बंगाल में भाजपा की जीत और विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा: अब बदलने होंगे BJP को परखने के औजार!
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बंगाल में भाजपा की जीत और विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा: अब बदलने होंगे BJP को परखने के औजार!

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में भाजपा की जीत ने वैश्विक वैचारिक गलियारों में बेचैनी पैदा कर दी है। क्या विदेशी मीडिया और विपक्ष 'एसआईआर' (SIR) और वोटर लिस्ट के बहाने हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं? पढ़िए एक विस्तृत विश्लेषण।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Shivam Dixit
May 8, 2026, 04:25 pm IST
inभारत, विश्लेषण, मत अभिमत, पश्चिम बंगाल

BJP Victory West Bengal Analysis Foreign Media । भारतीय जनता पार्टी की बंगाल जीत ने केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का भी ध्यान आकर्षित किया है। सभी अपने-अपने मापदण्डों पर इस चुनाव परिणाम को परख रहे हैं, परन्तु पुराने ढर्रों पर चलते हुए फिर से गलती पर गलती दोहराते लगते हैं। यहां के विपक्ष की मानें तो यह एसआईआर के प्रयोग से निकला विजयमार्ग है, तो विदेशी विश्लेषक फिर से जिंगल बेल, जिंगल बेल की तर्ज पर साम्प्रदायिकता का गीत गाने लगे हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम बताते हैं कि भाजपा ने कहीं पहली बार पांव जमाए हैं, कहीं वह फिर से सत्ता में आई है, तो कहीं उसने अपना जनाधार बढ़ाया है।

भाजपा का विस्तार और विपक्ष की गलत आकलन

अगर केरल जैसे राज्य में वामपंथी दलों को भाजपा के प्रभाव के डर से अयप्पा के दर्शन करने पड़ें, भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बंजर कहे जाने वाले बंगाल में कमल की फसल लहलाने लगे, द्रविड़ राजनीति के केंद्र तमिलनाडु में उसकी आहट सुनाई देने लगे, तो यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि विरोधी इस दल को गलत औजारों से परख रहे हैं। विरोधी भूलते हैं कि देश का मतदाता मदिहीन नहीं है, वह सुशासन व विकास को अपनी पसंद बनाता जा रहा है। अगर कोई दल संविधान के अनुरूप काम करते हुए जनता की पसंद बन रहा है, तो विरोधियों को भी अपनी सोच बदलनी होगी।

विपक्ष की कमजोरी और भाजपा का शासन

भाजपा केंद्र और बहुत से राज्यों में वर्षों से शासन में है। अंधविरोध के चरम पर जाकर भी शासन व संवैधानिक व्यवस्था के किसी मान्य मापदण्ड पर विपक्ष अभी तक ऐसा कोई मुद्दा तराश नहीं पाया है, जो जनता को भी मान्य हो। यहां तक कि प्रधानमंत्री कई बार चुटकी ले चुके हैं कि सार्वजनिक जीवन में विपक्ष उनकी कोई तथ्यात्मक आलोचना करने में असफल रहा है।

विदेशी मीडिया की प्रतिक्रिया और सवाल

दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में भाजपा के सत्ता तक पहुंचते ही वैश्विक वैचारिक गलियारों में भी बेचैनी पैदा हो गई है। विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने भारत में लोकतंत्र, अल्पसंख्यक अधिकार और चुनावी निष्पक्षता पर अचानक सवाल उठाने शुरू कर दिए। बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्जियन और अल जजीरा जैसे मंचों पर फिर से यह विमर्श तेजी से गढ़ा जाने लगा कि भारत हिन्दू राष्ट्रवाद की ऐसी दिशा में बढ़ रहा है, जहां लोकतंत्र व बहुलता खतरे में है।

लोकतंत्र पर बहस या राजनीतिक बदलाव का असर

विदेशी मीडिया में ज्यादा चर्चा बंगाल की है। सवाल यही है कि क्या चिंता वास्तव में लोकतंत्र की है या उस सियासी बदलाव की, जिसने दशकों पुराने वामपंथ और छद्म धर्मनिरपेक्षता के वैचारिक गढ़ को ध्वस्त कर दिया? जब भाजपा हारती है, तो विदेशी मीडिया भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की तारीफ करता है, पर जैसे ही वह निर्णायक जनादेश लेकर आती है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया संदेह और संस्थागत संकट की भाषा में बदल जाती है।

भारतीय राष्ट्रवाद बनाम पश्चिमी दृष्टिकोण

श्रेष्ठ भावना से ग्रसित पश्चिमी जगत कहीं यह तो नहीं मानता कि भारतीय मतदाताओं में राजनीतिक समझ का अभाव है? राष्ट्रवाद को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर अनेक विचारक स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत का राष्ट्रवाद संकीर्ण पश्चिमी राष्ट्रवाद से सर्वदा विपरीत है। पश्चिमी मीडिया भारत को अक्सर यूरोपीय राजनीतिक अनुभवों के चश्मे से देखने की कोशिश करता है। वहां राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता विस्तार व नस्लीय वर्चस्व रहा है, जबकि भारत में राष्ट्रवाद सांस्कृतिक, सभ्यतागत पहचान और ऐतिहासिक आत्मबोध से जुड़ा है।

एसआईआर और वोटर लिस्ट विवाद

इसीलिए विदेशी मीडिया हमारे सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सीधे अल्पसंख्यक-बहुसंख्यकवाद से जोड़ देता है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा की जीत को पश्चिम के विश्लेषकों ने लोकतांत्रिक परिवर्तन के बजाय हिंदू राष्ट्रवादी कब्जे की तरह प्रस्तुत किया गया। एसआईआर पर अर्धसत्य दिखाते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने परिणामों के बाद वोट चोरी का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को भाजपा का आयोग बताया। विदेशी मीडिया ने इन आरोपों को लगभग बिना तथ्य जांचे ही अपने विमर्श का आधार बना लिया।

