भारत का 'जेन ज़ी' और लोकतंत्र: अराजकता नहीं, मतदान और संवैधानिक मूल्यों पर है युवा पीढ़ी का अटूट विश्वास
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भारत का ‘जेन ज़ी’ और लोकतंत्र: अराजकता नहीं, मतदान और संवैधानिक मूल्यों पर है युवा पीढ़ी का अटूट विश्वास

बांग्लादेश और नेपाल के घटनाक्रमों के बीच विदेशी शक्तियों ने भारत में भी 'युवा विद्रोह' की कल्पना की, लेकिन भारतीय युवा सड़क के बजाय संसद और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से बदलाव में विश्वास रखते हैं। जानिए क्यों टूलकिट गैंग के अजेंडे में नहीं फंसता आज का जागरूक युवा।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
May 8, 2026, 10:30 pm IST
inभारत, विश्लेषण, मत अभिमत, सोशल मीडिया
Indian Gen Z youth voting and democratic participation analysis

Indian Gen Z Democratic Values । बांग्लादेश और नेपाल में जिस प्रकार से कथित छात्र आंदोलन हुआ था और जिस प्रकार से भारत के विपक्ष सहित तमाम दल एवं कथित सामाजिक कार्यकर्ता इस बात पर हर्ष से भर उठे थे कि एक दिन ऐसी ही क्रांति भारत में होगी। भारत का युवा वर्ग अर्थात जेन जी या जेड, अपनी बात मनवाने के लिए सड़कों पर उतर आएगा और सरकार को गिराकर उन्हें सत्ता सौंप देगा।

संवैधानिक संस्थाओं में अटूट विश्वास: सोशल मीडिया के दौर में भी नहीं डगमगाया भरोसा

कॉंग्रेस के राहुल गांधी ने तो पूरी कल्पना ही कर ली थी और यहाँ तक अपने विचार दे दिए थे कि वे जेन जेड के साथ है और जेन जेड सरकार उखाड़कर फेंकती है तो वे उसका समर्थन करेंगे। मगर क्या वाकई भारत के युवा ऐसे हैं कि वे क्रांति और अराजकता में अंतर न कर सकें? क्या भारत की युवा पीढ़ी ऐसी है जो अपने ही देश को अव्यवस्था फैला दे? क्या भारत का जेन जी, ऐसा विद्रोह कर सकता है कि देश ही जल उठे?

जब इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने बैठते हैं तो भारत के युवाओं की ऐसी तस्वीर उभरकर आती है जो भारत के हर व्यक्ति को प्रसन्नता से भर देती है। भारत इस समय विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है। भारत को इन दिनों उसकी युवा शक्ति, मेधा और कौशल के ले सराहा जा रहा है। और ऐसा अचानक हुआ हो ऐसा भी नहीं प्रतीत होता है। भारत का युवा व्यवस्था में परिवर्तन अवश्य करता है, परंतु उसके लिए वह कभी अराजकता का सहारा नहीं लेता है।

ऐसा नहीं है कि वह प्रशासनिक अव्यवस्थाओं से दुखी नहीं होता, वह भ्रष्टाचार के चलते देश की छवि से परेशान नहीं होता और ऐसा भी नहीं है कि वह महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों का विरोध नहीं करता! वह सभी कुछ करता है। वह अव्यवस्था का विरोध करता है, वह भ्रष्टाचार के चलते छवि से परेशान भी होता है और वह यौन अत्याचारों का विरोध भी करता है।

परंतु उसे अपने विरोध का तरीका पता है, उसे पता है कि वह कैसे विरोध करेगा तो उसकी बात सुनी जाएगी और कैसे वह व्यवस्था को समझता है, यह महत्वपूर्ण है।

अराजकता बनाम लोकतंत्र: क्या भारत का युवा टूलकिट अभियानों का हिस्सा है?

भारत की जेन जेड, जिस पर तमाम आरोप लगाए जाते हैं, कि वह अराजक है, वह सुनती नहीं है आदि आदि, तो वहीं यह पीढ़ी यह भली तरह से जानती है कि उसे कैसे और क्या करना है?

