भाजपा ने पश्चिम बंगाल में भगवा का परचम लहराते हुए असम में तीसरी बार बड़े बहुमत के साथ सरकार बनाने की सफलता प्राप्त की है। पुडुचेरी के रास्ते तमिलनाडु की राजनीति को मजबूत किया है। केरल में वामपंथ का अंतिम किला भी ढह गया है। दूसरी तरफ तमिलनाडु की जनता ने द्रविड़ राजनीति की आड़ में परिवारवाद और सनातन विरोध की राजनीति का भी अंत कर दिया है।
पश्चिम बंगाल: टीएमसी के गढ़ में भाजपा की प्रचंड जीत के कारण
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी ने 207 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। 2021 में 77 सीटों से यह 130 सीटों की भारी बढ़ोतरी है। भाजपा का वोट शेयर लगभग 45.84% रहा, जो 2021 के 38% से करीब 7–8% अधिक है। कुल 294 सीटों में से 293 सीटों पर नतीजे घोषित हुए, जिनमें तृणमूल कांग्रेस को ठीक 80 सीटें मिलीं।
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष का निर्णायक मोड़ है। यह जनादेश सत्ता परिवर्तन से कहीं अधिक, राज्य की पहचान, संस्कृति और राजनीतिक दिशा के पुनर्निर्धारण का संकेत देता है। भाजपा ने इस चुनाव को पारंपरिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बजाय व्यापक सभ्यतागत विमर्श के रूप में प्रस्तुत किया और मतदाताओं ने इस नैरेटिव को स्वीकार करते हुए तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया।
भाजपा की यह जीत भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है, जो भाजपा की दीर्घकालिक दृष्टि, सशक्त संगठन और स्पष्ट नैरेटिव के साथ मैदान में उतरने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। बंगाल का यह जनादेश आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
इस विजय की पृष्ठभूमि में भाजपा की रणनीतिक स्पष्टता और दीर्घकालिक संगठनात्मक निवेश प्रमुख रहा। पार्टी ने पश्चिम बंगाल को केवल एक राज्य के रूप में नहीं, बल्कि विचारधारा के विस्तार के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा। यही कारण है कि चुनावी तैयारी को जमीनी स्तर तक ले जाने पर विशेष जोर दिया गया। कार्यकर्ताओं से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक, सभी ने लगातार जनसंवाद, नुक्कड़ सभाओं और स्थानीय मुद्दों के जरिए मतदाताओं के साथ सीधा संपर्क बनाए रखा। यह रणनीति भाजपा को एक बाहरी पार्टी की छवि से निकालकर एक जमीनी विकल्प के रूप में स्थापित करने में सफल रही।
सांस्कृतिक विमर्श और जनसमर्थन
भाजपा की इस सफलता में सांस्कृतिक और पहचान आधारित मुद्दों की केंद्रीय भूमिका रही। बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता, सीमावर्ती सुरक्षा और अवैध घुसपैठ जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया गया। इन मुद्दों को केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित न रखकर, उन्हें जनता के रोजमर्रा के अनुभवों और चिंताओं से जोड़ा गया। परिणामस्वरूप, चुनाव एक साधारण सत्ता संघर्ष न रहकर व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक बहस का रूप लेता गया।
तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ राज्य में सत्ता विरोधी लहर भी एक बड़ा कारण बनी। तृणमूल की गुंडागर्दी से जनता आजिज आ चुकी थी। तृणमूल कांग्रेस के शासन में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक पक्षपात और कानून-व्यवस्था को लेकर उठे सवालों ने जनता के भीतर पहले से असंतोष भरा हुआ था। दशकों तक वामपंथी शासन और पिछले 15 सालों से तृणमूल शासन देख चुकी जनता बदलाव चाहती थी।
भाजपा ने मतुआ समुदाय सहित विभिन्न वर्गों के बीच सक्रिय पहुंच और संवाद ने पार्टी के समर्थन आधार को व्यापक बनाया। साथ ही राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी और लगातार दौरों ने चुनावी अभियान को गति प्रदान की।
अगर पिछले एक दशक के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा की यह जीत अचानक नहीं, बल्कि निरंतर विस्तार की प्रक्रिया का परिणाम है। 2014 में सीमित उपस्थिति से शुरू होकर 2019 में मजबूत प्रदर्शन और उसके बाद लगातार बढ़ते वोट प्रतिशत ने यह संकेत दे दिया था कि पार्टी बंगाल में अपनी जमीन मजबूत कर रही है। इस बार की जीत उसी क्रम का स्वाभाविक विस्तार है, जहां संगठन, रणनीति और वैचारिक स्पष्टता का संगम देखने को मिला।
