‘ भारत के उत्थान में ही हमारे जन्म की सार्थकता'
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होम विश्लेषण

‘ भारत के उत्थान में ही हमारे जन्म की सार्थकता’

गत दिनों नागपुर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विदर्भ प्रांत द्वारा प्रो. यशवंतराव केळकर के जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में “प्रिय यशवंतराव” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन हुआ। प्रस्तुत हैं, उसके प्रमुख अंश-

Written byडॉ. मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघडॉ. मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
May 6, 2026, 02:05 pm IST
inविश्लेषण, संघ @100, महाराष्ट्र
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत

यशवंतराव जी हमारे सामने एक आदर्श के रूप में रहे हैं और आगे भी रहेंगे। जीवन में उनके जैसा बनने का प्रयास करना ही वास्तव में महत्वपूर्ण बात है। पूजनीय बालासाहब ने उन्हें “डॉक्टर हेडगेवार कुलोत्पन्न” कहा था। संपूर्ण समाज को संगठित करने वाला कार्यकर्ता जिस प्रकार होना चाहिए, वैसा व्यक्तित्व उनमें था। और एक विशेषता भी है-डॉक्टर हेडगेवार के बारे में जो प्रसिद्ध गीत “लो श्रद्धांजलि राष्ट्र पुरुष” है, उसमें कहा गया है कि “तेजोमय प्रतिबिंब तुम्हारे स्वयं सिद्ध अगणित निकले हैं।”

शाश्वत विचार और कार्यपद्धति

डॉक्टर हेडगेवार ने जो कार्यपद्धति और विचार दिया, क्या वह आज भी प्रासंगिक है? क्या वह आगे भी चलता रहेगा ? इसका उत्तर तर्क से भी दिया जा सकता है, क्योंकि वे जो बातें लेकर आए, वे शाश्वत हैं। जब तक मनुष्य है, तब तक वे सत्य रहेंगे। वे अविनाशी हैं, शाश्वत हैं। यशवंतराव जी ने हमें जो कार्यपद्धति दी, जो भाव दिया, वह भी शाश्वत है, वह कभी मिटने वाला नहीं है। उसमें कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन अंततः वही स्थिर रहता है।

इसी का एक पहलू यह है कि इस प्रकार काम करने वालों के कारण, और ऐसा जीवन जीने वालों की एक श्रृंखला चलती रहती है। हमारे देश की यही परंपरा है, आदिकाल में प्रारंभ हुई और आज तक चल रही है। हमारे देश के बारे में कहा जाता है, “कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।” इसका कारण यही है कि जीवन के सत्य को पहचानकर और उसी के आधार पर व्यवहार करने की जो परंपरा है, उसे अपने जीवन में उतारने वालों की निरंतर परंपरा चलती रहती है। यही उस कार्यपद्धति का एक अंग है।

हम सब लोग जब कार्य में लगे रहते हैं, तब बाहरी परिस्थितियों को भी देखते हैं। परिस्थितियों में अनेक प्रश्न उठते हैं। संगठन की स्थिति भी कभी अनुकूल, कभी प्रतिकूल होती रहती है। यशवंत राव जी ने विद्यार्थी परिषद के जिस कालखंड को देखा, उसमें उन्होंने परिषद को बड़ा करके एक सामर्थ्यवान संगठन बनाया। आज परिस्थितियां बदल गई हैं। आज हमारे सामने अनुकूलता का समय है। इसलिए सभी प्रकार की सुविधाएं हमारे पास हैं, और अपने कार्य के विस्तार के लिए उनका उपयोग करना हमारा कर्तव्य बनता है। लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि सुविधा कार्य के लिए है, हमारे लिए नहीं। हम सुविधा के स्वामी हैं, सुविधा हमारी स्वामी न बने, ऐसा आचरण करना ही हमारा काम है, और हम यह कर सकते हैं।

ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय

जिन शाश्वत मूल्यों के आधार पर उपेक्षा और प्रतिकूलता के समय में संगठन को आगे बढ़ाया गया, उन्हीं मूल्यों के आधार पर अनुकूलता के समय को भी साधने की कला और शक्ति हम सबमें आएगी, यह समझना चाहिए। यह बातें केवल कहने की नहीं हैं। किसी भी कार्य के दो प्रमुख पक्ष होते हैं, ज्ञान और कर्म। जैसे आकाश में उड़ने वाला पक्षी दोनों पंखों के सहारे उड़ता है, वैसे ही जीवन में आगे बढ़ने के लिए ज्ञान और कर्म दोनों का समन्वय आवश्यक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है।

