ग्रीस के शरणार्थी कैंप का वो खौफनाक सच : 17 साल की लड़की को क्यों पत्थर मारकर मारना चाहता था अपना ही समुदाय?
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ग्रीस के शरणार्थी कैंप का वो खौफनाक सच : 17 साल की लड़की को क्यों पत्थर मारकर मारना चाहता था अपना ही समुदाय?

2019 की मोरिया कैंप की घटना: मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाला खुलासा और सिस्टम की विफलता का कच्चा चिट्ठा।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by Shivam Dixit
May 3, 2026, 09:30 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
greece moria refugee camp girl stoning plot exposed

ग्रीस के मोरिया शरणार्थी शिविर का दृश्य और किशोरी पर हमले का प्रतीकात्मक चित्रण।

ग्रीस की डिप्टी स्वास्थ्य मंत्री अगापिडाकी ने 2019 की उस दिल दहला देने वाली घटना का खुलासा किया है, जहाँ एक किशोरी को सिर्फ इसलिए पत्थर मारकर मारने की योजना बनाई गई क्योंकि उसने जबरन शादी से इनकार कर दिया था। जानिए मोरिया कैंप का वो सच जो दुनिया से छिपा रहा।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी समुदाय ने किसी दूसरे देश में जान बचाने के लिए शरण ली हो, मगर वे लोग वहाँ जाकर अपने ही पीड़ित समुदाय की किसी किशोरी को जमीन में बैठाकर मिलजुलकर पत्थर मारने की योजना बनाने लगें? क्या हो जब कथित पीड़ित समुदाय की ही कोई लड़की ऐसी हो जाए कि वह पीड़ितों से ही प्रताड़ित हो और यह बात कहीं दबकर रह जाए? यह सामने ही न आए कि कैसे उस लड़की के साथ यह अमानवीय घटना हुई? और मीडिया या सरकार ने इस अमानवीय घटना को क्यों छिपाया?

वर्ष 2019 की घटना : मोरिया कैंप का खौफनाक सच

अब जब यह बात निकलकर सामने आई है तो यह तमाम सवाल खड़े करती है। यह घटना है वर्ष 2019 की, ग्रीस की। लेसवॉस के पूर्वी एगेन द्वीप पर कुख्यात “मोरिया शरणार्थी शिविर” में एक लड़की पत्थरों के वारों से मरते-मरते बची थी, क्योंकि उसने अपने परिवार द्वारा चुने गए आदमी से शादी करने से इनकार कर दिया था। अर्थात पीड़ित हैं, शरण लिए हुए हैं, मगर अपने परिवार की लड़कियों के प्रति इस सीमा तक नफरत से भरे हैं कि अगर उसने उनकी पसंद से शादी करने से इनकार कर दिया, तो वे पत्थरों से कुचली जाएं।

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डिप्टी स्वास्थ्य मंत्री अगापिडाकी का बड़ा खुलासा

ग्रीस की डेप्यूटी स्वास्थ्य मंत्री अगापिडाकी ने हालिया एक इंटरव्यू में इस बात का खुलासा किया है। पेशे से मनोवैज्ञानिक अगापिडाकी ने बताया कि यह घटना तब उनके संज्ञान में आई थी, जब वे 2019 की गर्मियों में नव निर्वाचित मितसोतकी सरकार में बेसहारा बच्चों के संरक्षण के लिए विशेष सचिव के रूप में नियुक्त की गई थीं। 2015 में एक मिलियन से अधिक विदेशी नागरिक, ग्रीस में शरणार्थी बनकर आए थे। और उनमें से अधिकतर मिडल ईस्ट और विशेषकर सीरिया के थे। कुछ अफगानिस्तान आदि से भी थे।

मानव तस्करी और नशीली दवाओं का अड्डा बने शिविर

अगापिडाकी ने ‘face2face’ कार्यक्रम में अपने इंटरव्यू में बताया कि उनका कार्यकाल कितना कठिनाइयों से भरा हुआ रहा था और कैसे उन्होनें तमाम प्रयासों से लोगों के मन में विश्वास जगाया। उन्होनें बताया कि कैसे अधिकारियों के पास पहले ग्रीस में ऐसे बच्चों का डेटा ही नहीं था, जिनका कोई साथी नहीं था और उन्होनें यह भी बताया कि कैसे ये शरणार्थी शिविर नशीली दवाइयों की तस्करी और मानव तस्करी का अड्डा बन गए थे। इसके साथ ही उन्होनें यह भी बताया कि अफगानिस्तान से हजारा समुदाय के बच्चे निशाने पर रहते थे।

