बंगाल: भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर मौन लिबरल्स आज भाजपा विजय पर खफा क्यों?
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बंगाल: भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर मौन लिबरल्स आज भाजपा विजय पर खफा क्यों?

2021 बंगाल चुनाव के बाद TMC कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं पर हुई बर्बर हिंसा, बलात्कार और हत्याओं की सच्ची कहानी। शोवा मजूमदार, कुश, त्रिलोचन महतो जैसी घटनाएं जो उदारवादी मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
May 5, 2026, 01:34 pm IST
in विश्लेषण, पश्चिम बंगाल
Silence of liberals on west Bengal Violence

प्रतीकात्मक तस्वीर

वह वर्ष 2021 था। तृणमूल कॉंग्रेस की बंगाल में जीत का वर्ष था और साथ ही उन लोगों के लिए काल का साल था, जिन्होंने भाजपा को वोट दिया था। ऐसे में एक 81 वर्षीय शोवा मजूमदार की तस्वीरें अचानक से ही लोगों के दिलों को व्यथित करने लगी थीं। इस वृद्ध महिला का मात्र इतना कसूर था कि वह गोपाल मजूमदार की माँ थीं। और गोपाल मजूमदार का दोष मात्र इतना था कि वह भाजपा का कार्यकर्ता था।

भाजपा की जीत से सदमे में लिबरल गैंग

मगर इस वृद्ध महिला की तस्वीरों ने और इस असहिष्णुता ने किसी कथित उदारवादी चेहरे को परेशान नहीं किया, जो कुछ दिन पहले इस बात को लेकर परेशान था कि कहीं भाजपा बंगाल में न आ जाए? भाजपा के बंगाल में न आने की खुशी इतनी थी कि गोपाल मजूमदार की माँ की मौत इसमें दब गई। मगर ऐसा नहीं था कि मात्र शोवा मजूमदार ही ऐसी महिला थीं, जिनकी पीड़ा ने उन चेहरों को परेशान नहीं किया था, जो हर कीमत पर बंगाल से भाजपा को दूर रखना चाहते थे। वर्ष 2021 का चुनाव जीतते ही भाजपा कार्यकर्ताओं पर टीएमसी के कार्यकर्ताओं द्वारा हमले शुरू हो गए थे। सैकड़ों कार्यकर्ता मारे गए थे तो हजारों लोग बंगाल छोड़कर भाग गए थे और वह भी मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने भाजपा को वोट देने के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग किया था।

हिंसा पर कथित उदारवादियों की बेशर्मी

और इस पर कथित उदारवादियों से एक ही वाक्य निकलकर आया था कि “बंगाल में तो चुनावों में हिंसा होती ही है!” क्या इस निर्लज्ज वाक्य पर इन्हें शर्म नहीं आनी चाहिए थी? क्या इस बेशर्म स्वीकारोक्ति पर मीडिया और कथित उदारवादियों को अपने गिरेबान में झाँककर देखना नहीं चाहिए था कि हिंसा क्यों होती है और क्या एक लोकतंत्र में इस तरह की हिंसा होनी चाहिए?

मगर सवाल पूछता कौन? बंगाल के इन आम नागरिकों के लिए जीवन दोहरा युद्ध था। न ही पुलिस उनकी बात सुनती थी और न ही मीडिया और कथित लेखक, वह तो भूल ही जाएं कि ऐसा कुछ हो भी रहा था। भाजपा के कार्यकर्ता और वह भी युवा कार्यकर्ता टीएमसी के कार्यकर्ताओं के हाथों मरते रहे, मगर फिर भी कथित उदारवादी लेखकों का दिल न पसीजे! टीएमसी के कार्यकर्ता भाजपा की महिला कार्यकर्ताओ का बलात्कार करते रहें, मगर इन लोगों के मुंह में यह कहते हुए दही जमा रहे कि “बंगाल में तो चुनावों में हिंसा होती ही है!” क्या ऐसा कोई कहकर इन घटनाओं को उचित ठहरा सकता था?