परंतु केवल ज्ञान और कर्म ही पर्याप्त नहीं हैं। इन दोनों का संचालन भक्ति के आधार पर होता है। भक्ति ही समस्त सामर्थ्य प्रदान करती है, भक्ति शक्ति को दिशा देती है, ज्ञान को मार्ग दिखाती है और कर्म का उद्देश्य निश्चित करती है। बिना भक्ति का ज्ञान उपयोगी नहीं होता, वह उपद्रव का कारण बन सकता है। और बिना भक्ति का कर्म व्यवस्थित नहीं होता, वह विक्षिप्त हो सकता है। इसलिए जब ज्ञान, कर्म और भक्ति-ये तीनों एकत्र आते हैं, तभी लोकसंग्रह का कार्य ठीक प्रकार से संपन्न होता है।

हम सब एक विचार के आधार पर अनेक संगठनों में कार्य कर रहे हैं। हमारे जीवन का मूल क्या है? हमारे जन्म की सार्थकता और हमारे मोक्ष का साधन यही है कि भारत का उत्थान हो। देशभक्ति हमारी प्रेरणा है। हम अपने देश की परंपरा, उसके व्यवहार-मूल्य और उसके ज्ञान से जुड़े रहते हैं। हम उसी प्रकार बनने का प्रयास करते हैं और वह हमारे लिए सर्वोच्च स्थान रखता है।

यदि हमारा आलंबन सही है और हम उससे जुड़े हुए हैं, तो उपेक्षा में साधनता हो, विरोध में पीड़ा हो या अनुकूलता में सुख, इनमें से कोई भी हमें विचलित नहीं कर सकता। इसलिए कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे यशवंत राव जी के जीवन को समझें।

आदर्श जीवन और निरंतर प्रयास

समर्थ रामदास स्वामी ने संभाजी महाराज को जो उपदेश दिया था-“शिवराय से कैसे चलना, कैसे बोलना, कैसे व्यवहार करना, कैसे हंसना”-उस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रत्येक गुण का अनुशीलन और अनुकरण करना, यह हमारे लिए भी आदर्श है।
यदि हमें विद्यार्थी परिषद का कार्य करना है, तो हमारा आदर्श क्या होना चाहिए? हमें यह प्रश्न अपने सामने रखना चाहिए, यशवंतराव जी क्या कर रहे होते? उसी प्रकार बनने का प्रयास करना चाहिए। हमारे समकालीन उदाहरण हमारे आसपास ही हैं, उनसे प्रेरणा लेकर हम आगे बढ़ सकते हैं।

आने वाली पीढ़ियों के लिए हमें स्वयं एक आदर्श बनना है। हम पूर्ण रूप से वैसे बन पाएंगे या नहीं, इसकी चिंता किए बिना प्रयास करते रहना चाहिए। जितना प्रयास करेंगे, उतना ही उस आदर्श का तेज हमारे संगठन में प्रतिबिंबित होगा।

लक्ष्य की पूर्ण प्राप्ति के बाद ही परंपरा आगे बढ़ती है, लेकिन उस दिशा में चलते समय जो वृत्ति अपनाई जाती है, वह निरंतर बनी रहनी चाहिए। यही हमारी शक्ति है।

इस कार्यक्रम ने निश्चित रूप से सभी के मन में एक संकल्प उत्पन्न किया होगा कि जीवन ऐसा ही होना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार, पूरी निष्ठा से प्रयास करना है और फल की चिंता नहीं करनी है। क्योंकि जब ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय होता है, तो परिणाम निश्चित होता है।

कभी प्रतीक्षा करनी पड़ती है, लेकिन जो संकल्प लेकर चलते हैं, वे अंततः सिद्ध होते ही हैं। यह हमारे संगठन का दीर्घ अनुभव है।
इसलिए आप सबके सामने एक ही आग्रह है, जो कुछ आपने देखा और समझा है, उसे अपने जीवन में उतारें। छोटी-छोटी बातों को अपनाते हुए स्वयं को गढ़ें।

हम सबका कार्य है, एक विशिष्ट प्रकार का जीवन निर्माण करना। जब हम स्वयं ऐसा जीवन जीते हैं और समाज में सक्रिय रहते हैं, तो यह परंपरा स्वतः आगे बढ़ती है।

विद्यार्थी परिषद का कार्य केवल कार्यक्रम करना नहीं है, बल्कि मनुष्य निर्माण करना है। स्वयं बनना और दूसरों को बनाना, आत्मीयता और मित्रता के आधार पर, यही हमारी कार्यपद्धति है। यशवंत राव जी के जीवन के माध्यम से हमने इसी कार्यपद्धति का दर्शन किया है। उसका उचित परिणाम हमारे जीवन में दिखाई दे, इसी उद्देश्य के साथ आप सभी को शुभकामनाएं।

Topics: संगठन और नेतृत्वआदर्श कार्यकर्तासरसंघचालकमोहनराव भागवतपाञ्चजन्य विशेषसंघ शताब्दी वर्षसंघ के 100 सालRSSभक्तिमनुष्य-निर्माणभारत का उत्थान
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