दो चरणों में भाजपा का उभार
बंगाल में भाजपा की विजय की गाथा को दो चरणों में देखा जाना चाहिए। पहले चरण में भाजपा ने वैचारिक और संगठनात्मक उभार के रूप में उपस्थिति दर्ज की। दूसरे और निर्णायक चरण में यह जनादेश पार्टी के जनसरोकार के मुद्दों की जनमन में व्यापक स्वीकृति है। 2026 की यह जीत केवल राजनीतिक समीकरणों का परिणाम नहीं, बल्कि उन मुद्दों की स्वीकार्यता है जिन्हें भाजपा ने लगातार जमीन पर उठाया। संकेत है कि यह जनादेश केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहने वाला।
भाजपा के लिए यह एक मॉडल के रूप में उभर सकता है, जिसमें जनसरोकार, राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान की राजनीति को एक साथ साधा गया है। अन्य प्रदेशों में आने वाले विधानसभा चुनावों में भी इन मुद्दों की पुनरावृत्ति की संभावना है, जिससे संकेत मिलता है कि बंगाल की राजनीतिक दिशा अब राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित करेगी।
तुष्टीकरण और प्रशासनिक सवाल
इस चुनाव में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति, बांग्लादेशी घुसपैठ,जनसांख्यिकीय बदलाव तो अहम मुद्दे थे ही, साथ ही महिला सुरक्षा भी एक ऐसा मुद्दा था जिसको लेकर जनता में ममता सरकार के प्रति भारी आक्रोश था। अवैध घुसपैठ केवल एक स्थानीय प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है, क्योंकि पश्चिम बंगाल के रास्ते देश के अन्य हिस्सों में भी घुसपैठियों का फैलाव होता है। बावजूद इसके वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में ममता बनर्जी हमेशा इस मुद्दे को नजरअंदाज करती रही। ममता बनर्जी बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने में सीमा सुरक्षा बल को सहायता नहीं कर रही थीं। दरअसल, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच लगभग 2200 किमी लंबी सीमा है, जिसमें से करीब 450 किमी क्षेत्र में बाड़ नहीं लग पाई है। इसका कारण राज्य सरकार ने इस कार्य के लिए सीमा सुरक्षा बल को आवश्यक जमीन उपलब्ध नहीं कराई। इसका खामियाजा तो भुगतना ही था, जनता ने जनादेश दिया और तृणमूल को सत्ता से उखाड़ फेंका।
पश्चिम बंगाल में सीमा प्रबंधन का मुद्दा भी अहम था। तृणमूल कांग्रेस सीमा पर बाड़ लगाने के लिए सहयोग नहीं कर रही थी। दिनों दिन घुसपैठ की समस्या और गंभीर होती जा रही थी। असम का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए जनता के बीच यह संदेश दिया गया कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो घुसपैठ को नियंत्रित किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल की जनता ने असम में हुए बदलावों को भी देखा। ममता बनर्जी का मुस्लिम तुष्टीकरण तो पहले से जगजाहिर था, ममता सरकार का फोकस विकास के बजाय एक विशेष वोट बैंक तक सीमित हो गया था। जनता पिछले 15 सालों से यह देख रही थी, वह हर सूरत में बदलाव चाहती थी।
महिला सुरक्षा का मुद्दा भी इस चुनाव में निर्णायक कारक बनकर उभरा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार महिला सुरक्षा के मोर्चे पर पूरी तरह विफल रही। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में 2024 में हुई जूनियर डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया, लेकिन सरकार ने इसे दबाने की कोशिश की और पुलिस लापरवाही बरती। संदेशखाली में टीएमसी नेता शेख शाहजहां पर महिलाओं के यौन शोषण के आरोप लगे, जहां सैकड़ों महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किए, फिर भी सरकार ने आंखें मूंद लीं। दुर्गापुर गैंगरेप जैसे मामलों में भी ममता ने पीड़िताओं को दोष देते हुए रात में बाहर न निकलने की सलाह दी, जो जनता के आक्रोश को भड़काने वाला था। भाजपा ने आरजी कर पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पानीहाटी से टिकट दिया, वह चुनाव भी जीतीं। नतीजतन जनता ने तृणमूल को नकार दिया।
भ्रष्टाचार भी बड़ा कारण
