बंगाल चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत का संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम से ही दे दिया था। गंगटोक में 28 अप्रैल को युवाओं के साथ फुटबाल खेलते हुए उन्होंने गोल दागा था। जिस दिन पीएम ने गोल दागा था बंगाल की जीत उसी दिन सुनिश्चित हो गयी थी I यह संदेश था कि काली की आराधन कर पीएम मोदी न केवल बंगाल की आध्यात्मि संस्कृति को आत्मसात कर चुके हैं बल्कि फुटबाल की इस धरती से पूरी तरह जुड़ चुके हैं। बंगाल में फुटबाल न केवल युवाओं, बल्कि हर दिल की धड़कन है। इसी धड़कन ने बंगाल में भाजपा को न केवल प्रचंड बहुमत दिलाया, बल्कि भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति का भी अंत कर दिया।

फुटबाल की धरती बंगाल
सन 1872 में कलकत्ता फुटबॉल क्लब की स्थापना हो गयी थी । भारतीय फुटबॉल के जनक नागेंद्र प्रसाद सर्वाधिकारी ने बंगाल को भारतीय फुटबॉल में स्थापित किया , सन 1911 मोहन बागान ने IFA शील्ड के फाइनल में ब्रिटिश टीम (ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट) को 2-1 से हराकर एक मील का पत्थर स्थापित किया, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक बड़ी राष्ट्रवादी जीत थी। सन 1889 में मोहन बागान और 1920 ईस्ट बंगाल क्लब की स्थापना हुई, इन दोनों क्लब्स प्रतिद्वंद्विता भी प्रसिद्द है, जिसे कोलकाता डर्बी के रूप में जाना जाता है, बंगाल में इंडियन फुटबॉल एसोसिएशन (IFA) की स्थापना 1893 में हुई थी।

1898 में कलकत्ता फुटबॉल लीग भी प्रारंभ हुई, यह एशिया की सबसे पुरानी फुटबॉल लीग है। बंगाल ने देश को बहुत से दिग्गज खिलाड़ी भी दिए हैं, जैसे पी.के. बनर्जी, चुनी गोस्वामी, शैलेंद्र मन्ना और कृषानू डे आदि । बंगाल में फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, अपितु बंगाल की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा भी है, जो अक्सर घोटियों (पश्चिम बंगाल के मूल निवासी) और बांगल (पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थी) के बीच पहचान के संघर्ष को दर्शाता है। आज, कोलकाता का साल्ट लेक स्टेडियम (विवेकनंद युवा भारती क्रीड़ांगन) भारत के सबसे बड़े फुटबॉल स्टेडियमों में से एक है और बंगाल में फुटबॉल के प्रति दीवानगी अभी भी बरकरार है।
संघर्ष और प्रतिस्पर्धा की परिपाटी
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यह समझने में सफल रहा कि बंगाल संघर्ष और प्रतिस्पर्धा की भूमि है, जहाँ के जनमानस में संघर्ष करने की क्षमता है, और इसका बहुत बड़ा कारण खेल भी हैं, फुटबाल खेलने का प्रचलन बंगाल में बहुत पुराना है, हर गाँव में खेला जाने वाला खेल फुटबाल ही है I फुटबाल के प्रति दीवानगी पूरा देश जानता है I लेकिन इस भावना को समझने वाले, खेल के इस भाव को नरेंद्र मोदी ने समझा और जब चुनाव प्रचार भी बंद हो गया तब भी पडोसी राज्य सिक्किम से संदेस देने का काम किया I यह भाजपा की और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूक्ष्म राजनैतिक रणनीति का हिस्सा कही जा सकती है I इतनी छोटी से छोटी बातों का ध्यान रखना और उसे चुनावों में इस्तेमाल करना यह कुशलता मोदी से सीखनी होगी I संघर्ष से सरकार तक रास्ता साफ करने में फुटबाल का किया गया गोल आज चर्चा में है I

