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कमजोरी मत दिखाओ, शक्ति जुटाओ

सोमनाथ से लेकर सेमीकंडक्टर तक और आध्यात्मिक विरासत से लेकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तक, भारत अब अपनी पहचान को नए तरीके से गढ़ने की राह पर बढ़ रहा है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
May 18, 2026, 07:29 am IST
inसम्पादकीय, गुजरात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल के संकेत सिर्फ भाषण नहीं हैं। वे बदलती दुनिया में भारत की नई गति और दिशा बताते हैं। दुनिया युद्धों, तेल संकट, आपूर्ति की रुकावट, तकनीक की खींचतान और गुटबाजी से घिरी है। ऐसे समय भारत न चुप बैठा है, न किसी एक खेमे में गया है। भारत ने अपना रास्ता चुना है, शांति के लिए बातचीत, अर्थव्यवस्था के लिए आत्मनिर्भरता, तकनीक के लिए अपनी शक्ति और कम संसाधनों वाले देशों के लिए साझा समाधान।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि पश्चिम एशिया के तनाव के बीच दुनिया की वृद्धि 2026 में 3.1 प्रतिशत रह सकती है। वहीं भारत 2027 में 6.6 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ़ सकता है। इसका अर्थ स्पष्ट है, विश्व झटके खा रहा है, किंतु भारत की गति-प्रगति बनी हुई है।2022 में मोदी ने रूस के राष्ट्रपति से कहा था, ‘यह युद्ध का युग नहीं है।’ यह केवल नैतिक वाक्य नहीं था। यह भारत की नीति का संकेत था। भारत शांति की बात करेगा, लेकिन अपने हितों पर समझौता नहीं करेगा। तेल चाहिए तो खरीदेगा, अनाज चाहिए तो बचाएगा, हथियार चाहिए तो तैयारी करेगा।

पश्चिम एशिया पर भारत का रुख भी यही है। समुद्री रास्ते सुरक्षित रहें, तेल के स्रोत बढ़ें, बातचीत चलती रहे और आम लोगों पर युद्ध का बोझ न पड़े। भारत हमलों के विरुद्ध है, किन्तु अपनी अर्थव्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा को पहले देखता है।मई में प्रधानमंत्री ने लोगों से तेल बचाने, संसाधन सोच-समझकर प्रयोग करने और सार्वजनिक परिवहन अपनाने की बात कही। यह बात छोटी लग सकती है, किंतु संकट के समय यही सामाजिक तैयारी राष्ट्र को सशक्त बनाती है।

आज विश्व व्यवस्था के समीकरण टूटते दिख रहे हैं। अमेरिका और चीन आमने-सामने हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच चुका है। लाल सागर में जहाजों के रास्ते असुरक्षित हुए हैं। ऐसे समय भारत सबके साथ संवाद रखता है। वह चतुष्क समूह (Quad) में भी है, ब्रिक्स में भी। रूस से तेल लेता है, अमेरिका से तकनीक बढ़ाता है और गरीब देशों की आवाज भी उठाता है। यही भारत की नई पहचान है, किसी का पिछलग्गू नहीं, सबके बीच संवाद-समन्वय का सेतु।

आत्मनिर्भरता अब केवल नारा नहीं रही। यह डिजिटल भुगतान, नवउद्यम, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धि, अर्धचालक (Semiconductor) और अनुसंधान तक पहुंच चुकी है। भारत अब सिर्फ बाजार नहीं रहना चाहता। वह बनाना चाहता है, बेचना चाहता है, दुनिया को समाधान देना चाहता है, अपना स्थान चाहता है।

डिजिटल भुगतान इसका बड़ा उदाहरण है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारी तक, सब एक ही व्यवस्था से जुड़े हैं। करीब 22 हजार करोड़ लेन-देन और रोज लगभग 60 करोड़ भुगतान केवल आंकड़े नहीं हैं। यह भारत का नया आर्थिक स्वभाव है। बीस देशों के समूह में भारत ने यही मॉडल दुनिया को दिखाया। भारत ने बताया कि तकनीक केवल संपन्न वर्ग की वस्तु नहीं, गरीबों की शक्ति भी बन सकती है।नवउद्यमों ने युवाओं को नई दिशा दी है। देश में 2.23 लाख से अधिक नवउद्यम बन चुके हैं और उनसे करीब 23 लाख नौकरियां जुड़ी हैं। यह उस युवा भारत का चित्र है जो नौकरी मांगने के साथ रोजगार देने की भी सोच रहा है। विदेशी कंपनियां भी भारत में शोध और विकास केंद्र खोल रही हैं, क्योंकि यहां बाजार भी है, प्रतिभा भी और गति भी।