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं से भी पश्चिम बंगाल की जनता परेशान थी। शिक्षक भर्ती, क्लर्क भर्ती जैसे घोटालों का तृणमूल के पास कोई उत्तर नहीं था। पश्चिम बंगाल में बढ़ता भ्रष्टाचार, बेरोजगारी सीधे तौर पर युवाओं के भविष्य को प्रभावित कर रही थी। केंद्र सरकार की जनता के लिए लाई गई योजनाओं को ममता बनर्जी राज्य में लागू नहीं होने दे रही थी, राज्य सरकार ने अपने राजनीतिक हितों के कारण विकासात्मक पहलों को सीमित कर दिया था। इसका खामियाजा भी ममता सरकार को भुगतना पड़ा।
उत्थान का संकेत
पश्चिम बंगाल का यह चुनाव सभ्यतागत उत्थान का संकेत भी देता है। 1952 में जनसंघ के रूप में मात्र 7 राज्यों में 32 विधायकों के साथ शुरुआत करने वाली भाजपा 2026 तक 30 राज्यों में 1798 विधायकों तक पहुंच गई है, जो पूरे भारत में उसके निरंतर विस्तार और प्रभाव को दर्शाता है। भाजपा का यह सफर आसान नहीं रहा है, बल्कि अनेक चुनौतियों और संघर्षों से भरा रहा है।
सितंबर 2013 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के उदय के समय भाजपा के विधायकों की संख्या 773 थी, जो अब बढ़कर 1798 से अधिक हो गई है। यह वृद्धि विकास, स्थिरता और निर्णायक शासन के पक्ष में मिल रहे लगातार जनादेश को दर्शाती है। इतने बड़े राजनीतिक परिवर्तन के पीछे भाजपा की जनसरोकार आधारित नीतियों और ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण से प्रेरित नीतियों के बीच स्पष्ट अंतर भी एक प्रमुख कारण रहा है। भारतीय राजनीति में पहले भी ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिले हैं, जब जनादेश ने बड़े-बड़े दलों को अप्रत्याशित रूप से हाशिए पर पहुंचा दिया। उत्तर प्रदेश में 2012 में बहुजन समाज पार्टी 206 सीटों से घटकर मात्र 80 सीटों पर सिमट गई थी। इसी प्रकार, राजस्थान में भाजपा 1998 में 95 सीटों से घटकर 33 सीटों पर आ गई थी, जबकि 2013 में कांग्रेस 100 सीटों से गिरकर केवल 21 सीटों पर रह गई। समाजवादी पार्टी भी 2017 में 224 सीटों से घटकर महज 47 सीटों तक सीमित हो गई थी। तमिलनाडु में भी करुणानिधि और जयललिता के दौर में अक्सर ऐसा देखने को मिलता था कि एक दल की प्रचंड लहर के सामने दूसरा दल पूरी तरह से साफ हो जाता था।
असम में हिमंत मैजिक: लगातार तीसरी बार ‘डबल इंजन’ सरकार
असम विधानसभा चुनाव में भाजपा ने निर्णायक जनादेश हासिल करते हुए लगातार तीसरी बार वापसी की है। यह जीत केवल चुनावी सफलता भर नहीं है, बल्कि राज्य की बदलती राजनीतिक प्रवृत्तियों, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और शासन के प्रति उनके दृष्टिकोण का संकेत भी है। भाजपा 2014 से पहले असम में सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी, जिसने डेढ़ दशक में संगठन, नेतृत्व और नीतिगत स्पष्टता के आधार पर उल्लेखनीय विस्तार किया है।
असम विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगी दलों के एनडीए गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 126 सीटों में से 102 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस गठबंधन में भाजपा ने अकेले 82 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया है। बता दें कि 2011 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 5 सीटें मिली थीं। इसके बाद 2016 में पार्टी ने 60 सीटें जीतकर अपने सहयोगी असम गण परिषद के साथ सरकार बनाई। 2021 में भी भाजपा ने 60 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की। भाजपा ने अपने सहयोगियों को सीटें देने के बाद केवल 90 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिससे उसकी जीत का प्रतिशत और प्रभावशाली हो जाता है। इस तरह यह नतीजा केवल बहुमत नहीं, बल्कि व्यापक जनसमर्थन का प्रतीक बनकर उभरा है।
यह जीत मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में मिली है, जिनकी प्रशासनिक शैली, राजनीतिक स्पष्टता और निर्णायक छवि ने भाजपा को राज्य में एक स्थिर विकल्प के रूप में स्थापित किया है। दो कार्यकालों के बाद सामान्यतः उत्पन्न होने वाली सत्ता-विरोधी लहर को निष्प्रभावी करना किसी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन भाजपा ने इसे न केवल रोका, बल्कि अपने जनाधार को और विस्तार दिया।