वह किसी भी टूलकिट अभियान का हिस्सा नहीं होती है। यह सही है कि व्यवस्था नई बननी चाहिए, और वह भी ऐसा कदम उठाते ही हैं। मगर वे ऐसा सड़क से संसद बदलकर नहीं करते। वे नेताओं के श्रम को कम नहीं करते। आज के दौर में जब भारत में कुछ षड्यंत्रकारी शक्तियाँ राजनैत‍िक रूप से इन युवाओं का दुरुपयोग अपने अजेंडे के लिए करना चाहती हैं और उन्हें भ्रामक जानकारी देकर देश को तोड़ना चाहती हैं तो सोशल मीडिया के इस युग में युवा किसी भी भ्रामक जानकारी के जाल में फँसता नहीं है।

ऐसा भी नहीं है कि वह गलत नहीं करता  या फिर अजेंडे में नहीं फँसता? हो सकता है कि वह कुछ फंस जाए, मगर वह उस सीमा तक अराजक नहीं हो पाता, जिस सीमा तक वह अजेंडा उसे चाहता है।

बिहार से बंगाल तक का उदाहरण: युवा शक्ति ने कैसे चुनी अराजकता के ऊपर व्यवस्था?

भारत में पिछले वर्ष और अभी बंगाल और असम सहित केरल, तमिलनाडु में चुनाव हुए। वह व्यवस्था से दुखी था, वह सरकार से परेशान था या फिर असम के मामले में वह सरकार से खुश था, तो उसने अपने मन के अनुसार सरकार बदली।

भारत का युवा यह जानता है कि सरकार कैसे बदलनी है। हालांकि अभी भारत के युवाओं को देश की संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ भड़काने का भी षड्यन्त्र एजेंडा जीवी लोग कर रहे है और यह बात कुछ सीमा तक सोशल मीडिया पर दिखाई देती है, परंतु आज भी भारत के युवा का विश्वास भारत की संस्थाओं में है और यही कारण है कि वह चुनाव आयोग पर विश्वास करके अपना वोट देने के लिए निकल पड़ता है।

बिहार में जब यह तुलना की जा रही थी कि युवा तेजस्वी और वृद्ध नितीश में से युवा किसे वोट करेंगे और यह आँकलन मन से ही लगा दिया था कि चूंकि तेजस्वी और राहुल युवा हैं तो युवा उन्हें ही चुनेंगे। मगर युवा तो युवा है। उसे यह ठीक तरीके से पता लग चुका था कि बिहार में जो कथित युवा है, वह करोड़ों युवा सपनों को मारने का अपराधी है। इसलिए बिहार में यूआ बैठे रह गए और नितीश कुमार को गद्दी मिली।

2014 की क्रांति और मोदी सरकार: व्यवस्था में रहकर परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण

इसी तरह केरल, तमिलनाडु और बंगाल में उसने सरकार को नहीं सही समझा तो सरकार बदल दी। यह युवा शक्ति ही है जो यह चाहती है कि जिस भी दल की सरकार आए, वह युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए काम करे और यही सब सोचते हुए वह सरकार चुनता है।

उसे पता है कि व्यवस्था में बने रहकर ही वह परिवर्तन कर सकता है। और कौन भूल सकता है वर्ष 2014 के चुनावों को, जिनमें युवाओं ने जो क्रांति की थी, उसकी धमक पूरे विश्व ने सुनी थी और अभी तक सुन रहा है। यूपीए के दस सालों के कुशासन के बाद युवाओं ने जो क्रांति की थी अर्थात सरकार पलट दी थी और नरेंद्र मोदी की सरकार बनवाई थी, वह व्यवस्था में रहते हुए क्रांति का सबसे बड़ा उदाहरण है।

इसलिए भारत के युवाओं को लेकर यह चिंता नहीं होनी चाहिए कि भारत का युवा बिगड़ रहा है। उसे बंगाल जीतना भी आता है और साथ ही उसे असम में सरकार बनाए रखना भी आता है। उसके तमाम कदम यह प्रमाणित करते हैं कि भारत के युवा किसी भी अराजक विचार से सहमत नहीं होंगे।

इन चुनाव परिणामों ने युवा दृष्टि की और भी गहरी समझ प्रदान की है।

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