उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा साजिश मामले में यूएपीए के तहत जेल में बंद जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने उसकी 15 दिनों की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी। उमर खालिद ने अपने मामा के चेहल्लुम में शामिल होने और बीमार मां की सर्जरी के दौरान उनकी देखभाल के लिए राहत मांगी थी, पर अदालत ने इन कारणों को पर्याप्त नहीं माना।
अदालत का स्पष्ट संदेश : हर बार जमानत अधिकार नहीं
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह सही है कि उमर खालिद और अन्य सह-आरोपियों को पहले कई बार अंतरिम जमानत मिल चुकी है और उन्होंने अदालत की शर्तों का उल्लंघन भी नहीं किया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर बार मांगी गई जमानत को मंजूर कर लिया जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हर नई याचिका को उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर परखा जाएगा। अदालत का यह रुख संकेत देता है कि यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में न्यायपालिका अब केवल मानवीय आधारों पर राहत देने में अत्यंत सतर्कता बरत रही है।
चेहल्लुम को अदालत ने नहीं माना पर्याप्त आधार
उमर खालिद ने अपने दिवंगत मामा के चेहल्लुम में शामिल होने के लिए अदालत से अंतरिम जमानत मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि चेहल्लुम में शामिल होना ऐसी अपरिहार्य परिस्थिति नहीं है, जिसके लिए आरोपी को जेल से बाहर भेजा जाए। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यदि संबंध अत्यधिक निकट और भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण होता, तो संभवतः मृत्यु के तुरंत बाद जमानत मांगी जाती, न कि काफी समय बाद।
मां की सर्जरी पर भी अदालत नहीं हुई सहमत
उमर खालिद की ओर से कहा गया था कि उसकी मां की सर्जरी 2 जून को होनी है और परिवार में वही एकमात्र व्यक्ति है जो उचित देखभाल कर सकता है। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि 71 वर्षीय पिता कमजोर स्थिति में हैं और चार बहनें शादीशुदा होकर अलग-अलग स्थानों पर रहती हैं, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि परिवार में अन्य सदस्य मौजूद हैं जो मां की देखभाल कर सकते हैं। अभियोजन पक्ष ने भी दलील दी कि यह कोई अत्यंत गंभीर सर्जरी नहीं बल्कि सामान्य प्रक्रिया है, जिसमें लोकल एनेस्थीसिया का इस्तेमाल किया जाएगा।
बचाव पक्ष ने समानता का सिद्धांत रखा
उमर खालिद के वकीलों ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि सह-आरोपी तस्लीम अहमद, शिफा-उर-रहमान और अथर खान को पूर्व में पारिवारिक परिस्थितियों के आधार पर अंतरिम जमानत दी जा चुकी है, इसलिए समानता के सिद्धांत के आधार पर उमर खालिद को भी राहत मिलनी चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि उमर खालिद ने पूर्व में मिली हर अंतरिम जमानत की शर्तों का पूरी तरह पालन किया और समय पर सरेंडर किया। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि यदि इस बार भी राहत दी जाती है तो किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं होगा।
न्यायालय की नरमी का दुरुपयोग न किया जाए
विशेष लोक अभियोजक ने अंतरिम जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि आरोपी बार-बार कोर्ट की सहानुभूति का लाभ लेने की कोशिश कर रहा है। अभियोजन पक्ष ने कहा कि पूर्व में जिन परिस्थितियों में राहत दी गई थी, वे अलग और अधिक गंभीर थीं, जबकि इस बार प्रस्तुत कारण पर्याप्त नहीं हैं। सरकारी वकील ने यह भी कहा कि चेहल्लुम जैसी धार्मिक रस्में अन्य पारिवारिक सदस्य भी पूरी कर सकते हैं। वहीं मां की देखभाल के लिए भी परिवार में पर्याप्त लोग मौजूद हैं। अभियोजन के अनुसार, अंतरिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जानी चाहिए।
दिल्ली दंगा साजिश केस : क्या हैं उमर खालिद पर आरोप
2020 Delhi Riots से जुड़े इस मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हजारों पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है। चार्जशीट में उमर खालिद की भूमिका को कथित रूप से “रिमोट कंट्रोल” बताया गया है। पुलिस का दावा है कि दिसंबर 2019 से ही उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्लिम बहुल इलाकों में गुप्त बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ था। जांच एजेंसियों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को योजनाबद्ध तरीके से “चक्का जाम” और फिर हिंसक टकराव में बदलने की रणनीति बनाई गई थी। चार्जशीट में यह भी आरोप है कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली के 25 से अधिक स्थानों पर एक साथ विरोध प्रदर्शन शुरू करना किसी स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं बल्कि सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा था।
डोनाल्ड ट्रंप यात्रा के दौरान हिंसा का आरोप
दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में 17 फरवरी 2020 को अमरावती में दिए गए उमर खालिद के भाषण का विशेष उल्लेख किया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान जानबूझकर ऐसा माहौल तैयार किया गया जिससे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की छवि प्रभावित हो। पुलिस के अनुसार, दंगों के समय का चयन अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा था।
व्हाट्सएप चैट, फंडिंग और नेटवर्क के आरोप
चार्जशीट में डिजिटल साक्ष्यों और व्हाट्सएप चैट्स का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि “डीपीएसजी” यानी दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप के जरिए समन्वय किया जा रहा था। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने, लोगों को जुटाने और संसाधन उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न समूह सक्रिय थे।पुलिस का दावा है कि कथित तौर पर पत्थर, पेट्रोल बम और अन्य सामग्रियों की व्यवस्था पहले से की गई थी।
‘अर्बन नक्सल’ बनाम ‘बौद्धिक स्वतंत्रता’ की बहस
उमर खालिद का मामला अब केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं रह गया है, बल्कि यह देश में वैचारिक संघर्ष का प्रतीक भी बन चुका है। कुछ वामपंथी और उदारवादी समूहों द्वारा उमर खालिद के समर्थन में अभियान चलाए जाने, किताबें लिखे जाने और सार्वजनिक विमर्श खड़ा किए जाने को लेकर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। आलोचकों का कहना है कि इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित करने की कोशिश होती है।
पीड़ित परिवारों की पीड़ा और न्याय की प्रतीक्षा
2020 के दिल्ली दंगों में कई लोगों की जान गई, सैकड़ों घायल हुए और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई। अनेक परिवार आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में उमर खालिद और अन्य आरोपियों को लेकर होने वाली हर कानूनी कार्रवाई पीड़ित परिवारों की भावनाओं से भी जुड़ जाती है।दंगों में मारे गए स्पेक्टर अंकित शर्मा जैसे कई मामले हैं, जिन्हें आज भी न्याय का इंतजार है। यदि ये दंगा नहीं होता तो वे सभी आज अपने परिवार के साथ होते। उमर खालिद फिलहाल जेल में ही रहेगा और दिल्ली दंगा साजिश मामले में कानूनी लड़ाई आगे जारी रहेगी।
















