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सेमीकंडक्टर में स्वदेशी सामर्थ्य

भारत तेजी से सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है,यह बदलाव भारत को वैश्विक चिप निर्माण के मानचित्र पर एक मजबूत और भरोसेमंद खिलाड़ी बना रहा है

Written byडॉ. निमिष कपूरडॉ. निमिष कपूर
May 6, 2026, 10:06 pm IST
inभारत, विज्ञान और तकनीक
गुजरात के साणंद में माइक्रोन सेमीकंडक्टर सुविधा का उद्घाटन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। साथ में हैं माइक्रोन टेक्नोलॉजी के चेयरमैन संजय मेहरोत्रा (फाइल फोटो)

गुजरात के साणंद में माइक्रोन सेमीकंडक्टर सुविधा का उद्घाटन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। साथ में हैं माइक्रोन टेक्नोलॉजी के चेयरमैन संजय मेहरोत्रा (फाइल फोटो)

पिछले दशक में भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण में अभूतपूर्व छलांग लगाई है। आत्मनिर्भर भारत विजन के तहत डिजाइन, फैब्रिकेशन, पैकेजिंग और परीक्षण सहित पूरे सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित किया गया है। जनवरी 2022 में शुरू हुआ भारत सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 (सेमीकॉन इंडिया) अब तक 1.6 लाख करोड़ रुपए के निवेश के साथ 10 प्रमुख परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका है, जिनमें से कई संयंत्र वाणिज्यिक उत्पादन में हैं। मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में भारत ने आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम की है। चिप डिजाइन और प्रतिभा विकास के लिए भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 जैसी पहल से आने वाले वर्षों में तकनीकी कौशल और नवाचार को और बल मिलेगा।

भारत आज तकनीकी परिवर्तन के एक ऐसे निर्णायक दौर में खड़ा है, जहां वह केवल तकनीक का उपभोक्ता बने रहने के बजाय उसका निर्माता बनने की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है। पिछले एक दशक में इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। आत्मनिर्भर भारत की व्यापक दृष्टि के अंतर्गत चिप निर्माण को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्थापित किया गया है, क्योंकि टिकाऊ अर्थव्यवस्था की रीढ़ अब सेमीकंडक्टर ही हैं।

पूरी दुनिया चलाती है चिप

सेमीकंडक्टर चिप आकार में भले ही बेहद छोटी हो, लेकिन उसका महत्व असाधारण रूप से विशाल है। मोबाइल फोन, टेलीविजन, फ्रिज, कार और कंप्यूटर, आज के लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की कार्यक्षमता इसी पर निर्भर करती है। यही चिप इन मशीनों को सोचने-समझने और सही समय पर सही काम करने की क्षमता देती है। यह चिप मुख्य रूप से सिलिकॉन से बनाई जाती है, जो देखने में रेत जैसा साधारण पदार्थ है। सिलिकॉन की विशेषता यह है कि वह बिजली को न तो पूरी तरह बहने देता है और न ही पूरी तरह रोकता है, बल्कि उसे नियंत्रित करता है। इसी नियंत्रित व्यवहार के कारण चिप के भीतर ट्रांजिस्टर बनाए जाते हैं।

ट्रांजिस्टर किसी भी चिप का दिमाग होते हैं। यही तय करते हैं कि कोई उपकरण क्या करेगा और कैसे करेगा। मोबाइल के कैमरे का संचालन हो, इंटरनेट या वीडियो चलाना हो, टीवी पर स्ट्रीमिंग देखनी हो या कार में ब्रेकिंग सिस्टम को सक्रिय करना हो, मशीनों द्वारा लिया जाने वाला हर छोटा-बड़ा निर्णय इन्हीं ट्रांजिस्टरों के जरिए संभव होता है।

इसीलिए कहा जाता है कि यदि सेमीकंडक्टर चिप न हो, तो स्मार्टफोन सिर्फ प्लास्टिक और कांच का एक बेजान ढांचा भर रह जाएगा। दिखती नहीं, लेकिन हर निर्णय में मौजूद है चिप। चिप ही आज की स्मार्ट दुनिया चलाती है।