कांग्रेस का खराब प्रदर्शन
कांग्रेस के लिए असम का चुनाव अत्यंत निराशाजनक रहा। पार्टी को केवल 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा, जो असम में उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है। विपक्ष के नेता रहे देबब्रत सैकिया भी अपनी सीट नहीं बचा सके। यह परिणाम कांग्रेस के संगठनात्मक संकट और नेतृत्व संबंधी कमजोरियों को उजागर करता है। कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के लोकसभा में उपनेता गौरव गोगोई जोरहाट विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में गोगोई इसी क्षेत्र में 12,130 मतों से आगे रहे थे, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने 23,182 मतों से पराजित कर दिया। यह हार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक प्रभाव में गिरावट का संकेत है, खासतौर पर तब, जब गोगोई को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया था।
यह पराजय कांग्रेस नेतृत्व की रणनीतिक कमजोरियों को भी उजागर करती है। गांधी परिवार ने राज्य के अन्य वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर गोगोई को आगे बढ़ाया, जिससे संगठन के भीतर असंतोष पैदा हुआ। यही कारण है कि पार्टी का आधार लगातार कमजोर होता दिख रहा है। नतीजों ने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस का सामाजिक प्रतिनिधित्व सीमित होता जा रहा है। पार्टी के 19 विधायकों में से 18 मुस्लिम समुदाय से हैं, जबकि एक विधायक आरक्षित सीट से चुना गया है। इस स्थिति ने कांग्रेस की व्यापक जनस्वीकृति पर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं और उसे एक सीमित सामाजिक आधार वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया है।
कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संघर्ष भी सामने आया है। धुबरी लोकसभा सीट से 10,12,476 मतों के रिकॉर्ड अंतर से जीतने वाले रकीबुल हुसैन को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। यह वही सीट है, जहां उन्होंने तीन बार के सांसद बदरुद्दीन अजमल को पराजित किया था। इतना बड़ा जनादेश मिलने के बावजूद उन्हें किनारे करना कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों और नेतृत्व की प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
बदरुद्दीन अर्श से फर्श पर
असम को ग्रेटर बांग्लादेश का सपना देखने वाले बदरुद्दीन अजमल की पार्टी विधानसभा में 16 सीटों से गिरकर सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बड़ी हार के बाद अजमल का राजनीतिक आधार कमजोर हुआ था। इस बार अजमल होजाई जिले की बिनाकांडी सीट से जीतने में सफल हुए और उनकी पार्टी के प्रत्याशी मजीबुर रहमान ने डलगांव सीट जीत ली लेकिन दूसरी जगह मुस्लिम-बहुल सीटों पर 90 प्रतिशत से अधिक वोट पड़ने के बावजूद उनकी पार्टी, असम में निचले इलाकों और बराक घाटी में बुरी तरह हार गई।
पार्टी विधानसभा में 16 सीटों से गिरकर सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई है। ( यह भी आश्चर्जनक हैं की अजमल से मुस्लिमो में एकाएक दुरी बना लिया. 2014, 2019 और 2024 में देश में सर्वाधिक मतदान धुबरी लोकसभा सीट पर हुआ था और 2014 और 19 में अजमल विजयी रहे थे. मगर 2024 में देश में सर्वाधिक मतो के अंतर् से अजमल चुनाव हारे हैं. इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आनेवाली 11 विधानसभा की सीटों में किसी पर भी अजमल प्रथम पातड़ां पर नहीं आ सके थे. 2024 लोकसभा चुनाव में अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट किसी भी सीट पर प्रथम पायदान पर नहीं आ सकी थी. ऐसा खा जाता हैं की अजमल का 2024 के बाद मुस्लिम मतदात्वो से विस्वाश डगमगा गया हैं. एक समय राज्य के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार समझने वाले अजमल इस बार मुश्किल से विधायक बने हैं. अजमल की नज़र प्रद्युत बोरदोलोई द्वारा खाली किये गए नौगॉव लोकसभा की सीट पर टिकी हैं. मगर धुबरी के 2024 के अनुभव के बाद अजमल सम्भल कर राजनीती कर रहे हैं).
