बंगाल चुनाव: दीदी के दुर्जेय गढ़ में खिला ‘कमल’
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दीदी के दुर्जेय गढ़ में खिला ‘कमल’

ममता बनर्जी का अजेय माना जाने वाला किला आखिरकार ढह गया है और राज्य की जनता ने एक नई राजनीतिक व्यवस्था को चुनने का फैसला किया है।

Written byविप्लव विकासविप्लव विकास
May 4, 2026, 05:34 pm IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल
बंगाल में भाजपा की जीत का जश्न मनातीं महिलाएं।

बंगाल में भाजपा की जीत का जश्न मनातीं महिलाएं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों या कहें ‘केसरिया’ अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। पिछले डेढ़ दशकों से बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाली क्षेत्रीय ताकतों को पछाड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में बहुमत हासिल करने की ओर अग्रसर है। कोलकाता की गलियों से लेकर सिलीगुड़ी की वादियों तक, आज माहौल बदला हुआ है।

ममता बनर्जी का अजेय माना जाने वाला किला आखिरकार ढह गया है और राज्य की जनता ने एक नई राजनीतिक व्यवस्था को चुनने का फैसला किया है। यह जीत केवल सीटों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि बंगाल की जनता की उस गहरी छटपटाहट का परिणाम है जो पिछले कुछ समय से प्रशासन और नीतिगत फैसलों को लेकर देखी जा रही थी। ममता ने सरकारी तंत्र का इस्लामीकरण कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे भीड़तंत्र ने बंग प्रदेश पर कब्ज़ा कर लिया है।

सत्ता विरोधी लहर और परिवर्तन की गूंज

इस चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता केवल लोक-लुभावन योजनाओं के भरोसे बैठने को तैयार नहीं थी। तृणमूल कांग्रेस ने ‘लक्ष्मी भंडार’ और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के दम पर अपनी जमीन बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, ‘कट-मनी’ और भर्ती घोटालों के आरोपों ने सरकार की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया। लोगों के मन में यह बात घर कर गई थी कि राज्य को अब विकास के एक ऐसे मॉडल की जरूरत है जो केवल ‘भत्ता’ पर आधारित न होकर औद्योगिक विकास, सुरक्षा और रोजगार सृजन पर केंद्रित हो। भाजपा ने इसी नस को पकड़ा और ‘सोनार बांग्ला’ के अपने विजन को आम आदमी की आकांक्षाओं से जोड़ने में सफलता पाई।

दक्षिण बंगाल के समीकरणों में बदलाव

सबसे बड़ा उलटफेर दक्षिण बंगाल के उन जिलों में देखने को मिला है जिन्हें टीएमसी का अभेद्य दुर्ग माना जाता था। हुगली, हावड़ा और 24 परगना जैसे क्षेत्रों में, जहां कभी तृणमूल की तूती बोलती थी, वहां इस बार मतदाताओं ने खामोशी से अपना फैसला बदला। आरजी कर और संदेशखाली जैसी घटनाओं ने महिला मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को सुरक्षा के मुद्दे पर सोचने पर मजबूर किया। वहीं दूसरी तरफ, युवा मतदाताओं ने बेरोजगारी और राज्य से हो रहे पलायन को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। भाजपा का ‘डबल इंजन’ सरकार का नारा उन लोगों को रास आया जो बंगाल को फिर से देश का औद्योगिक केंद्र बनते देखना चाहते हैं।

30 प्रतिशत का दबदबा बनाम 70 प्रतिशत का संघर्ष

पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से लगभग 210 सीटों के भाग्य विधाता हिंदू मतदाता हैं, लेकिन लंबे समय तक वामपंथी विमर्श ने प्रदेश में ऐसा माहौल बनाए रखा कि केवल मुस्लिम वोट ही चुनावी जीत तय करते हैं और भाजपा यहाँ कभी सफल नहीं हो सकती। इस मिथक को तोड़ते हुए हिंदू संगठनों ने मोर्चा संभाला और 30 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक की चिंता किए बिना अपना पूरा ध्यान 70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने पर केंद्रित किया। हिंदुओं के भीतर ‘अस्तित्व की लड़ाई’ का संकल्प जगाकर उन्हें भय के स्थान पर भरोसे का संबल प्रदान किया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम दबदबे के डर से मुक्त होकर ग्रामीण बंगाल ने इसे एक अंतिम लोकतांत्रिक संघर्ष के रूप में लिया। इस परिवर्तन को संभव बनाने में चुनाव आयोग की भूमिका अत्यंत निर्णायक रही, जिसने केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व तैनाती और बूथ स्तर पर कड़ी निगरानी के जरिए उस हिंसा और डर के माहौल को खत्म किया जो सालों से मतदाताओं को घरों में कैद रखता था। इसी सुरक्षा और भरोसे के कारण स्वाधीनता के पश्चात रिकॉर्ड संख्या में हिंदुओं ने घरों से निकलकर मतदान किया, और आज उसी एकजुटता का परिणाम है कि कमल गंगासागर के तट से लेकर दार्जिलिंग की पहाड़ियों तक पूरी भव्यता के साथ खिला हुआ है।

भविष्य की चुनौतियां और नई राजनीति

भाजपा के लिए यह जीत जितनी बड़ी है, चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। बंगाल एक ऐसा राज्य है जिसकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान है। यहाँ की जनता जितनी जल्दी सिर आंखों पर बिठाती है, उतनी ही तेजी से जवाबदेही भी मांगती है। आने वाले समय में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की चरमराई हुई आर्थिक स्थिति को सुधारना और कानून व्यवस्था को एक निष्पक्ष ढांचा प्रदान करना होगा। वहीं दूसरी ओर, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि आखिर कहाँ उनकी रणनीति चूक गई। बंगाल ने आज स्पष्ट संदेश दिया है कि वह शांति, प्रगति और स्थिरता चाहता है, और अब सारा दारोमदार नई सरकार पर है कि वह इन उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है।

 

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विप्लव विकास
विप्लव विकास लेखक और स्तंभकार हैं। समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और भारतीय विमर्श के मुद्दों पर स्पष्ट व तर्कसंगत लेखन के लिए जाने जाते हैं। अपने लेखों के माध्यम से जटिल विषयों को सरल भाषा में प्रस्तुत कर पाठकों के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देते हैं। [Read more]
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