हिंसा की भेंट चढ़े ये हिन्दू

शायद नहीं! मगर फिर भी यह हुआ! यह होता ही रहा और लगातार होता रहा। भाजपा का 18 वर्षीय कार्यकर्ता जो पुरुलिया का था, उसे मारकर लटका दिया गया। त्रिलोचन महतो, जिसकी आँखों में सपने थे, जिसकी आँखों में जीवन था, उसे बुझा दिया गया था, और देखते ही देखते असंख्य युवा इस हिंसा का शिकार हो गए।

कितने लोगों को तो चंदना हलदर का नाम ही नहीं पता होगा, जिसे वर्ष 2021 में बंगाल चुनाव परिणामों के बाद पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया गया था।

26 वर्षीय कुश की हत्या भी 5 मई 2021 के बाद कर दी गई थी। वह घर से 5 मई 2021 को गायब हुआ और फिर उसका शव 8 मई 2021 को बैशठम तालाब के पास पाया गया था। एफ आई आर के अनुसार उसके शरीर शरीर पर चाकू के कई निशान थे।

वह दृश्य भी विचलित करने वाला था, जब भाजपा को वोट देने वाली महिलाओं से सड़क पर कान पकड़कर उठक बैठक करवाई गई थी। आखिर यह सब क्यों? और जब यह सब हो रहा था तो कथित लेखक समुदाय यह कहते हुए संतोष व्यक्त कर रहा था कि भाजपा बंगाल में नहीं आई, यह खुशी है।

हिन्दुओं की हत्या पर खुशी मनाने वाले लिबरल पत्रकार

एक तरफ भाजपा के कार्यकर्ता मारे जा रहे थे, उनके घरों की महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न हो रहा था, उनके घरों को लूटा जा रहा था, तो दूसरी तरह भारत का कथित लिबरल पत्रकार समाज और लेखक समाज यह कहते हुए खुशी व्यक्त कर रहा था कि बंगाल भाजपा के हाथों में से जाने से बच गया।

तो क्या यह समझा जाए कि उन लेखकों और कथित लिबरल पत्रकारों के लिए भाजपा कार्यकर्ताओं के प्राण कुछ मायने ही नहीं रखते हैं? या कभी भी रखते थे? क्या यह सभी एक ही दृष्टि से देखने वाले लोग हैं, जिन्हें केवल अपना एजेंडा अर्थात हिन्दू विरोधी एजेंडा चलाना है और हिंदुओं की हत्याएं उनके लिए कोई भी मायने नहीं रखती हैं?

वर्ष 2021 में तृणमूल कॉंग्रेस के बंगाल जीतते ही हिंसा की आंधी चली थी। अरिंदम मिद्या नामक युवा भाजपा समर्थक को अपनी जान तृणमूल कॉंग्रेस के इस्लामी समर्थकों के हाथों गँवानी पड़ी थी। धर्म मण्डल, मनोज जायसवाल, माणिक मण्डल, उत्तम घोष सहित असंख्य नाम हैं, जिन्होनें अपनी जान केवल और केवल इसलिए गंवा दी क्योंकि वे भाजपा के समर्थक थे, या फिर भाजपा कार्यकर्ता थे।

आज पाँच वर्ष बाद जब इन असंख्य भाजपा कार्यकर्ताओं का बलिदान रंग लाया है और आम भाजपा कार्यकर्ता इस बात से खुश है कि कम से कम उनके साथियों का और उनका संघर्ष रंग लाया, तो आज भी कथित उदारवादियों को पीड़ा हो रही है। उन्हें यह पीड़ा हो रही है कि आखिर भाजपा सरकार क्यों बन रही है?

उन्हें यह एहसास आज भी नहीं है कि यह लोकतंत्र है, यहाँ पर जनता को मत देने का अधिकार होना चाहिए न कि उनके एजेंडे में फँसकर केवल भाजपा के विरोध की बात करनी चाहिए।

वन्देमातरम का उद्घोष करने वाली भूमि पर अपराध हो गया था वन्देमातरम

एक समय में वन्देमातरम का उद्घोष करने वाली भूमि पर वन्देमातरम बोलना ही अपराध हो गया था, मगर यह सब इन कथित लिबरल लेखकों या कलाकारों को नहीं दिखा, बांग्लादेश के हिंदुओं की पीड़ा लिखने वाली तस्लीमा नसरीन का भी लगातार विरोध होता रहा, मगर अभिव्यक्ति की आजादी के ठेकेदार एकदम चुप रहे और यही पुकार करते रहे कि बस भाजपा न आए!

अब वह क्यों न आए, इसका कोई प्रत्यक्ष कारण इनके पास नहीं है। वर्ष 2026 में जब बंग भूमि में कमल दल शान से प्रवेश कर चुका है, तो अंतहीन पीड़ा के स्वर कथित उदारवादियों के कंठ से निकल रहे हैं, वे पोस्ट्स में बदल रहे हैं, वे लेखों में बदल रहे हैं, मगर यह कोई नहीं कह रहा है कि आखिर तृणमूल ही क्यों जीतना चाहिए और क्यों भाजपा को जीतना नहीं चाहिए?

 

Topics: पश्चिम बंगाल हिंसाबंगाल चुनाव रिजल्टTMC चुनाव बाद हिंसाभाजपा कार्यकर्ता हत्या बंगाल
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