मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले की सुनवाई कर रही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच आज इस पर अपना फैसला सुनाएगी। कोर्ट तय करेगा कि ये जगह मंदिर है, मस्जिद है या कुछ और। असल में हिन्दू पक्ष भोजशाला को सरस्वती मंदिर कहता है, जो कि एएसआई के सर्वे में भी सामने आ चुका है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बता रहा है।
क्या है पूरा मामला
मामला कुछ यूं है कि भोजशाला धार शहर में स्थित है। इसके ऐतिहासिक महत्व के चलते यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। हिन्दू पक्ष इसे सरस्वती माता का मंदिर मानता है। मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। इस जगह पर अभी एक खास व्यवस्था चल रही है – मंगलवार को हिंदू पूजा कर सकते हैं और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज पढ़ सकते हैं।
वहीं इस मामले में चल रहे विवाद पर नजर डालें तो हाई कोर्ट में इसको लेकर कुल छह याचिकाएं दायर की गई हैं। इनमें पांच जनहित याचिकाएं और एक अपील की गई है। इसमें से हिन्दुओं की ओर से दो याचिकाएं दायर की की गई हैं, जिनमें भोजशाला को मंदिर घोषित करने और वहां 24 घंटे पूजा-अर्चना की इजाजत मांग की गई है। जबकि, एक याचिका मस्जिद पक्ष की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें इसे मस्जिद घोषित करने की मांग की गई है।
इसके अलावा जैन समाज की तरफ से भी एक याचिका दायर हुई है, जिसमें इसे जैन गुरुकुल बताते हुए जैन मत के अनुयायिओं को पूजा के अधिकार की मांग की गई है। साथ ही एक अन्य याचिका स्थानीय लोगों की भी है, जो पूरे मामले के शांतिपूर् समाधान की मांग कर रहे हैं।
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कब से चल रही है सुनवाई
यह मामला हाई कोर्ट में साल 2013 से चल रहा है। इस बार 6 अप्रैल 2026 से 12 मई 2026 तक लगातार सुनवाई हुई। कुल 24 दिन और 43 घंटे बहस चली। 12 मई को कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब आज न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी इस पर अपना फैसला सुनाएंगे।
ASI सर्वे की बड़ी भूमिका
कोर्ट के आदेश पर ASI ने भोजशाला परिसर में 98 दिन तक विस्तृत सर्वे किया। इसमें आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल हुआ। सर्वे रिपोर्ट 2000 पेज से ज्यादा लंबी है। इसमें वहां मिली मूर्तियां, शिलालेख, सिक्के और अन्य चीजों का जिक्र है। सुनवाई के दौरान इस रिपोर्ट पर लंबी बहस हुई। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं।
11वीं सदी की है भोजशाला
गौरतलब है कि धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला 11वीं सदी की इमारत मानी जाती है। कहा जाता है कि राजा भोज ने इसका निर्माण करवाया था। सालों से इसकी प्रकृति को लेकर विवाद रहा है। 2003 में ASI की एक व्यवस्था के तहत दोनों समुदायों को अलग-अलग दिन पूजा-नमाज की इजाजत मिली, लेकिन दोनों पक्ष इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करते।
















