Wales Nurseries Anti Racism Guidelines UK । क्या कभी आपने कल्पना की है कि कोई नवजात या फिर घुटनों पर चलने वाला बच्चा भी रेसिस्ट अर्थात नस्लवादी हो सकता है? क्या कभी ऐसा आपने सोचा कि जिस बच्चे को अभी न ही चलना आया है, न ही बैठना, और न ही उसे अपना नाम पता है, मगर फिर भी वह नस्लवादी हो गया?
छोटे बच्चों पर भी हेट क्राइम का शक
यह किसी की कल्पना से ही परे है कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। और किसी को भी यह बात चुटकुला ही लगेगी या फिर बेवकूफी की इंतहा! मगर लेबर के नियंत्रण वाले टैक्सपेयर द्वारा वित्तपोषित दिशानिर्देशों ने चाइल्ड केयर कार्यकर्ताओं को यह सलाह दी है कि वे अधिकारियों को कॉल करें, यदि कोई घटना भी उन्हें हेट क्राइम लगती है।
इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य है कि वे नर्सरी और प्ले ग्रुप्स को नस्लवाद से मुक्त बनाना चाहते हैं। और वहाँ पर नस्लवाद से मुक्त माहौल देना चाहते हैं।
ग्रूमिंग गैंग्स पर चुप्पी और बच्चों पर सख्ती
मगर यह बहुत ही हैरान करने वाली बात है कि क्या नर्सरी और प्ले ग्रुप्स में बच्चे ऐसा कुछ भी कह या कर सकते हैं कि वह नस्लवादी लगे? और इसके लिए पुलिस बुलाई जाए? जहां पर यूके में अभी तक ग्रूमिंग गैंग्स की रिपोर्ट्स तक नहीं लिखी जा रही हैं और जहां पर लगातार ही स्ट्रीट क्राइम बढ़ते जा रहे हैं, जिसकी रिपोर्ट्स भी डराने वाली हैं, वहाँ पर बच्चों को नस्लवादी कहा जा सकता है? और उनके लिए पुलिस आ सकती है?
टेलीग्राफ के अनुसार जो सलाह दी गई हैं, उनमें आपातकाल के लिए 999 पर पुलिस अधिकारियों को कॉल करना या फिर पुलिस अधिकारियों स बात करना और पुलिस के साथ मिलकर कोई भी उचित कदम उठाना, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि घटना का विवरण रिकार्ड हो गया है।
यह बेहद डराने वाला कदम है क्योंकि इसमें बच्चों के साथ कड़ाई से पेश याने की पेशकश की गई है। इसमें लिखा है कि अगर यह घटना हेट क्राइम नहीं है तो चाइल्ड केयर कार्यकर्ता ऐसे बच्चों के लिए उम्र के अनुसार लर्निंग सपोर्ट अवसर ले सकते हैं।
टेलीग्राफ के अनुसार उन्हें फ़्लोचार्ट के अनुसार यह समझाया गया है कि कैसे उन्हें अनुशासनात्मक कदम उठाने हैं और कड़ाई से डील करना है। अब बच्चों के साथ कड़ाई से डील करने वाली बात कैसी हो सकती है?
यह भी डराने वाला तथ्य है कि कथित नस्लवादी हमलावर वह छोटा बच्चा भी हो सकता है, जिसे अभी तक यह नहीं पता होगा कि चम्मच कैसे पकड़ते हैं या फिर सूसू कहाँ करनी है?
मजे की बात यही है कि अगर कथित नस्लवादी बच्चा लर्निंग सपोर्ट लेने से इनकार कर दे तो फिर चाइल्डकेयर वर्कर्स को सलाह दी जाती है कि वे एक फॉर्मल “डिसिप्लिनरी रूट” शुरू करें।
चाइल्ड केयर कर्मियों के लिए अनोखा ऑडिट
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि यह सब बच्चों के लिए है। वेल्स में नर्सरी और चाइल्ड केयर में नवजातों से लेकर 12 वर्ष तक के बच्चे जाते हैं। अब जो गाइड लाइंस हैं, वह केवल इन बच्चों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कर्मियों के लिए भी है।
उन्हें अपना ऑडिट करवाना होगा और जिसमें इसमें एक सेल्फ-रिफ्लेक्शन एक्सरसाइज भी शामिल है, जिसमें उन्हें एक से पांच के स्केल पर यह दिखाना होगा कि व्हाइट प्रिविलेज अर्थात श्वेत विशेषाधिकार क्या है और यह उनकी और दूसरों की ज़िंदगी को कैसे आकार देता है। उनसे यह भी पूछा जाता है कि वे अपने “अनकॉन्शस बायस अर्थात अचेतन पूर्वाग्रहों” को कितनी अच्छी तरह समझते हैं और बच्चों और बड़ों के बीच नस्लवाद की रिपोर्ट करने को लेकर उनकी समझ कितनी है?
खिलौनों से लेकर खान-पान तक पर नजर
इतना ही नहीं जगहों का भी ऑडिट किया जाएगा और साथ ही चीजों का भी। जैसे कि किताबें, गुड़ियाँ और वहाँ पर जो भी चीजें दिख रही हैं, वे पर्याप्त रूप से डाइवर्स हैं या नहीं, यह भी देखना होगा और साथ ही कर्मियों को यह सुनिश्चित करना ही होगा कि उनका नस्लवाद विरोधी कदम दिखाई देता रहे।
इतना ही नहीं जो दिशानिर्देश हैं, उनमें यह तक कहा गया है कि स्नैक्स भी विविधता लिए होने चाहिए। अब कल्पना करें कि डाइवर्स स्नैक्स कैसे होएंगे?
यहाँ तक कि टॉइलेट प्रैक्टिस भी विविधता लिए होनी चाहिए। गाइडलाइंस में लिखा है कि शौच करने के तरीके अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग होते हैं। ये तरीके आपके अपने तरीकों से बहुत अलग हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे अस्वच्छ या गलत हैं।
मतलब कि जो बच्चे हैं, उन्हें उनके मजहब के अनुसार ही शौच के तरीके सिखाने हैं। और इन दिशानिर्देशों मे यह तक लिखा है कि नस्लवाद के खतरों के खिलाफ “वैश्विक बहुमत” कर्मियों की रक्षा के लिए एक जोखिम आँकलन करना चाहिए, जो टूलकिट के अनुसार, “बदलते राजनीतिक संदर्भ” और “पूरे UK में हो रहे नस्लवादी प्रदर्शनों” के कारण और बढ़ गया है।
क्या आप यह कल्पना करेंगे कि यह गाइड लाइंस केवल और केवल बच्चों के लिए हैं, बच्चों के कर्मियों के लिए है और उनके स्नैक्स और टॉइलेट के लिए है।
क्या यह माना जाए कि वेल्स जैसे कथित विकसित देश विविधता के नाम पर अपने ही बच्चों का ऐसा शोषण कर रहे हैं, जिसके कारण आत्मविश्वास से रहित और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर शर्म करने वाले बच्चों के रूप में उनका विकास होगा।

















