घुमंतू जातियों में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की सफल सोशल इंजीनियरिंग
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घुमंतू जातियों में लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की सफल सोशल इंजीनियरिंग

भारत की वीर, आध्यात्मिक, शासक, योद्धा, समाज सुधारक, क्रांतिकारी, चिंतक-विचारक, स्थापत्य विशेषज्ञ, राष्ट्रवादी, ये सभी गुण किसी में देखने को मिलते हैं तो वह हैं पुण्यश्लोक, लोकमाता देवी अहिल्याबाई।

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी — edited by Mahak Singh
May 10, 2026, 05:25 pm IST
inभारत
Ahilyabai Holkar

Ahilyabai Holkar

भारत की वीर, आध्यात्मिक, शासक, योद्धा, समाज सुधारक, क्रांतिकारी, चिंतक-विचारक, स्थापत्य विशेषज्ञ, राष्ट्रवादी, ये सभी गुण किसी में देखने को मिलते हैं तो वह हैं पुण्यश्लोक, लोकमाता देवी अहिल्याबाई।  वह कालखंड बड़ा ही भयंकर व भयावह था जब माता अहिल्या ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ली थी। उस समय उनका राज्य विदेशी शक्तियों के अतिरिक्त आंतरिक शत्रुओं से भी भरा पड़ा था।

उस समय मालवा में चहुँओर अशांति का, हाहाकार का वातावरण बना हुआ था। मालवा, मराठों, राजपूतों के कई-कई छत्रप, योद्धा, सूबेदार, सेनापति आदि मालवा की गद्दी पर अहिल्याबाई होल्कर को विराजित होने से रोकने हेतु कई दुरभिसंधियां कर रहे थे। होल्कर परिवार की बहू देवी अहिल्या के सिंहासन पर बैठने के पूर्व का घटनाक्रम कोई सरल, सहज व सीधा-सीधा नहीं था। कई चाले चली गईं, कई भीतरी वार हुए, कई षड्यंत्र हुए, कई संघर्ष हुए, कई विरोधाभास हुए। अहिल्याबाई के कई सगे, सम्बंधी, शुभचिंतक भी अपनेपन का चोला पहनाकर शत्रुओं के ख़ेमे आते-जाते दिखे।

अंग्रेजी अत्याचारों से त्रस्त वनवासी समाज

उस  कालखंड में मध्यप्रदेश के निमाड़ से लेकर मालवा एवं मालवा से लेकर सुदूर राजस्थान तक मुगलों व अंग्रेज़ों के षड्यंत्रों के कारण लोग परेशान हो उठे। अंग्रेज अपनी सैन्य शक्ति से जिस क्षेत्र को चाहते उसे कब्ज़ा लेते, वहाँ के संसाधनों पर कब्ज़ा करके उनका मनमाना दोहन करते व वहां के अंग्रेज विरोधी मूल निवासियों को वहाँ से पलायन हेतु विवश कर देते थे। इस क्षेत्र की गोंड, भील, रामोशी जैसी वनवासी जनजाति के लोग जो अपनी शुचिता, श्रम, रचनात्मकता, उत्पादकता, प्रकृति पूजक के रूप में जाने जाते थे। अंग्रेजों की परतंत्रता को अस्वीकार्य करने वाले इन वीर जनजातीय की समूची जातियों के बाल, आबाल, वृध्दों, निराश्रितों, निःशक्तों को भी शासकीय रूप से अपराधी जाति घोषित कर दिया जाता था। परिस्थिति यह बन गई थी कि ये बेचारे वनवासी बंधु दिन में वनों में ही छिपे रहते थे व बेबस होकर अपने बच्चों व आश्रितों का पेट पालने हेतु अपराध करने लगे थे।

वनवासियों की पीड़ा और अहिल्या की संवेदना

इतिहास साक्षी है कि भगवान बड़ादेव या फड़ापेन या महादेव की अनन्य भक्त ये वनवासी बंधु गहरे प्रकृति पूजक थे। भारत की वन्य संपदा इन वनवासी बंधुओं के दम पर ही फलती-फूलती थी व भारत को धन-धान्य से लबालब भर देती थी। विदेशी मुस्लिम व ईसाई आक्रांताओं के कारण सामाजिक परिदृश्य यह बना कि ये बलिष्ठ व श्रमशील जातियां अपराधी घोषित कर दी गईं। इनमें से कुछ वनवासियों ने आजीविका हेतु एक नई शैली भी अपना ली थी, इसके अन्तर्गत वे वनों के भीतर से निकलने वाले मार्गों के यात्रियों से एक प्रकार का कर वसूलते थे जिसे ‘भील कौड़ी’ कहा जाता था। वनवासी इस कर की वसूली सख़्ती से करते थे व न देने पर दंड देते थे। इस वातावरण में लोकमाता अहिल्या ने इस समस्या के मूल को समझा और जाना।