भारत में इसलिए जरूरी है निर्माण

लंबे समय तक भारत सेमीकंडक्टर चिप के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भर रहा। देश की लगभग 90 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी होती थी, जिनके प्रमुख स्रोत चीन, ताइवान और अमेरिका थे। इस अत्यधिक निर्भरता ने भारत को आर्थिक और रणनीतिक-दोनों स्तरों पर असुरक्षित बना दिया।

विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता का सीधा असर कीमतों और उपलब्धता पर पड़ा। चिप महंगी होती गई और आपूर्ति श्रृंखला अक्सर अस्थिर बनी रही। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2020 से 2022 के बीच आया वैश्विक चिप संकट रहा। कोरोना महामारी के कारण दुनिया भर में सेमीकंडक्टर उत्पादन प्रभावित हुआ, जबकि वर्क-फ्रॉम-होम, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल सेवाओं के विस्तार से मोबाइल, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग अचानक तेजी से बढ़ गई।

इस असंतुलन के कारण चिप की भारी कमी हो गई। कार उद्योग से लेकर मोबाइल और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स तक कई क्षेत्रों में उत्पादन ठप या धीमा पड़ गया। वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 500 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान लगाया गया। भारत में भी इसका असर स्पष्ट दिखा। उद्योगों का उत्पादन घटा और उपभोक्ताओं को बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ा।

इस अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया कि सेमीकंडक्टर केवल एक औद्योगिक उत्पाद नहीं, बल्कि आधुनिक अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ हैं। इसलिए भारत के लिए चिप निर्माण में आत्मनिर्भरता अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता, तकनीकी संप्रभुता और रणनीतिक सुरक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।

आत्मनिर्भरता की आधारशिला

इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए भारत सरकार ने दिसंबर 2021 में भारत सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत की, जिसे जनवरी 2022 से तेज़ी से लागू किया गया। इस मिशन का उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर का संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
इस इकोसिस्टम में चिप डिजाइन से लेकर निर्माण, पैकेजिंग और गुणवत्ता परीक्षण तक सभी चरण शामिल हैं। भारत ने सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 के अंतर्गत 76,000 करोड़ का प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया गया। अब तक 10 प्रमुख परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें कुल निवेश लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपए का है। इनमें से कई परियोजनाएं वाणिज्यिक उत्पादन की ओर बढ़ चुकी हैं।

नीति को नई दिशा

मिशन 2.0 के तहत बजट 2026–27 में 1,000 करोड़ रुपए के प्रावधान के साथ भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा भारत की सेमीकंडक्टर नीति को नई और व्यापक दिशा देती है। यह चरण केवल चिप निर्माण तक सीमित न रहकर सेमीकंडक्टर उपकरण निर्माण, कच्ची सामग्री, अनुसंधान एवं विकास तथा पूर्ण-स्टैक भारतीय बौद्धिक संपदा आधारित चिप डिजाइन को केंद्र में रखता है। लक्ष्य है कि 2029 तक देश की 70-75 प्रतिशत चिप आवश्यकता घरेलू उत्पादन से पूरी हो।

मिशन 2.0 का मूल उद्देश्य भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में एक विश्वसनीय और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए उद्योग-नेतृत्व वाले अनुसंधान, आधुनिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना, कुशल मानव संसाधन विकास तथा मजबूत आपूर्ति श्रृंखला के निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है।

बदलती तस्वीर

भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग अब केवल कागजी योजना नहीं, बल्कि जमीन पर आकार लेती हुई वास्तविकता बन चुका है। गुजरात, असम, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सेमीकंडक्टर से जुड़ी विनिर्माण, असेंबली और पैकेजिंग परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं या प्रक्रिया में हैं।

गुजरात में माइक्रोन टेक्नोलॉजी का संयंत्र मेमोरी चिप के निर्माण, टेस्टिंग और पैकेजिंग पर केंद्रित है, जो भारत की वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला में अहम भूमिका निभाएगा। वहीं टाटा समूह सेमीकंडक्टर और आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण परियोजनाओं के माध्यम से ऑटोमोबाइल, मोबाइल और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए चिप्स के इकोसिस्टम को मजबूत कर रहा है। असम में स्थापित हो रहा टाटा का प्रमुख संयंत्र बड़े पैमाने पर चिप्स की पैकेजिंग और परीक्षण क्षमता विकसित करेगा, जिससे देश में सेमीकंडक्टर उत्पादन श्रृंखला को गति मिलेगी।

