित सुरक्षा-तंत्र के रूप में खड़ी की गई थी, उसे धीरे-धीरे नौकरशाही-केंद्रित बनाया जा रहा है। क्या यह बदलाव उद्योग जगत, भू-माफिया, या उन शक्तियों के कारण हो रहा है, जो पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में धार्मिक-सांस्कृतिक जनसांख्यिकी को अपने हिसाब से गढ़ना चाहती हैं?”
विरोधियों को छूट
‘पेसा’ की कल्पना में ग्राम सभा ‘स्थानीय विधानमंडल’ है। यानी योजनाएं कहां बनेंगी, संसाधन कैसे उपयोग होंगे, किसे क्या अधिकार मिलेगा, इन सब पर अंतिम निर्णय ग्राम सभा का होना चाहिए। लेकिन नई ‘पेसा’ नियमावली में ग्राम सभा को ‘यथासंभव’ और ‘सहमति न देने पर भी स्वतः स्वीकृति’ जैसे वाक्यों के सहारे एक सलाहकार मंच में बदल दिया गया है। चम्पई सोरेन कहते हैं, “पहले ग्राम सभा राज्य की योजनाओं और अन्य कार्यक्रमों को अनुमोदित करने वाली इकाई थी। अब केवल उनकी सहमति ‘औपचारिक रूप से’ ली जाएगी, और यदि 30 दिन में सहमति न आए तो उसे स्वीकृत मान लिया जाएगा। यह व्यवस्था ग्राम सभा की असहमति को भी कानूनी चुप्पी में बदल देने का तरीका है। न विरोध दिखेगा, न रोक लगेगी, लेकिन सब कुछ ‘नियम के तहत’ होगा। क्या यह जनजातीय स्वशासन का विस्तार है या उसके विरोधियों के लिए कानूनी कवच?”

उद्योग और विस्थापन पर स्पष्टता क्यों नहीं?
चम्पई सोरेन चांडिल बांध से लेकर जमशेदपुर तक के कई उदाहरण गिनाते हुए कहते हैं, “नई नियमावली में अनुसूचित क्षेत्रों में उद्योगों के लिए कोई ठोस दिशानिर्देश नहीं है, न पुनर्वास की अनिवार्य शर्तें, न मुनाफे में स्थानीय हिस्सेदारी की बाध्यता, न पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षा की कोई गारंटी।” उन्होंने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “जिस राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार ने ‘पेसा’ अधिनियम को पारित कराया, उसी बैठक में हिंडाल्को को नोवामुंडी (पश्चिम सिंहभूम) में ग्राम सभा की सहमति के बिना 850 एकड़ जमीन दी गई।”
लाभ किसका, हानि किसकी?
नई ‘पेसा’ नियमावली कॉर्पोरेट घरानों, नौकरशाही और राजनीतिक हितों को सुदृढ़ करती प्रतीत होती है। इसके माध्यम से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सरल बनाया गया है, उपायुक्तों को व्यापक विवेकाधिकार प्रदान किए गए हैं और राजनीतिक वर्ग को ‘पेसा’ के नाम पर श्रेय लेने का अवसर मिल रहा है। इसके विपरीत, वर्षों से अपने अधिकारों की प्रतीक्षा कर रहे जनजातीय समाज को ग्राम सभाओं के पूर्ण और वास्तविक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। विस्थापन जैसी गंभीर समस्या के समाधान हेतु कोई ठोस और प्रभावी व्यवस्था नहीं दिखाई देती। साथ ही, जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और अस्मिता की रक्षा को लेकर भी यह नियमावली पर्याप्त आश्वासन देती प्रतीत नहीं होती। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि इस पूरे खेल के केंद्र में एक जनजातीय मुख्यमंत्री की चुप्पी या सहमति शामिल हो, तो इतिहास उसे किस नाम से याद करेगा?

