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हजारा समुदाय की लड़कियां और ‘स्टोनिंग’ की साजिश

हरी-हरी आँखों वाले सुंदर बच्चे मानव तस्करों का शिकार बन जाते थे। उन्होंने कहा कि “कुछ ऐसे मामले भी थे जो असल में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के थे। अफ़गानिस्तान की हज़ारा आबादी, आप जानते हैं, वो हरी आँखों वाली बहुत खूबसूरत लड़कियाँ जिन्हें हमने नेशनल ज्योग्राफिक और मैगज़ीन के कवर पर देखा था, ये बच्चे मुश्किल से ही ज़िंदा बच पाते थे। वे ह्यूमन ट्रैफिकिंग नेटवर्क के हाथों में पड़ जाते थे।“ इसके बाद उन्होनें कहा कि “यह माइग्रेंट संकट के दौरान, और खासकर मोरिया में, हुआ था कि एक माँ अपनी 17 साल की बेटी की शादी वहाँ किसी से करने के लिए राज़ी हो गई थी, और क्योंकि लड़की ने विरोध किया, तो समुदाय ने पत्थर मारने का कार्यक्रम रखा था।”

कल्पना से परे क्रूरता : अपनी ही बच्ची के प्रति नफरत

यह बात कल्पना से ही परे है कि कोई समुदाय शरण लेने के लिए कहीं आया और वह अपनी ही बच्ची के प्रति इस सीमा तक क्रूर हो जाए कि परिजनों की मर्जी से शादी न करने पर उसे पत्थर मरवाने लगें? यह कल्पना से परे बात है। बात यदि ग्रीस के मोरिया शिविर की हो तो यह बात गौरतलब है कि यह बहुत ही कुख्यात शिविर था और जहां इसकी क्षमता केवल 3000 लोगों को रखने की थी, वहीं इसमें 2020 तक लगभग 20,000 लोग रह रहे थे और जिनमें 7,000 बच्चे थे और यह बहुत ही खतरनाक जीवन स्थितियों के लिए कुख्यात हो गया था।

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सिस्टम की विफलता और अनसुलझे सवाल

इसमें वर्ष 2020 में लगी आग के बाद 13,000 लोग विस्थापित हो गए थे। मीडिया की मानें तो लगभग 3,000 आप्रवासियों पर लूटपाट का मुकदमा भी चला था और वे दोषी ठहराए गए थे, मगर बाद में सबूतों के अभाव में उन्हें ऊपरी अदालत से रिहाई मिल गई थी। यह खुलासा हैरान करने वाला है और साथ ही यह प्रश्न भी उठाता है कि यदि कोई समुदाय अपने आप में इतना पीड़ित है कि वह अपना मुल्क छोड़कर दूसरे मुल्क में शरण ले रहा है, तो वहाँ पर भी वह अपनी उन्हीं रवायतों को और जिद्द को जारी क्यों रखे हुए है, जो उनकी अपनी बेटियों के लिए घातक हैं।

क्यों नहीं होता इन अमानवीय घटनाओं पर व्यापक विमर्श?

और इससे भी बढ़कर यह कि जब भी ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो इनपर व्यापक विमर्श क्यों नहीं बनता है? यह प्रश्न क्यों नहीं उठता कि आखिर शरणार्थी शिविरों से बच्चे गायब क्यों और कहाँ और कैसे होते हैं? क्या इनके अपने ही लोग होते हैं जो ऐसा काम करते हैं? और कैसे शरणार्थी शिविरों में नशीली दवाइयों की तस्करी होती है? ये तमाम सवाल ऐसे हैं, जिन पर विमर्श होना चाहिए, परंतु होता नहीं है। हालांकि वह किशोरी बच गई थी और उसे उसके परिवार वालों से दूर किसी स्कूल में भेज दिया था।

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Topics: Human TraffickingWorld News in HindiRefugee crisisGreece Refugee CampMoria Camp StoryStoning Case 2019Agapidaki Disclosure
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