भोजशाला मां वाग्देवी का धाम, पाञ्चजन्य ने समय-समय पर दिए प्रमाण
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भोजशाला मां वाग्देवी का धाम, पाञ्चजन्य ने समय-समय पर दिए प्रमाण

राजा भोज कला एवं शिक्षा के रक्षक थे, इसलिए उन्होंने अपने शासनकाल में कई जगहों पर ‘भोजशालाओं’ की स्थापना की। उनमें धार स्थित भोजशाला विश्वविख्यात है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 15, 2026, 04:45 pm IST
inभारत
भोजशाला और पाञ्चजन्य की आवरण कथा

भोजशाला और पाञ्चजन्य की आवरण कथा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भोजशाला को वाग्देवी का मंदिर माना है। हिंदू पक्ष की बड़ी जीत हुई है। पाञ्चजन्य ने भोजशाला के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और समय-समय पर तथ्यों के जरिये मंदिर होने के प्रमाण भी दिए। यह भी बताया कि भोजशाला, मां वाग्देवी का धाम शुक्रवार को न्यायालय ने मंदिर की प्रमाणिकता पर मुहर लगा दी।

भारतीय इतिहास में परमारवंशीय राजा भोजदेव (संक्षिप्त नाम राजा भोज) का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। राजा भोज का शासनकाल 1000 से 1055 ई. तक रहा। वे मालवा स्थित उज्जयिनी (अब उज्जैन) के महान राजा विक्रमादित्य की वंश परंपरा के 11वें राजा थे। राजा भोज के शासनकाल के पूर्व यहां की राजधानी उज्जयिनी हुआ करती थी, जिसे राजा भोज ने अपने शासन काल के दौरान धार में स्थानांतरित कर दिया था।

राजा भोज चूंकि कला एवं शिक्षा के रक्षक थे, इसलिए उन्होंने अपने शासनकाल में कई जगहों पर ‘भोजशालाओं’ की स्थापना की। उनमें धार स्थित भोजशाला विश्वविख्यात है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि भोजशाला दो शब्दों से मिलकर बना है- भोज एवं शाला। अर्थात् राजा भोज द्वारा स्थापित शाला। मगर यह केवल बच्चों की शाला नहीं थी, बल्कि एक असाधारण विश्वविद्यालय था, जहां अध्ययन के लिए देश-विदेश से भी छात्र आया करते थे।

विभिन्न शोधों और शिलालेखों से मिले प्रमाण

  1. मंदिर एवं आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त शिलालेखों पर संस्कृत एवं प्राकृत भाषा में रचनाएं मंदिर या हिंदू स्थल होने के लिखित प्रमाण हैं।
  2. शिलालेखों पर मां वाग्देवी एवं राजा भोज से संबंधित विवरण।
  3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार ये शिलालेख 11वीं एवं 12वीं शताब्दी के हैं, जब यहां हिंदू राजाओं का शासन हुआ करता था।
  4. मंदिर की खुदाई के दौरान वाग्देवी की प्रतिमा का मिलना भी एक अकाट्य प्रमाण है कि यह हिंदुओं का प्राचीन मंदिर या भोजशाला है।
  5. मंदिर की दीवारों एवं खंभों पर पुष्प एवं देवताओं की आकृतियों का मिलना।
  6. इसी के साथ ही दीवारों एवं खंभों पर सिंह, कछुआ एवं वराह या सूअर (जिसे इस्लाम में हराम माना जाता है) आदि आकृतियों का प्राप्त होना। अगर यह मस्जिद होती, तो इस तरह की आकृतियां नहीं बनी होतीं।
  7. मंदिर की छत पर श्रीयंत्र के समान आकृति का डिजाइन इसके हिंदू शिल्प होने का प्रमाण है।

भोजशाला : 1935 से पहले वहां नमाज नहीं पढ़ी जाती थी

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा

कोर्ट ने एएसआई सर्वे को स्वीकार करते हुए कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और इस विवाद का फैसला करते समय वैज्ञानिक अध्ययनों से सामने आए निष्कर्षों पर भरोसा किया जा सकता है।

 

Topics: इंदौर खंडपीठमां वाग्देवीमध्य प्रदेश हाई कोर्टपाञ्चजन्य विशेषभोजशालाधार भोजशालाBhojshala
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