आम नागरिक को मिलने वाले लाभ

सेमीकंडक्टर मिशन का प्रत्यक्ष लाभ आम नागरिक तक पहुंचेगा। इसका पहला असर कीमतों में कमी के रूप में दिखाई देगा। जब चिप का निर्माण देश में ही होगा, तो आयात पर होने वाला भारी खर्च, कस्टम ड्यूटी और लंबी परिवहन लागत लगभग समाप्त हो जाएगी। अनुमान है कि मोबाइल फोन 2,000 से 4,000 रुपए तक और टीवी 2,000 से 5,000 रुपए तक सस्ते हो सकते हैं।
दूसरा बड़ा लाभ उपलब्धता और स्थिरता से जुड़ा है। अब तक वैश्विक संकट, युद्ध या आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता रहा है। स्वदेशी चिप उत्पादन से यह निर्भरता कम होगी और आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद समय पर और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहेंगे।

तीसरा महत्वपूर्ण लाभ ऊर्जा दक्षता का है। नई पीढ़ी की सेमीकंडक्टर तकनीक कम बिजली में अधिक काम करने में सक्षम होगी। इससे न केवल उपकरणों का प्रदर्शन बेहतर होगा, बल्कि बिजली की खपत भी घटेगी, जिसका सीधा असर घरेलू बिजली बिल पर पड़ेगा।
फ्रिज व एसी जैसे उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली पावर चिप सस्ती होने से बिजली की खपत भी घटेगी। उन्नत डिस्प्ले तकनीकों, 3डी पैकेजिंग और स्वदेशी प्रोसेसर के उपयोग से टीवी और अन्य स्मार्ट उपकरण अधिक पतले, तेज और ऊर्जा-कुशल बनेंगे।

रोजगार के नए अवसर

सेमीकंडक्टर उद्योग भारत में रोजगार का नया इंजन बनकर उभर रहा है। प्रारंभिक चरण में ही वर्ष 2026–27 तक लगभग 4,700 प्रत्यक्ष नौकरियां सृजित होने का अनुमान है। जैसे-जैसे परियोजनाएं आगे बढ़ेंगी, 2030 तक 1,00,000 प्रत्यक्ष और 5,00,000 से 10,00,000 अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की संभावना है। एक संयंत्र से लगभग 1,500 इंजीनियर-तकनीशियन और पैकेजिंग व टेस्टिंग इकाइयों से करीब 3,000 कामगारों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा।

वैश्विक परिदृश्य में भूमिका

पूरी दुनिया आज सेमीकंडक्टर को भविष्य की रणनीतिक ताकत के रूप में देख रही है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग का आकार लगभग 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5जी संचार तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के तेजी से विस्तार के कारण आने वाले वर्षों में चिप की मांग लगभग दोगुनी होने की संभावना है।
वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी का वर्चस्व स्पष्ट है, जो दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत उन्नत चिप्स का निर्माण करती है। वहीं अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार और तकनीकी तनाव के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं।

इसी वैश्विक पुनर्संतुलन के दौर में भारत तेजी से एक विश्वसनीय और स्थिर विकल्प के रूप में उभर रहा है। भारत का स्पष्ट लक्ष्य वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना है। स्थिर नीतिगत ढांचा, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, विशाल घरेलू बाजार और कुशल मानव संसाधन के कारण भारत को दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।सेमीकंडक्टर का महत्व केवल उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक रक्षा क्षमताओं की यह आधारशिला बन चुका है। मिसाइल, ड्रोन, रडार, पनडुब्बियां और अत्याधुनिक संचार प्रणालियां, सभी का संचालन सेमीकंडक्टर चिप पर निर्भर करता है। स्वदेशी चिप निर्माण से भारत की रक्षा तैयारियां अधिक मजबूत, सुरक्षित और भरोसेमंद होंगी, साथ ही विदेशी निर्भरता में निर्णायक कमी आएगी।