गोल करते हुई जीत सुनिश्चित
गंगटोक में सिक्किम के युवा खिलाड़ियों के साथ खेलते समय किया गया गोल, कब चुनावी गोल बनकर नया इतिहास बनाएगा किसी को नहीं पता था I ज्ञातव्य हो बंगाल के हर गाँव पंचायत में फुटबाल क्लब बने हुए हैं, उनका अपना नेटवर्क और खेल भावना को मोदी ने समझा और स्वयं फुटबाल खेलकर बड़ा संदेश भी दिया और युवाओ को अपनी ओर आकर्षित भी किया I चुनाव परिणामों के उपरांत यह साकार होता हुआ भी दिखा I

बंगाल में फुटबॉल मात्र एक खेल ही नहीं, अपितु एक जुनून, भावना और सांस्कृतिक पहचान है, बंगाल में इसे ‘जीया’ जाता है। राज्य की सामाजिक और ऐतिहासिक विरासत का आईना है फुटबाल, जो औपनिवेशिक काल में राष्ट्रवाद और प्रतिरोध का प्रतीक बना था। इसीलिए पश्चिम बंगाल को “भारतीय फुटबॉल का तीर्थ” कहा जाता है ।
राजनीतिक खेल में खेल बना निर्णायक
सूक्ष्मता से देखेंगे तो समझ में आएगा पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास में इन विधानसभा चुनावों में खेल और खिलाड़ियों का बड़े पैमाने पर, रणनीतिक और सकारात्मक सदुपयोग भाजपा द्वारा किया गया ।
इस चुनाव में पारंपरिक राजनीति से हटकर, पार्टियों ने युवा वोटर्स, फुटबॉल प्रेमियों और स्थानीय क्लब संस्कृति को साधने के लिए खेल को एक मुख्य औजार के रूप में इस्तेमाल किया। भाजपा ने चुनाव से पहले युवाओं तक पहुंचने के लिए लगभग 80,000 फुटबॉल और 5,000 क्रिकेट बैट वितरित किए। भाजपा द्वारा राज्य में ‘नरेंद्र मोदी कप’ टूर्नामेंट आयोजित किया था, जिसमें हजारों स्थानीय खिलाड़ियों और टीमों ने भाग लिया, जिससे सीधे तौर पर वोटर्स के साथ पार्टी को जोड़ा । बंगाल की राजनीति में फुटबॉल क्लबों का सीधा प्रभाव है, लगभग 60-70 विधानसभा सीटों पर इन क्लबों के माध्यम से सत्ता हासिल की जा सकी।

पूर्व क्रिकेटर अशोक डिंडा (मोयना) और पूर्व हॉकी कप्तान भरत छेत्री जैसे दिग्गज खिलाड़ियों को भाजपा द्वारा मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत हासिल की, खेल आधारित इस जमीनी रणनीति का असर दिखा और पार्टी का वोट शेयर 2019 के बाद से लगातार बढ़ता हुआ 2021 में महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंचा। हम इसे ‘ग्रास रूट इंजीनियरिंग’ कहा जा रहा है, जहां ‘खेला होबे’ के नारे के बीच फुटबॉल को एक राजनीतिक संदेश के रूप में इस्तेमाल किया गया। इससे पहली बार खेल को राज्य की सत्ता हासिल करने के मुख्य माध्यम के रूप में देखा गया
ममता बनर्जी से यहां हो गई गलती
ममता बनर्जी ने 2021 विधानसभा चुनाव के दौरान हावड़ा की रैली में फुटबॉल को मंच से भीड़ की ओर उछालकर ‘खेला होबे’ का नारा बुलंद किया था। 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भी ममता ने इसे प्रमुख राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया, भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के रूप में ममता ने बखूबी किया I एक समय था जब ममता बनर्जी ने रैलियों में फुटबॉल के साथ ड्रिबलिंग की और उसे जनता की ओर उछाला करती थीं, ‘खेला होबे’ का नारा 2021 से लेकर 2024 तक टीएमसी का मुख्य हथियार रहा, जिसे उन्होंने देश भर में लोकप्रिय बनाने का दावा किया।

स्थानीय क्लबों ने ममता का भरपूर समर्थन किया। यह फुटबॉल खेलना सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि टीएमसी का एक आक्रामक चुनावी प्रचार अभियान रहा है। इस बार विधानसभा में ममता बनर्जी भूल ही गयीं फुटबाल और खेल को एड्रेस करना, न खेल ध्यान आये और न खिलाड़ी, इसीलिए शायद जनता ने सिखाया सबकI

