वोट कटौती के आंकड़े और वास्तविकता

विशेष रूप से एसआईआर को मुस्लिम मतदाताओं को हटाने की साजिश के रूप में पेश किया गया, जबकि हटाए गए 91 लाख नामों में 63 प्रतिशत हिंदू मतदाता थे। बड़ी संख्या में नाम मृत, डुप्लिकेट, स्थायी रूप से स्थानांतरित या फर्जी पाए गए थे। इसके बावजूद विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने केवल मुस्लिम वोट हटाए गए वाली जिद को प्रमुखता दी। देसी-विदेशी विश्लेषक यह भूल गए कि जिन 20 सीटों पर जांच के बाद सबसे ज्यादा वोट काटे गए थे, उनमें से ज्यादातर पर टीएमसी ने ही कब्जा जमाया है।

सीटवार परिणाम और विश्लेषण

इन सीटों में समशेरगंज, लालगोला, भगवानगोला, रघुनाथगंज, मटियाबुर्ज, सूती, मोथाबाड़ी, गोलपोखर, मालतीपुर, चोपड़ा, सुजापुर, राजारहाट न्यू टाउन और बशीरहाट उत्तर शामिल हैं। इन सभी 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी को जीत मिली है। अन्य सीटों की बात करें तो फरक्का सीट पर सबसे ज्यादा 38,222 वोट काटे गए थे, लेकिन वहां से कांग्रेस ने जीत दर्ज की। वहीं भाजपा को जंगीपुर, रतुआ, करनदिघी, केतुग्राम, मानिकचक और मोंतेश्वर जैसी 6 सीटों पर जीत मिली।

वोट कटौती और चुनावी परिणाम का विश्लेषण

यह अकेला आंकड़ा ही उस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल देता है, जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि वोटर लिस्ट में सुधार से सिर्फ टीएमसी को नुकसान हुआ और भाजपा को फायदा पहुंचा। अगर बड़े पैमाने पर देखें, तो जिन 187 सीटों पर 5,000 से ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, वहां भाजपा ने 119 और टीएमसी ने 65 सीटों पर जीत दर्ज की। इन 187 सीटों में से 47 सीटें ऐसी थीं, जहां कटे हुए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी।

चुनावी प्रतिस्पर्धा और भ्रम

भाजपा ने जो 119 सीटें जीतीं, उनमें से 28 सीटों पर जीत का अंतर कटे हुए वोटों से कम था। इन आंकड़ों से साफ है कि कई सीटों पर कांटे की टक्कर थी और वहां कटे हुए वोटों की संख्या जीत के मार्जिन से ज्यादा रही। लेकिन हार का पूरा ठीकरा सिर्फ वोटर लिस्ट सुधार की प्रक्रिया पर फोड़ देना और इसे ही हार की एकमात्र वजह बताना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है।

भाजपा का बढ़ता विस्तार और वैश्विक प्रतिक्रिया

सच्चाई यह है कि देसी-विदेशी विश्लेषकों को नरेंद्र मोदी और भाजपा का बढ़ता राजनीतिक विस्तार विदेशी वैचारिक प्रतिष्ठानों की सबसे बड़ी बेचैनी बन चुका है। खासकर उन क्षेत्रों में यह जलन ज्यादा है, जो 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली थोड़ी राजनीतिक राहत को लेकर उत्साहित चले आ रहे थे। आज भाजपा अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष या गठबंधन के जरिए सत्ता में है।

मतदाता की प्राथमिकताएं और वास्तविक मुद्दे

ऐसे में भारत को हिन्दू राष्ट्रवादी लोकतंत्र और एकदलीय प्रभुत्व के खांचे में फिट करने की कोशिशें और तेज होती दिख रही हैं। परंतु बंगाल का फैसला यह भी साबित करता है कि भारत का मतदाता अपनी प्राथमिकताएं जमीन, अनुभव और आकांक्षाओं के आधार पर तय कर रहा है, न कि न्यूयॉर्क, लंदन या दोहा में बैठे नैरेटिव निर्माताओं की वैचारिक दृष्टि के अनुसार।

बंगाल के स्थानीय मुद्दे और जनभावना

विदेशी विश्लेषणों में बंगाल के चुनावी परिणाम को हिन्दुत्व के उभार के रंग में रंग दिया गया, लेकिन वहां की जनता की नाराजगी, आर्थिक बदहाली, भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, सत्ताधारियों की हिंसा, उद्योगों का पलायन जैसे कारणों की अनदेखी कर दी गई। आज बंगाल पर कर्ज 7.7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। हजारों कंपनियां राज्य छोड़ चुकी हैं। युवाओं का बड़ा वर्ग रोजगार के लिए पलायन कर रहा है।

सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां और जनता का असंतोष

महानगरों में घरों में काम करने वाली अधिकतर महिलाएं बंगाली ही निकलती हैं। कट मनी, भर्ती घोटाले और सिंडिकेट संस्कृति जैसे मुद्दे वर्षों से जनता में असंतोष पैदा कर रहे थे। लेकिन देसी-विदेशी विश्लेषक उलझे हैं एसआईआर और बहुसंख्यकवाद के उभार में। इसी दकियानूसी सोच के आधार पर यह तत्व जनता में अप्रासंगिक हो रहे हैं और भाजपा का ग्राफ निरंतर बढ़ रहा है।

Topics: Mamata BanerjeePolitical AnalysisBJP vs TMCSIR voter listWest Bengal Election ResultNarendra Modi
राकेश सैन
राकेश सैन
वरिष्ठ पत्रकार। पंजाब के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन। [Read more]
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