अंतरिक्ष क्षेत्र में भी भारत नई छलांग लगा रहा है। यह क्षेत्र करीब 8.4 अरब डॉलर का हो चुका है। स्कायरूट जैसी कंपनियां निजी रॉकेट बना रही हैं। अग्निकुल ने त्रि-आयामी छपाई से रॉकेट इंजन बनाकर नई राह दिखाई है। यह कम खर्च में बड़ा काम करने वाला भारत है।
कृत्रिम बुद्धि पर भारत का संदेश स्पष्ट है, सिर्फ बाहर की तकनीक इस्तेमाल नहीं करनी, अपनी तकनीक बनानी है। भारत में बनाओ, दुनिया को दो। सेमीकंडक्टर निर्माण पर बड़ी मदद, क्वांटम तकनीक के लिए हजारों करोड़ रुपए और अनुसंधान के लिए एक लाख करोड़ रुपए का कोष इसी दिशा के कदम हैं।

फिर भी चुनौती बाकी है। भारत अनुसंधान पर अभी सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7 प्रतिशत ही खर्च करता है। युवा वैज्ञानिकों को अधिक आजादी चाहिए। पुराने अनुभव और युवा ऊर्जा को साथ लाना होगा। बुजुर्ग वैज्ञानिक नियंत्रक नहीं, सलाहकार बनें। निर्णय में उम्र नहीं, विचार की ताकत देखी जाए।तेल, खाद और ऊर्जा सुरक्षा पर भी भारत को पहले से तैयारी करनी होगी। एक स्रोत पर निर्भरता घटानी होगी। सौर ऊर्जा, हरित ऊर्जा और घरेलू उत्पादन को तेज करना होगा। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन संकेतों का सार यही है समाज को साथ लो, विश्व से शांति की बात करो, किंतु किसी को कमजोरी मत दिखाओ। दुनिया से जुड़े रहो, लेकिन अपनी शक्ति जुटाओ। दरवाजे खुले रखो, लेकिन चाबी अपने हाथ में रखो। युद्धों वाली दुनिया में भारत अपनी चाल चल रहा है, और यही चाल आने वाले समय में दुनिया के नियम बदल सकती है।

हाल ही में सोमनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार भारत की सभ्यतागत शक्ति, आत्मविश्वास और पुनर्जागरण की बात की, वह इसी व्यापक रणनीतिक सोच का विस्तार दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि बार-बार टूटकर फिर खड़े होने वाली भारत की चेतना का प्रतीक है। यह संदेश केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत की राष्ट्रीय नीति को दिखाता है। उनका संकेत साफ था कि भारत को डर, दबाव और निर्भरता की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। जिस प्रकार सोमनाथ ने आक्रमणों और विध्वंस के बाद भी अपनी पहचान नहीं छोड़ी, उसी प्रकार भारत को भी वैश्विक संकटों, आर्थिक दबावों और भू-राजनीतिक तनावों के बीच अपनी दिशा स्वयं तय करनी होगी।

आज जब दुनिया अस्थिरता, युद्ध और संसाधनों की होड़ में उलझी है, तब भारत अपनी सभ्यता से निकले आत्मविश्वास को आधुनिक शक्ति में बदलने का प्रयास कर रहा है। यही कारण है कि एक ओर भारत डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धि और सेमीकंडक्टर निर्माण में निवेश बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर अपनी सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक एकता को भी शक्ति का स्रोत बना रहा है।
प्रधानमंत्री के भाषण में ‘विरासत और विकास’ का जो समन्वय दिखा, वही भारत की नई नीति का मूल है। केवल आर्थिक ताकत काफी नहीं होगी, उसके पीछे राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामाजिक अनुशासन भी चाहिए।

सोमनाथ से दिया गया उनका संदेश इसी आत्मबल का आह्वान था कि भारत को अपनी शक्ति पहचाननी होगी, अपनी विरासत पर गर्व करना होगा और आधुनिक दुनिया में अपने हितों की रक्षा के लिए तैयार रहना होगा। दुनिया से संवाद रखो, लेकिन निर्णय अपने हित में करो। शांति की बात करो, लेकिन सुरक्षा की तैयारी भी रखो। वैश्विक व्यवस्था से जुड़े रहो, लेकिन आत्मनिर्भरता की नींव मजबूत करो। सोमनाथ से लेकर सेमीकंडक्टर तक और आध्यात्मिक विरासत से लेकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तक, भारत अब अपनी पहचान को नए तरीके से गढ़ने की राह पर बढ़ रहा है।

X@hiteshshankar

Topics: अखंड चेतनाकृत्रिम बुद्धिकूटनीति एवं वैश्विकआध्यात्मिक विरासतविश्व व्यवस्थाअंतरिक्ष प्रौद्योगिकीहरित ऊर्जाराष्ट्रीय आत्मविश्वासविरासत और विकासआत्मनिर्भरताआर्थिक एवं तकनीकीसेमीकंडक्टरराष्ट्रीय पुनर्जागरणसकल घरेलू उत्पादभारत की चेतनापाञ्चजन्य विशेषसाझा समाधानतकनीकी प्रगति
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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