भाजपा की सफलता के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण उसकी स्पष्ट नीतियां रही हैं, विशेषकर अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर। राज्य में लंबे समय से यह एक संवेदनशील विषय रहा है, और भाजपा ने इसे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखा। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सरकार ने अवैध प्रवासियों की पहचान, सीमा सुरक्षा और अतिक्रमण हटाने जैसे मुद्दों पर सख्त कदम उठाए। इन कदमों को राज्य की जनता का व्यापक समर्थन मिला।
इसके अलावा, भाजपा की “डबल इंजन” सरकार की अवधारणा भी मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रही। केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय के कारण बुनियादी ढांचे में सुधार, निवेश को बढ़ावा और विकास परियोजनाओं के तेज क्रियान्वयन ने जनता के बीच विश्वास पैदा किया। सड़क, परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सुधार का असर चुनाव परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
पूर्वोत्तर राज्यों के प्रति केंद्र सरकार के दृष्टिकोण में बदलाव भी भाजपा के पक्ष में गया। लंबे समय तक उपेक्षित रहे इस क्षेत्र को अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए गए। उग्रवाद में कमी, कनेक्टिविटी में सुधार और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि ने क्षेत्र के विकास को नई दिशा दी है।
असम के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम भी राजनीतिक विश्लेषण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए, सामगुड़ी विधानसभा सीट पर 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 86,563 मतों की बढ़त मिली थी, लेकिन उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार ने कांग्रेस प्रत्याशी (तंजील हुसैन) को 24,501 मतों से हराया। हालांकि 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के तंजील हुसैन ने 1,08,310 मतों से जीत हासिल की। यह दर्शाता है कि स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों की भूमिका अभी भी निर्णायक बनी हुई है।
असम का जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन या स्थिरता का संकेत नहीं है, बल्कि यह राज्य की बदलती राजनीतिक चेतना को भी दर्शाता है। मतदाता अब केवल जातीय या पारंपरिक समीकरणों से आगे बढ़कर शासन, विकास और नीतिगत स्पष्टता को प्राथमिकता दे रहे हैं। भाजपा ने इन अपेक्षाओं को समझते हुए अपनी रणनीति तैयार की और उसी का परिणाम उसे लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के रूप में मिला।
पुडुचेरी में एनडीए की मजबूत वापसी
भाजपा ने केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है। एनडीए की सीटें पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में 16 से बढ़कर 18 हो गई हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को पुडुचेरी की विधानसभा क्षेत्रों में सीमित बढ़त ही मिली थी, किंतु अब 30 सदस्यीय विधानसभा में 18 सीटों की जीत यह संकेत देती है कि गठबंधन का जनाधार तेजी से मजबूत हुआ है। यह परिणाम भाजपा की उस रणनीति को भी रेखांकित करता है, जिसमें वह अपने सहयोगियों के साथ दीर्घकालिक संबंधों को प्राथमिकता देती है, भले ही इसके लिए उसे सीटों का त्याग ही क्यों न करना पड़े। बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) के साथ दो दशकों से अधिक का गठबंधन तथा अन्य राज्यों में सहयोगी दलों को सीटें देना इसी दृष्टिकोण का उदाहरण है।
इसके विपरीत, कांग्रेस के लिए पुडुचेरी का परिणाम गंभीर झटका साबित हुआ है। पार्टी ने दो बार के मुख्यमंत्री और वर्तमान सांसद वी. वैथिलिंगम को थट्टनचावडी सीट से उम्मीदवार बनाया था और उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी घोषित किया था, किंतु वे मात्र 2990 (12.68%) मत प्राप्त कर चौथे स्थान पर रहे और अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। उल्लेखनीय है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी विधानसभा क्षेत्र में उन्हें 11324 (51.62%) मत मिले थे और वे प्रथम स्थान पर रहे थे। यह अंतर कांग्रेस के घटते जनाधार और संगठनात्मक कमजोरी को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
