गुजरात: बच्चों की फोन की लत छुड़ाने के लिए बाउंसर का पहरा, माता-पिता हर महीने खर्च कर रहे ₹65,000 
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गुजरात: बच्चों की फोन की लत छुड़ाने के लिए बाउंसर का पहरा, माता-पिता हर महीने खर्च कर रहे ₹65,000 

अहमदाबाद में एक 16 वर्षीय लड़की के माता-पिता ने 24x7 उसकी निगरानी के लिए दो शिफ्ट में चार बाउंसर रखे हैं। फोन छीनने पर वह हिंसक हो जाती है।

Written byसुनीता मिश्रासुनीता मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
May 4, 2026, 07:49 am IST
inगुजरात
Social Media Addiction

प्रतीकात्मक तस्वीर

गुजरात से एक हैरान कर देने वाली खबर सामने आई है। यहां माता -पिता अपने बच्चों की फोन और सोशल मीडिया की लत से परेशान होकर घरों में बाउंसर रख रहे हैं। उन्हें लगता है कि अधिक स्क्रीन टाइम और इंटरनेट की आदत उनके बच्चों को हिंसक बना रही है। अहमदाबाद में एक 16 वर्षीय लड़की के माता-पिता ने 24×7 उसकी निगरानी के लिए दो शिफ्ट में चार बाउंसर रखे हैं, जिस पर वे हर महीने लगभग 65,000 रुपये खर्च कर रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, यह लड़की फोन और सोशल मीडिया की इस कदर आदी हो गई थी कि जब भी उसका फोन उससे लिया जाता, तो वह हिंसक हो जाती थी।

मनोचिकित्सक डॉ. मृगेश वैष्णव के अनुसार, नाबालिग लड़की एक फोटो-शेयरिंग प्लेटफॉर्म को काफी पसंद करती थी। वह अक्सर उस पर अपनी तस्वीरें पोस्ट करती और ऑनलाइन अनजान लोगों से बातचीत करती रहती थी। उसके माता-पिता तब ज्यादा परेशान हो गए, जब उसने सोशल मीडिया पर बने दोस्तों से मिलने के लिए घर से ​बिना बताए बाहर निकलना शुरू कर दिया।

बाउंसरों पर हर महीने 65,000 का खर्चा

टाइम्स आफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मामला गंभीर होने के बाद परिवार वालों ने जब उसका (बेटी) फोन लेने की कोशिश की, तो वह हिंसक हो गई। उसने अपने अपार्टमेंट से टेलीविजन और माइक्रोवेव जैसे सामान नीचे फेंक दिए और अपनी मां पर हमला कर दिया। डॉ. वैष्णव ने कहा, “दवाओं के साथ-साथ, उस पर सख्त निगरानी रखना एक मजबूरी बन गई है।” लड़की की मां ने बताया कि वे पिछले कुछ महीनों से उसकी फोन और सोशल मीडिया की लत छुड़ाने के लिए बाउंसरों का 65,000 रुपये का खर्चा उठा रहे हैं। आमतौर पर बाउंसर मशहूर हस्तियों की सुरक्षा और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रखे जाते हैं, लेकिन यह चिंताजनक है कि अब कई परिवारों द्वारा इन्हें अपने बच्चों की फोन की लत छुड़ाने के लिए रखा जा रहा है।

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बाउंसर रखने का चलन बढ़ा

दरअसल, यह कोई पहला मामला नहीं है। गुजरात के ही सूरत और राजकोट जैसे शहरों में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां माता-पिता अपने बच्चों के हिंसक व्यवहार या गलत आदतों को सुधारने के लिए सिक्योरिटी एजेंसियों की मदद ले रहे हैं। सूरत से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जहां एक परिवार को अपने 17 साल के बेटे की गेमिंग की लत छुड़ाने के लिए बाउंसर रखने को मजबूर होना पड़ा। पिता द्वारा डांटे जाने पर उस लड़​के ने अपना गुस्सा निकालने के लिए पालतू कुत्ते को बेरहमी से पीटा था। इसके बाद पिता ने अपने प्रिय कुत्ते की सुरक्षा और बेटे की निगरानी के लिए नौ महीने तक दो शिफ्ट में आठ बाउंसर तैनात किए थे।

कोविड के बाद बिगड़े हालात

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड महामारी के बाद बच्चों का व्यवहार तेजी से बदला है। डॉ. वैष्णव ने कहा कि जिन किशोरों को कम उम्र में ही पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन मिल जाते हैं अक्सर वे उन पर निर्भर हो जाते हैं। उन्होंने कहा, “हम इस तरह के ऐसे गंभीर मामले देख रहे हैं, जिनमें किशोरों को स्क्रीन की लत छुटाने के लिए एक से चार महीने तक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है।” अहमदाबाद में ‘अभयम’ हेल्पलाइन के कोऑर्डिनेटर सतीश काडिया ने बताया कि महामारी के बाद से बच्चों में स्क्रीन की लत और हिंसक व्यवहार से जुड़ी कॉल्स में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने कहा, “इनमें से अधिकतर मामलों में, जब बच्चों से फोन ले लिए जाते हैं, तो वे या तो खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं या अपने माता-पिता, दोस्तों या परिवार के सदस्यों के साथ हिंसक व्यवहार करते हैं।”

सुरक्षा एजेंसियों की मांग बढ़ी

राजकोट और वडोदरा में भी सुरक्षा एजेंसियों की मांग बढ़ी है। राजकोट में सिक्योरिटी एजेंसियों का कहना है कि माता-पिता अब उन किशोरों पर नजर रखने के लिए भी बाउंसर हायर कर रहे हैं, जो तेज रफ्तार गाड़ी चलाने, सड़कों पर झगड़ा करने और हनीट्रैप जैसी जोखिम भरी सामाजिक स्थितियों में शामिल होते हैं। ‘राम सिक्योरिटी एजेंसी’ के मालिक केयूर उनादकट ने बताया कि उनके कई क्लाइंट रसूखदार राजनेता और कारोबारी हैं, जो अपने बच्चों से जुड़े किसी भी विवाद से बचना चाहते हैं। एजेंसियों के मुताबिक, परिवार इस तरह की निगरानी पर हर महीने 50,000 रुपये से ज्यादा खर्च करने को तैयार हैं। जो सेवा कभी सिर्फ VIP लोगों और भीड़-भाड़ वाली जगहों के लिए थी, वह अब आम घरों में भी पहुंच रही है। यह उन परिवारों की बढ़ती बेबसी को दिखाता है जो अपने बच्चों को फोन की लत से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

Topics: गुजरात समाचारसोशल मीडियासूरतस्क्रीन टाइमफोन की लत
सुनीता मिश्रा
सुनीता मिश्रा
हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री। इग्नू दिल्ली से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री। पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव। [Read more]
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