इन दिनों पाकिस्तान के मौलानाओं की कई तकरीरें वायरल हो रही हैं, और इनमें संयुक्त परिवार को लेकर भी एक तकरीर है, जिसे सुना जाना काफी रोचक है और जिसके अनुसार इस्लाम में संयुक्त परिवार जैसी कोई अवधारणा है ही नहीं।
पाकिस्तानी शरिया विशेषज्ञ और मोटिवेशनल स्पीकर साहिल अदीम का बयान
पाकिस्तानी शरिया विशेषज्ञ और मोटिवेशनल स्पीकर साहिल अदीम का तीन साल पुराना बयान इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने एक पॉडकास्ट में कहा कि जॉइन्ट फैमिली तो हिंदुओं ने पैसे बचाने के कारण शुरू किया था, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है। उनके अनुसार, जॉइन्ट फैमिली लड़कों को कमजोर करता है। उनका कहना था कि एक ही घर में अगर बुजुर्ग हैं, तो एक पचास साल का या साठ साल का लड़का, क्योंकि उसके अब्बू अभी जिंदा है, तो ऐसे में वह कोई फैसला नहीं ले सकता है, उसकी सेल्फ एस्टीम जीरो होती है। इसलिए यह सिस्टम लड़कों को कमजोर करता है।
वह कहते हैं कि उस इंसान का डेवेलपमेंट नहीं होता और जब तक उसके अब्बा जी की मृत्यु होती है, तब तक देर हो चुकी होती है। इसीलिए जॉइन्ट फैमिली में बढ़ा हुआ मर्द कभी भी इंडिपेंडेंट डिसिशन नहीं ले सकता है। इसके अनुसार, ऐसा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि जब तक ऐसा करने की उम्र थी, तब तो वह अब्बा की गोदी में था।
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नबी की नहीं थी जॉइंट फैमिली
एक साल पहले के पॉडकास्ट में भी साहिल का कहना था कि किसी भी नबी की जॉइन्ट फेमिली नहीं थी। और पर्सनल लिबर्टी का अधिकार होना चाहिए। उनका मुख्य जोर इसी बात पर है कि चूंकि बाप के रहते बेटा कोई फैसला नहीं ले पाता है, इसलिए जॉइन्ट फैमिली में नहीं रहना चाहिए।
एक भाई दूसरे भाई के बच्चों पर अधिकार कैसे जता सकता है, आदि आदि बातें उनके द्वारा कही गई हैं। उनका कहना है कि इस्लाम में जॉइन्ट फैमिली नहीं है। क्योंकि एक आदमी अपनी बीवी के फैसले अपने आप लेता है, उसकी बीवी और उसके बच्चे का फैसला उसका बाप कैसे कर सकता है?
शौहर के अलावा बीवी किसी से हुक्म नहीं ले सकती है
यह भी इस तकरीर में कहा गया है कि जॉइन्ट फैमिली में यह बहुत ही सामान्य माना जाता है कि बहू अपने ससुर का कहना मानेगी, अर्थात कहीं जाएगी तो ससुर से पूछकर, तो उनका कहना है कि “शौहर के अलावा किसी और हुक्म लेना इस्लाम में गुनाह है!”
उनका कहना था कि निकाह के बाद शौहर और बीवी का अलग घर मे रहना ही बेहतर उपाय है। और लड़के के माँ बाप की सेवा करना बेटे की जिम्मेदारी है, बहू की नहीं। बहू अपने मन से सास-ससुर के काम कर सकती है, मगर उस पर उस काम का कोई फर्ज नहीं है, हाँ! उसे अपने शौहर के माँ बाप की इज्जत करनी चाहिए।
डॉक्टर इसरार अहमद के अनुसार महरम और गैर महरम का तर्क
पाकिस्तान के ही एक और इस्लामिक विद्वान डॉक्टर इसरार अहमद यह तर्क देते थे कि चूंकि इस्लाम में महरम और गैर महरम होते हैं, अर्थात किन मर्दों से निकाह जायज है और किनसे नहीं, तो ऐसे में संयुक्त परिवार में यह नियम टूट जाते हैं।
उनकी अपनी वेबसाइट पर ऐसे तमाम वीडियोज़ हैं, जो यह बताते है कि कैसे जॉइन्ट फैमिली में पर्दा रखना मुश्किल है, मगर किसी न किसी तरह से पर्दा रखना चाहिए। बड़े भाई से छोटे भाई की बीवी को रूबरू नहीं होना चाहिए। उनकी वेबसाइट पर जो वीडियोज़ हैं उनमें साफ कहा गया है कि अगर जॉइन्ट फैमिली में कोई पर्दे का पालन कर सकता है तो जॉइन्ट फैमिली चल सकती है। मगर पर्दा जरूरी है।
इंजीनियर मुहम्मद अली मिर्ज़ा ने भी पर्दे के कारण जॉइन्ट फैमिली को गलत बताया
समा टीवी पर एक कार्यक्रम में इंजीनियर मुहम्मद अली मिर्जा ने भी जॉइन्ट फैमिली को लेकर कहा कि निगाहों का पर्दा करना चाहिए, बाल न दिखें ऐसे हिजाब पहनना चाहिए। उन्होनें कहा कि जेठ और देवर से पर्दा करना चाहिए। उनका कहना था कि पाकिस्तान में एक ही मकान में कई भाई रहते हैं और ऐसे में निगाह का पर्दा हो ही नहीं सकता है। और फिर सीमाएं टूट जाती हैं।
इसमें उन्होंने यह भी कहा था कि सास और ससुर के गलत बर्ताव के चलते ही पाकिस्तान में ओल्ड एज होम्स में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। इंजीनियर मुहम्मद अली की यह बात भारत में मौलाना रशीद की बात का विरोध करती हुई प्रतीत होती है, जिसमें उन्होनें यह दावा किया था कि भारत में वृद्धाश्रमों में मुसलमान बुजुर्ग नहीं मिलते हैं।
पाकिस्तानी इस्लामिक विद्वान जॉइन्ट फैमिली को गलत ठहरा सकते हैं, यह उनका अधिकार है क्योंकि सभी को अपने-अपने दीन के हिसाब से चलने का और व्याख्या करने का अधिकार होता है, परंतु उसके लिए हिंदुओं को नीचा दिखाना कहाँ से आवश्यक हो जाता है, यह समझ से परे है। यह कहना कितना हास्यास्पद है कि भारत में संयुक्त परिवार की व्यवस्था इसलिए है कि पैसे बचाए जा सकें? दरअसल हिंदुओं और मुसलमानों की परिवार की अवधारणा ही एकदम अलग है, इसलिए दो भिन्न अवधारणाओं की तुलना कर अपनी अवधारणा को ऊंचा बताना तो कहीं से भी ठीक नहीं है।