कांग्रेस की गिरावट का एक और संकेत यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी 30 में से 28 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी, किंतु इस बार वह केवल एक सीट पर सिमट गई। पिछले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस मात्र दो सीटें ही जीत सकी थी। इस प्रकार, पार्टी न केवल अपनी संभावनाओं पर खरी नहीं उतरी, बल्कि अपने पिछले प्रदर्शन को भी दोहराने में असफल रही।
इस पराजय के पीछे कांग्रेस और उसके सहयोगियों के बीच समन्वय की कमी एक प्रमुख कारण के रूप में उभरती है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ गठबंधन होने के बावजूद सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति में स्पष्ट तालमेल का अभाव रहा। 30 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 21 और द्रमुक ने 13 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जबकि गठबंधन के तीसरे घटक विदुथलाई चिरुथैगल काची ने 4 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए। इस प्रकार कुल 38 उम्मीदवार मैदान में थे, जो आपसी प्रतिस्पर्धा और असंतुलन को दर्शाता है। कई सीटों पर सहयोगी दल एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ते दिखाई दिए, जिससे मतों का विभाजन हुआ।
चुनाव प्रचार के दौरान भी यह बिखराव स्पष्ट रूप से नजर आया। एम. के. स्टालिन और राहुल गांधी एक ही दिन पुडुचेरी में मौजूद थे, किंतु उन्होंने न तो साझा मंच किया और न ही अपने भाषणों में एक-दूसरे का उल्लेख किया। इससे गठबंधन की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न लगा। स्थिति तब और जटिल हो गई, जब 6 अप्रैल 2026 को राहुल गांधी ने पार्टी के बागी उम्मीदवारों से मुलाकात की और उनके साथ सार्वजनिक रूप से तस्वीरें खिंचवाईं। इसे सहयोगी दलों के विरुद्ध अप्रत्यक्ष संदेश के रूप में देखा गया, जिसने गठबंधन की विश्वसनीयता को और कमजोर किया।
इसके विपरीत, भाजपा का गठबंधन प्रबंधन अधिक सुव्यवस्थित और व्यावहारिक दिखाई देता है। पार्टी ने कई अवसरों पर अपने सहयोगियों को प्राथमिकता देते हुए सीटों का त्याग किया है, जिससे दीर्घकालिक राजनीतिक भरोसा कायम हुआ है। झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं, जहां भाजपा ने अपने मजबूत क्षेत्रों में भी सहयोगियों को अवसर दिया।
पुडुचेरी भले ही एक छोटा केंद्रशासित प्रदेश हो, किंतु इसकी राजनीति का प्रभाव पड़ोसी तमिलनाडु पर भी पड़ता है। दोनों क्षेत्रों की राजनीतिक धाराएं एक-दूसरे को प्रभावित करती रही हैं। ऐतिहासिक रूप से भी यह संबंध स्पष्ट है। एम. जी. रामचंद्रन ने जब द्रमुक से अलग होकर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का गठन किया, तो उनकी पहली सरकार तमिलनाडु में नहीं, बल्कि पुडुचेरी में बनी थी। 1974 में पुडुचेरी में इस पार्टी की सरकार बनने के बाद 1977 में तमिलनाडु में भी उसे सत्ता प्राप्त हुई, जहां उसने एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक को पराजित किया।
भाजपा पुडुचेरी के माध्यम से तमिलनाडु में अपनी राजनीतिक उपस्थिति को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। इस प्रकार, पुडुचेरी का चुनाव परिणाम केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव भी संभावित है।
केरल और तमिलनाडु: क्या खत्म हो गई तुष्टीकरण की राजनीति?
केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट 102 सीटों और जीत दर्ज़ किया हैं वही माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट 35 सीट जीती है और भाजपा ने तीन सीटों पर जीत दर्ज करने में सफलता प्राप्त की है. कांग्रेस पार्टी ने 63 सीटों पर जीती है। वहीं इसकी मुख्य सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 22 सीटों पर जीत दर्ज की है। माकपा इस बार मात्र 26 सीटें ही जीती है, पिछली बार से उसकी 36 सीट इस बार कम हुई हैं।
