भारत की हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा में मां सरस्वती विद्या की देवी होने के साथ ही भारतीय सभ्यता की चेतना स्वरूपा हैं। इसी ज्ञान, श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक रहे धार स्थित भोजशाला परिसर में रविवार का सूर्योदय एक ऐतिहासिक भाव लेकर आया। सदियों के संघर्ष, न्यायिक लड़ाई और हिंदू समाज के धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा काल के बाद जब न्यायालय ने भोजशाला को वाग्देवी मंदिर के रूप में मान्यता दी, तब पहली बार यहां की सुबह श्रद्धा, उल्लास और मंत्रोच्चार से इस प्रकार गूंज उठी मानो इतिहास स्वयं अपने गौरव की वापसी का साक्षी बन गया हो।
सूर्योदय के साथ गूंजे मंत्रोच्चार
रविवार सुबह सूर्य की पहली किरण धरती पर पड़ते ही भोजशाला परिसर में नई व्यवस्था के तहत विधि-विधान से मां वाग्देवी की पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई। इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और भोज उत्सव समिति के कार्यकर्ता सुबह-सुबह ही परिसर पहुंच गए थे। श्रद्धालुओं के हाथों में मां वाग्देवी के चित्र थे और वातावरण “जय मां सरस्वती” के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।
पूजा आरंभ होने से पहले पूरे परिसर और गर्भगृह को गोमूत्र छिड़ककर पवित्र किया गया। इसके बाद गर्भगृह को रंगोली और फूलों से अत्यंत आकर्षक ढंग से सजाया गया। वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए परिसर के बाहर स्थित ज्योति मंदिर की अखंड ज्योत को गर्भगृह में स्थापित किया गया। जैसे ही सूर्य की पहली किरण परिसर में पहुंची, वैसे ही वैदिक मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि से पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।

श्रद्धालुओं में दिखा अद्भुत उत्साह
भोजशाला में हुए इस बदलाव को लेकर श्रद्धालुओं में अत्यधिक उत्साह दिखाई दे रहा है। कई भक्त भावविभोर होकर परिसर में नृत्य करते दिखे। वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे श्रद्धालुओं के लिए यह पूजा और धार्मिक अनुष्ठान करने के साथ ही सांस्कृतिक अस्मिता और आस्था की पुनर्स्थापना का भी क्षण था।
नेताओं और संतों ने किए दर्शन
इससे पहले शनिवार शाम केंद्रीय राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर और मांडू के संत महामंडलेश्वर निसर्ग दास जी महाराज भी भोजशाला पहुंचे और पूजा-अर्चना की। उनके साथ धार कलेक्टर राजीव रंजन मीना और एसपी सचिन शर्मा ने भी व्यवस्थाओं का जायजा लिया तथा मां वाग्देवी के दर्शन किए। इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने देश और प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि पहले शुक्रवार के दिन यहां सुरक्षा और तनाव का वातावरण बना रहता था, लेकिन नई गाइडलाइन लागू होने के बाद परिस्थितियां पूरी तरह सामान्य हो गई हैं। अब कोई भी श्रद्धालु बिना किसी भय या रोक-टोक के किसी भी दिन यहां आकर शांतिपूर्वक दर्शन कर सकता है।
भोजशाला को भव्य स्वरूप देने की तैयारी
भोज उत्सव समिति के महामंत्री सुमित चौधरी ने कहा कि अब भोजशाला को भव्य और दिव्य स्वरूप देने की व्यापक तैयारी की जा रही है। राज्य सरकार भी इस ऐतिहासिक धरोहर को उसके प्राचीन वैभव के अनुरूप विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले ही भोजशाला को भव्य स्वरूप देने की घोषणा कर चुके हैं। इसे लेकर हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। वे इसे सिर्फ मंदिर की मान्यता मिलने तक सीमित न रखते हुए भारतीय संस्कृति और गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के रूप में देख रहे हैं।
एएसआई रिपोर्ट बनी फैसले का आधार
उल्लेखनीय है कि बीते शुक्रवार उच्च न्यायालय ने भोजशाला मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर भोजशाला को मां वाग्देवी का मंदिर माना।एएसआई की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर में संस्कृत, प्राकृत और स्थानीय बोलियों में नागरी लिपि के कई अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों को 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच का माना गया है। रिपोर्ट में पारिजातमंजरी-नाटिका, अवनिकूर्मशतम और नागबंध अभिलेख जैसे महत्वपूर्ण शिलालेखों का भी उल्लेख किया गया है।

इतिहास से वर्तमान तक लौटता गौरव
धार की भोजशाला लंबे समय से इतिहास, आस्था और विवाद के केंद्र में रही है, ऐसे में रविवार की सुबह ने यह संकेत दे दिया कि अब यह स्थल संघर्ष की स्मृतियों से आगे बढ़कर श्रद्धा, सांस्कृतिक चेतना और भारतीय ज्ञान परंपरा के नए अध्याय की ओर अग्रसर हो रहा है। मां वाग्देवी की आरती के साथ भोजशाला में गूंजते मंत्रोच्चार ने मानो यह संदेश दिया कि भारत की सनातन चेतना कितनी भी लंबी प्रतीक्षा क्यों न करे, उसका प्रकाश अंततः फिर उदित होता ही है।

