अहिल्याबाई की दूरदर्शी नीति

अहिल्या बाई केवल महारानी ही नहीं थी। उनके मानस में एक कुशल नीति-निर्माता बसा हुआ था। इसी का परिणाम था कि एक उनके दरबार में किसी अंग्रेज हथियार विक्रेता के आने पर उनसे केवल तीन बंदूक़ें ख़रीदी। उस समय उनके दरबार में बैठे सभी राज दरबारी और वह अंग्रेज व्यापारी भी आश्चर्यचकित किंतु दुखी हो उठा कि इतने बड़े राज्य की महारानी ने उनसे केवल तीन बंदूक़ें ही खरीदी। तब जब राज्य की सुरक्षा हेतु आवश्यकता सैकड़ों बन्दूकों की थी तब तीन बंदूक खरीदना भला किसे अच्छा निर्णय लगता?! किंतु अहिल्याबाई के मानस में राष्ट्र प्रथम था। उन्होंने मात्र तीन बंदूकें क्रय करके अपने राज्य के भील समाज के लोहारों की बैठक बुलाई व गुप्त रूप से बड़े पैमाने पर ऐसी बंदूक़ें बनाने की चुनौती उनके समक्ष रख दी। भील लोहार समाज ने भी महारानी की इस चुनौती को स्वीकारा व उन्हें निराश नहीं होने दिया। उन्होंने बाद में अपने राज्य की स्वयं की टकसाल (मिंट) भी बनवाई थी जहां उनकी राजमुद्रा की ढलाई की जाती थी। अपने इन कार्यों से महारानी ने दोहरे लक्ष्य साधे थे, एक तो उनके राज्य का धन बाहरी राज्यों में जाने से बच जाता था और दूसरा लाभ यह था कि इस माध्यम से उन्होंने अंग्रेजों द्वारा अपराधी घोषित किए समाज को रचनात्मकता में लगा दिया। लोकमाता अहिल्या बाई के कार्यकाल में ये वनवासी बंधु सम्मानजनक रूप से अपना जीवन यापन करने लगे थे।

लोकमाता की सामाजिक पुनर्वास नीति

लोकमाता ने इन वनवासी बंधुओं को सम्मानपूर्वक अपने राज दरबार में आमंत्रित कर उनसे संवाद किया। वे एक बड़ी सोशल इंजीनियरिंग की योजना पर काम कर रहीं थीं, यह उसका एक भाग था। बहुत से जनजातीय समूह राज दरबार में आये और महारानी की बात से संतुष्ट हुए। कुछ समूह जो महारानी के राज दरबार में नहीं आये व उनकी अवज्ञा की उनसे भी लोकमाता अहिल्या ने कोई दुर्व्यहार नहीं किया और ना ही उन्हें दंडित किया, बल्कि वे स्वयं वनों में जाकर उनसे मिलीं और उनके पुनर्वास हेतु उन्हें समझाया। जो महारानी के समझाने से नहीं समझें उन्हें बंदी बनाकर बंदीगृह में लाया गया। बंदीगृह में भी उन्हें पहले दंडित नहीं करके, पुनः समझाया बुझाया गया और सद्मार्ग पर चलने हेतु प्रवचन सत्रों में बैठाया गया। इस प्रकार लोकमाता ने एक बड़ी सोशल इंजीनियरिंग की योजना चलाई थी। माता अहिल्या इन बलिष्ठ, श्रमशील, प्रकृति के विशेषज्ञ, औषधियों व वनोपजों के विशेषज्ञों के गुणों का उपयोग करने की एक बड़ी योजना पर काम कर रहीं थीं। अंततः इन्हें अपने राज्य में बसाया, इन्हें अभयदान दिया और इन्हें सरंक्षित किया। इन अहिल्या सरंक्षित जनजातियों ने मालवा की वन संपदा को सरंक्षित किया और उसे विकसित किया। कालांतर में बहुत से बलिष्ठ लुटेरे व डकैत महारानी की सेना में नियुक्त हुए व अपनी राज्य निष्ठा सिद्ध करके बड़े-बड़े सैन्य पदों पर आसीन हुए। इन वनवासी बंधुओं के दम पर महारानी ने अपनी सैन्य शक्ति को द्विगुणित कर लिया था। जिस सोशल इंजीनियरिंग को अब जाना-पहचाना जाने लगा है और विदेशी शिक्षा को इसका जनक माना जाता है वह सोशल इंजीनियरिंग माता अहिल्या ने आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत में कर दी थी। वस्तुतः यह सोशल इंजीनियरिंग हमारें रामायण, महाभारत से लेकर वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर देखने-पढ़ने को मिलती है। लोकमाता अहिल्या अपने धार्मिक, वैदिक साहित्य की साधना, पठन-पाठन व मनन से ही यह सब दुर्लभ्य व दुर्लक्ष्य कार्यों को कर पाई थीं।

Topics: Indian CultureIndian History‘Forest resident societyAhilyabai HolkarMalwa StateBhil TribeLokmata AhilyaTribal UpliftmentIndian Heroine
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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