केरल विधानसभा चुनावों में हुई पिनाराई विजयन सरकार की हार सिर्फ उनकी नहीं बल्कि यह वामपंथ के पूरे मॉडल की अस्वीकृति है। अब देश में कहीं भी वामपंथियों की सरकार नहीं बची है। केरल, जो लंबे समय तक वाम राजनीति का आखिरी मजबूत दुर्ग माना जाता था, अब उसी वामपंथ के लिए सत्ता से बाहर होने की ऐतिहासिक भूमि बन गया है। जनता वामपंथी दलों को नकार चुकी है।
कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाला यूडीएफ केरल में इस चुनाव में जरूर सत्ता में लौट रहा है, लेकिन यह जीत किसी निर्णायक जन-उभार की तरह नहीं, बल्कि वाम विरोधी लहर और सत्ता-विरोधी थकान का परिणाम अधिक लगती है। यही कारण है कि यह जीत कांग्रेस के लिए खुशी का अवसर कम और आत्ममंथन का अवसर अधिक होनी चाहिए।
राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की हालत यह रही है कि पार्टी कई बार नैतिक ऊंचाई तो दिखाती है, लेकिन सांगठनिक मजबूती और निर्णायक राजनीतिक दिशा के मामले में अक्सर बिखरी हुई नजर आती है। यहां कांग्रेस पार्टी दो बार विपक्ष में रहकर एलडीएफ के सत्ता विरोधी लहर के कारण सरकार में आ सकी है। केरल विधानसभा चुनाव यूडीएफ की जीत से अधिक एलडीएफ की हार है। मुख्य विरोधी होने का लाभ यूडीएफ को मिला है और वह दस सालों के एलडीएफ के सत्ता विरोधी लहर के कारण सरकार में आने में कामयाब हुई है।
मगर कांग्रेस पार्टी के लिए यह जीत भी अधूरी है। कांग्रेस पार्टी नीत यूडीएफ की सरकार बन रही है, मगर इस सरकार की कुंजी कांग्रेस पार्टी के पास नहीं बल्कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के हाथों में होगी। केरल में सरकार बनाने के लिए 71 सीटों की जरूरत होती है। कांग्रेस पार्टी 63 सीटें जीतकर अब पूरे कार्यकाल में सहयोगी आईयूएमएल के समर्थन पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के समक्ष आईयूएमएल की सांप्रदायिक राजनीति को बर्दाश्त करने के अलावा कोई उपाय नहीं है। अगर आईयूएमएल की सांप्रदायिक राजनीति की बात करें तो यह फेहरिस्त काफी लंबी है। 26 अक्टूबर 2023 को कोझिकोड में आईयूएमएल केरल प्रदेश के अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने अपने भाषण में भारत सरकार पर हमेशा इस्राएल का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि जो भी इस्राएल के साथ हाथ मिलाता है, वह आतंकवाद का समर्थन करता है। दूसरे शब्दों में इस्राएल को एक आतंकवादी देश बताने की कोशिश की गई थी। इसी रैली में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता और विधायक एम. के. मुन्नेर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अमर बलिदानी भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना हमास आतंकियों से करने के आरोप हैं।
मगर कांग्रेस पार्टी इसके बावजूद भी आईयूएमएल के खिलाफ कोई भी वक्तव्य तक जारी करने का हिम्मत नहीं जुटा सकी थी। जुलाई 2023 में मुस्लिम लीग की युवा शाखा ने केरल के कासरगोड की एक रैली में हिंदुओं के खिलाफ भड़काऊ नारे लगाए थे। यूडीएफ सरकार के दौरान आईयूएमएल के शिक्षा मंत्री पी. के. अब्दुर रब्ब ने अपने आधिकारिक आवास का नाम गंगा से बदलकर ग्रेस कर दिया था। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा था कि कक्षा में लड़के और लड़कियां एक साथ नहीं बैठना चाहिए और इनके अलग-अलग कक्षाएं होनी चाहिए।
2015 में मुस्लिम लीग ने अपने मंत्रालय से जुड़े किसी भी कार्यक्रम में दीपक जलाने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार दीप प्रज्वलन इस्लामिक मान्यताओं के खिलाफ है। वहीं फरवरी 2013 में मुस्लिम लीग के एक नेता ने केरल यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट में मुस्लिम सदस्यों के लिए अधिक से अधिक सीटों की मांग की, जिससे विवाद खड़ा हो गया था और इसे सांप्रदायिक आधार पर शिक्षा नीति को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देखा गया था। आईयूएमएल इस बार कांग्रेस पार्टी पर शुरू से ही दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
भाजपा नया अवतरण