भारत की सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता विशेष रूप से भारतीय नौसेना के लिए गेम-चेंजर साबित हो रही है। अब युद्धपोतों, पनडुब्बियों और हथियार प्रणालियों में प्रयुक्त अत्यंत संवेदनशील चिप्स के लिए आयात पर निर्भर रहने की मजबूरी कम हो रही है। जहाजों की गति, पनडुब्बियों की चुप्पी और हथियारों की सटीकता, इन तीनों का मूल आधार सेमीकंडक्टर ही हैं। स्वदेशी चिप के साथ नौसेना को अधिक सुरक्षित, दीर्घकालिक और संकट-काल में निर्बाध परिचालन क्षमता मिलेगी।

तकनीकी स्तर पर, स्वदेशी पावर इलेक्ट्रॉनिक्स चिप से नौसेना के जहाजों में ऊर्जा-दक्ष इंजन प्रणाली संभव हो रही है, जिससे ईंधन की 20-30 प्रतिशत तक बचत और समुद्र में लंबे समय तक गश्त की क्षमता बढ़ेगी। कंपाउंड सेमीकंडक्टर आधारित रडार और सोनार चिप से निगरानी तंत्र अधिक तेज और संवेदनशील बन रहे हैं। उन्नत तकनीकों से विकसित रडार दुश्मन की गतिविधियों को अधिक दूरी और सटीकता से पहचानने में सक्षम होंगे। पनडुब्बियों में लगे सेंसर अब उच्च दबाव और तापमान को भी बेहतर ढंग से सहन कर पाएंगे।

संचार के क्षेत्र में, सिलिकॉन फोटोनिक्स आधारित चिप उपग्रह और 5G संचार को संभव बना रही हैं। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में नौसेना को वास्तविक समय में डेटा साझा करने की क्षमता मिलेगी, जो आधुनिक समुद्री युद्ध में निर्णायक मानी जाती है। परिणामस्वरूप विध्वंसक और युद्धपोत जहाज अधिक क्षमता और लंबी परिचालन दूरी प्राप्त कर रहे हैं, जबकि पनडुब्बियां गहरे समुद्र में भी दुश्मन की पहचान करने में सक्षम हो रही हैं।

मिसाइल प्रणालियों में स्वदेशी चिप गाइडेंस, कंट्रोल, नेविगेशन और सेंसर सिस्टम का मूल आधार बन रही हैं। मिसाइल का ‘दिमाग’ कहे जाने वाले प्रोसेसर अब भारत में डिजाइन और विकसित हो रहे हैं, जो जीपीएस और जड़त्वीय नेविगेशन डेटा को तेजी से प्रोसेस कर अत्यंत सटीक लक्ष्य निर्धारण करते हैं।

ड्रोन और एआई आधारित हथियार प्रणालियों में सेमीकंडक्टर तकनीक युद्ध की परिभाषा बदल रही है। छोटे, हल्के और शक्तिशाली चिप्स से ड्रोन अधिक ऊंचाई, अधिक दूरी और लंबे समय तक उड़ान भर सकते हैं। एआई-सक्षम चिप से ड्रोन स्वार्म तकनीक विकसित हो रही है, जहां दर्जनों या सैकड़ों ड्रोन मिलकर समन्वित निगरानी या हमला कर सकते हैं।

सेमीकंडक्टर मिशन केवल एक औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी संप्रभुता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का स्पष्ट घोषणापत्र है। सेमीकंडक्टर मिशन भारत को आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था से निकालकर नवाचार-आधारित वैश्विक तकनीकी शक्ति में बदल रहा है। स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसरों का विकास, उन्नत चिप डिजाइन केंद्रों की स्थापना और बड़े पैमाने पर विनिर्माण क्षमताएं भारत को चिप नवाचार के उभरते वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित कर रही हैं।

Topics: आत्मनिर्भर भारत विजनचिप निर्माणमिसाइलतकनीकी एवं औद्योगिकभारतीय नौसेनाइलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण हबसेमीकंडक्टरमाइक्रोनपाञ्चजन्य विशेषटाटा समूहडिजिटल अर्थव्यवस्थास्वदेशी रक्षा क्षमतासेमीकॉन इंडियाभारत सेमीकंडक्टर
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