पत्रकारिता की मूल जिम्मेदारी तथ्यों को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करना है। लेकिन जब मीडिया किसी नेता या हस्ती को उसके कानूनी नाम के बजाय विशेषणों से संबोधित करने लगता है, तो वह सूचना देने के साथ-साथ धारणा भी गढ़ने लगता है। यह प्रवृत्ति भाषाई शुद्धता का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समानता और वस्तुनिष्ठता के सिद्धांतों पर भी सवाल खड़ा करती है।
हाल में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय को ‘थलपति’ के नाम से प्रचारित करने का ट्रेंड इसका ताजा उदाहरण है। ‘थलपति’ शब्द का अर्थ ‘सेनापति’ या ‘नायक’ है, जो उनके फिल्मी प्रशंसकों द्वारा दिया गया उपनाम है। मीडिया जब इसे बार-बार इस्तेमाल करता है, तो वह अनजाने में व्यक्ति-पूजा का हिस्सा बन जाता है।
आम तौर पर ये उपाधियाँ पीआर टीमों द्वारा गढ़ी जाती हैं और पार्टी कार्यकर्ता उन्हें दोहराते हैं। लेकिन जब मुख्यधारा का मीडिया इन्हें अपनाता है, तो वह निष्पक्षता की सीमा लांघ जाता है।
जोसेफ विजय: अभिनेता से मुख्यमंत्री तक
हाल में ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने जोसेफ विजय का मामला खास है क्योंकि इसमें सिनेमा की लोकप्रियता और राजनीति का मेल है। एक सफल अभिनेता के रूप में उन्होंने ‘थलपति’ उपाधि अर्जित की। जब वे मुख्यमंत्री बने, तो मीडिया में यह शब्द खूब चला। समाचार शीर्षकों में ‘थलपति ने ऐलान किया’, ‘थलपति सरकार का फैसला’ जैसे वाक्य आम हो गए।
यह समस्या कई स्तरों पर है। पहला, ‘थलपति’ एक फिल्मी छवि है जो वीर, न्यायप्रिय और अजेय नायक की याद दिलाती है। राजनीति में इसका इस्तेमाल जनता के मन में यह धारणा बैठाता है कि विजय कोई साधारण नेता नहीं, बल्कि ‘मसीहा’ हैं। दूसरा, यह आलोचना को मुश्किल बनाता है। नीति की आलोचना को ‘थलपति का अपमान’ के रूप में पेश किया जा सकता है। तीसरा, यह अन्य नेताओं के साथ असमानता पैदा करता है। बाकी मुख्यमंत्री अपने नाम से पुकारे जाते हैं, जबकि विजय ‘थलपति’ बन जाते हैं।
मीडिया को समझना चाहिए कि लोकतंत्र में हर नागरिक समान है। जोसेफ विजय का आधिकारिक नाम ही पर्याप्त है। उन्हें ‘थलपति’ कहना सम्मान नहीं, बल्कि अतिशयोक्ति है जो वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग को प्रभावित करती है।
भाषा की शक्ति और सबलिमिनल मैसेजिंग
भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, धारणा निर्माण का हथियार भी है। मनोविज्ञान में इसे ‘सबलिमिनल मैसेजिंग’ कहते हैं। बार-बार ‘नायक’, ‘सेनापति’ दोहराने से जनमानस में वह व्यक्ति सामान्य से ऊपर दिखने लगता है।
राजनीति में यह अनुचित लाभ देता है। अभिनेता पृष्ठभूमि वाले नेता पहले से ही फेम और प्रभावशाली व्यक्तित्व के करिश्मे का लाभ उठाते हैं। मीडिया की उपाधियां इस लाभ को और बढ़ा देती हैं। परिणामस्वरूप, मतदाता नीतियों के बजाय छवि पर वोट कर सकते हैं।
मीडिया की जिम्मेदारी और नैतिकता
निष्पक्ष पत्रकारिता के सिद्धांतों- जैसे वस्तुनिष्ठता, निष्पक्षता और सटीकता- के अनुसार मीडिया को व्यक्ति की प्राथमिक पहचान यानी कानूनी नाम का इस्तेमाल करना चाहिए। ‘थलपति’, ‘पंडितजी’, ‘मामा जी’ या ‘नेताजी’ जैसे शब्द प्राइमरी रिपोर्टिंग में नहीं, बल्कि ओपिनियन या विश्लेषण में भी सावधानी से इस्तेमाल किए जाएं।
कई समृद्ध लोकतंत्रों में मीडिया सख्ती से टाइटल्स और सम्मानसूचक संज्ञाओं से परहेज करता है। अमेरिका में राष्ट्रपति को उनके अंतिम नाम से या ‘मिस्टर प्रेसिडेंट’ कहकर संबोधित किया जाता है, न कि किसी व्यक्तिगत उपाधि से। भारत में भी यही मानक अपनाने की जरूरत है।
मीडिया हाउस अगर स्वयं को ‘वैचारिक रूप से सजग’ मानते हैं, तो उन्हें शब्द चयन में सावधानी बरतनी चाहिए। व्यक्ति-पूजा (hero worship) लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है। यह आलोचनात्मक सोच को कुंद करती है और जवाबदेही को कमजोर करती है।
क्या समाधान है?
1. नाम का प्रयोग: रिपोर्टिंग में आधिकारिक नाम का प्राथमिक इस्तेमाल।
2. उपाधियों का संयम: इन्हें उद्धरण में या पार्टी कार्यकर्ताओं के हवाले से ही इस्तेमाल करें, न कि अपनी भाषा में।
3. संपादकीय नीति: मीडिया संस्थानों को स्पष्ट गाइडलाइंस बनानी चाहिए कि उपाधियों से परहेज किया जाए।
4. पाठक जागरूकता: दर्शक और पाठक भी ऐसे शब्दों पर सवाल उठाएं और वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग की मांग करें।
जोसेफ विजय का उदाहरण हमें याद दिलाता है कि मीडिया कितना प्रभावशाली है। लोकतंत्र में मीडिया चौथे स्तंभ के रूप में काम करना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति के प्रशंसक क्लब के रूप में।
सच्ची पत्रकारिता नामों से परे तथ्यों पर टिकी होती है। शब्दों का चुनाव जिम्मेदारी से करना ही स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श की नींव है। मीडिया को इस ‘उपाधि-प्रेम’ से मुक्त होना चाहिए। तभी हम वास्तविक लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे, जहां नेता अपनी उपलब्धियों से आंकें जाएंगे, न कि गढ़ी गई उपाधियों से।

















