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होम भारत उत्तराखंड

बन्दर को आया शहर का ‘स्वाद’

जिन बंदरों ने शादी के गुलाब जामुन और चाउमीन का स्वाद ले लिया हो तो वे जंगल की घास- पत्ती क्यों खाएंगे।

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 8, 2026, 12:07 pm IST
inउत्तराखंड, सोशल मीडिया

जो कहते हैं कि इतने बंदर गांव में कहां से आए, शहर में कहां से आए उनके लिए यह लेख है।
सारी समस्या मात्र एक ही है कि हमने पालतू कुत्तों को पूर्ण रूप से सात्विक दाल, भात और नमकीन बिस्कुट खाने वाले बना दिया। पालतू कुत्तों की पीढ़ी जब दाल भात खा रही है, तो उनका मांसाहार के प्रति जो प्राकृतिक आकर्षण था वह खत्म हो गया है। इसलिए वे बंदरों के साथ हिंसक वृत्ति से नहीं, अपितु सौहार्दपूर्ण दृष्टि कोण रखते हुए गठबंधन कर चुके हैं।

हम क्यों आपस में झगड़ा करें। दाल-भात का जुगाड़ मालिक लोग कर देते हैं और मालिकों के लिए सरकार फ्री में राशन दे रही है, उनको भी खेत में काम नहीं करना पड़ता। इसलिए तुम भी अन्दर बाहर से अपना पेट भरो हम भी खाएं, आप भी खाओ। जबकि पहले जिस घर के आसपास कुत्ते पाले जाते थे उसके लगभग आधे किलोमीटर तक बंदर नहीं आते थे।

दूसरा कारण यह भी है कि भले ही आबादी की दृष्टि से पलायन हो गया है किन्तु स्कूलों और देव मंदिरों में प्रत्येक दिन भोजन अवश्य बनता है। लोग जब देव कार्य के लिए पूजन करते हैं, तो वे सभी चाहते हैं कि मैं अधिकाधिक लोगों को बुलाऊं। ऐसे में उसी अनुपात में भोजन बना देते हैं, किंतु जब खाने वाले कम आते हैं तो भोजन मन्दिर परिसर के आसपास फेंक देते हैं। जिन बंदरों ने शादी के गुलाब जामुन और चाउमीन का स्वाद ले लिया हो तो वे जंगल की घास-पत्ती क्यों खाएंगे।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न आमतौर पर पूछा जाता है कि क्या बंदर पहले नहीं थे, हां अवश्य थे, परंतु हर गांव के बंदरों की अपनी-अपनी सीमाएं होती थीं। टिहरी डैम के कारण जितने गांव विस्थापित हुए, जिसमें टिहरी बाजार के बंदर भी सम्मिलित हैं, का विस्थापन कहां हुआ है? यह अकेला टिहरी बांध ही नहीं जहां-जहां विस्थापन हुआ, वहां के जंगलों के सुअर, स्याही, बाघ आदि भी सुरक्षित क्षेत्रों में गए होंगें। इसलिए बंदरों का रुख गांव की तरफ हुआ। पॉलीथिन छीनने वाले यही बंदर थे।

अब हमारे गांव के बंदर भी यही सीख गए। संसार में काफी जीव जंतु एक किसान की कमाई खाते थे। देवी-देवताओं और भगवान को भोग भी किसान द्वारा कमाए अन्न का लगता था। आज गांव के जो पक्षी हमारी फसल के दानों पर निर्भर थे, उस गांव की जमीन लगभग बंजर प्रायः हो गई है, वहां वह पक्षी कहीं दिखाई नहीं देते।

उन्होंने भी अपने उदर पूर्ति के लिए पलायन कर लिया है, इसलिए बंदरों को भी अपने पेट की आग बुझाने के लिए खेतों में कुछ मिल नहीं रहा है, इसलिए वे भी सीमाओं का अतिक्रमण करने पर विवश हैं।
श्रवण सेमवाल की फेसबुक वॉल से साभार

 

Topics: खान-पानवन्यजीवबंजर भूमिटिहरी बांधबंदरों का आतंककुत्ताहिंसक वृत्तिपलायन
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