वहीं भाजपा ने केरल की राजनीति में नया अवतरण किया है। भाजपा ने तीन सीटें जीतकर राज्य में अपनी नई और मजबूत पहचान बनाई है। इसके पूर्व 2016 में भाजपा ने नेमोम सीट जीतकर राज्य में पहली बार खाता खोलने में सफलता प्राप्त की थी। केरल में भाजपा माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के बीच भाजपा के मतदाता आखिरी समय में अपने दूसरे विकल्प के आधार पर मुख्यतः एलडीएफ के साथ चले जाते थे। मगर इस बार भाजपा ने तीन सीटें जीतने के साथ ही छह सीटों पर दूसरे पायदान पर आकर इस द्विध्रुवीय राजनीति को पूरी तरह से पलट दिया है। बता दें कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 11 विधानसभा सीटों पर प्रथम पायदान पर और 9 सीटों पर दूसरे पायदान पर रहकर कुल 20 सीटों पर सीधे मुकाबले में रही थी। इसके अलावा भाजपा त्रिशूर लोकसभा की सीट जीतने के साथ ही तिरुवनंतपुरम लोकसभा की सीट पर दूसरे पायदान पर रही थी। इसके अतिरिक्त भाजपा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के चुनाव में 45 वर्षों के वामपंथियों के शासन को समाप्त करते हुए अपनी सरकार बनाई है। इन सभी बदलावों के बदौलत अब भाजपा केरल में नए अवतार में आई है।
द्रविड़ राजनीति के आड़ में परिवारवाद और सनातन विरोधी मानसिकता का खात्मा
तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और कांग्रेस पार्टी नीत सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायन्स की बड़ी हार इन दलों की हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रतिफल है। तमिलनाडु की जनता ने द्रविड़ राजनीति पर पूर्ण विराम लगाकर अब नई राजनीति का संकेत दिया है। द्रमुक द्रविड़ राजनीति के आड़ में अपने परिवार को आगे बढ़ा रहे थे। इसके अलावा तमिलनाडु के मतदाताओं ने इस गठबंधन को हराकर सनातन धर्म के खिलाफ अनर्गल प्रलाप करने वाले दलों को बड़ा संदेश दिया है। तमिलनाडु के इस परिणाम का असर अन्य प्रदेशों में भी होगा और अन्य दल भी अब अपनी हिंदू विरोधी मानसिकता पर लगाम लगाएंगे।
तमिलनाडु की जनता ने द्रमुक नीत सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायन्स के बजाय उनके खिलाफ सबसे प्रमुख और मजबूत दल तमिलगा वेट्री कज़गम को बड़ा जनमत देकर इस गठबंधन को अपनी नीति में सुधार लाने की सीमा रेखा खींच दी है। इस चुनाव में न सिर्फ डीएमके को बुरी हार का सामना करना पड़ा है, बल्कि पार्टी नेता और निर्वर्तमान मुख्यमंत्री स्टालिन भी अपनी सीट हार गए हैं। वहीं उनके पुत्र उदयनिधि स्टालिन मामूली अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं। इस गठबंधन की हार के बाद इसमें बिखराव शुरू हो गया है। कांग्रेस पार्टी अपने पांच विधायकों के साथ तमिलगा वेट्री कज़गम को समर्थन देने का मन बना रही है। कांग्रेस पार्टी और द्रमुक के दशकों पुराने संबंध टूटने के बाद अब राज्य की राजनीति नए सिरे से लिखी जाएगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र के साथ मधुर संबंध रखने के लिए जोसेफ विजय एनडीए के साथ भी तमिलनाडु में सरकार बनाने पर विचार कर रहे हैं।
भाजपा नीत अन्नाद्रमुक 53 सीटों के साथ मजबूत गठबंधन के तौर पर सामने आया है। अब राज्य की राजनीति में तमिलगा वेट्री कझगम और भाजपा-अन्नाद्रमुक के बीच ही आपसी संघर्ष होगा। द्रमुक और स्टालिन को जनता ने उनके सनातन विरोधी मानसिकता और परिवारवाद को बढ़ावा देने के आरोप में पूर्णतः नकार दिया है। 1996 से लगातार छह बार चुनाव जीतने के बाद इस बार स्टालिन की हार कर जनता ने उन्हें राजनीति से बेदखल कर दिया है। पुडुचेरी की राजनीति का सीधा असर तमिलनाडु की राजनीति पर पड़ता है और भाजपा नीत एनडीए वहां लगातार दूसरी बार सत्ता संभाल रही है। इस कारण अब आने वाले समय में तमिलनाडु में भाजपा भी एक बड़ा और मजबूत दल बनकर सामने आएगा।
(भाजपा पश्चिम बंगाल चुनाव के प्रति अधिक संजीदा और सावधान थी क्योंकि पार्टी भारत को बड़ी जनसांख्यिकीय चुनौती से बचाने के लिए पश्चिम बंगाल की चुनावी लड़ाई को जीतना जरूरी मान रही थी. भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर के साथ बातचीत में कहा था की कि पश्चिम बंगाल में कोई राजनीतिक लड़ाई नहीं है बल्कि एक सभ्यतागत लड़ाई है.)

















