नर्मदा: जीवनदायिनी मां की मौन होतीं 'धमनियां'
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नर्मदा: जीवनदायिनी मां की मौन होतीं ‘धमनियां’

नर्मदा केवल एक कुंड से निकलने वाली नदी नहीं है। नर्मदा का जल तीन प्रमुख स्रोतों से आता है।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
May 2, 2026, 06:54 pm IST
inभारत, पर्यावरण
नर्मदा की सहायक नदियों पर भी देना होगा ध्यान (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

नर्मदा की सहायक नदियों पर भी देना होगा ध्यान (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

अमरकंटक की पहाड़ियों पर सुबह की किरणें उतर रही थीं। हवा में ठंडक थी, जंगलों में पक्षियों का कलरव था और एक छोटे से कुंड से जल की पतली धारा चुपचाप बह रही थी। एक वृद्ध साधु जलधारा को अपलक देख रहे थे। तभी एक युवक ने पूछा- बाबा, क्या यही नर्मदा हैं? इतनी छोटी-सी? साधु ने मुस्कुराकर कहा-हां बेटा, यही हैं, लेकिन यह केवल जन्म है, जीवन नहीं।

जब इसमें जंगलों की नमी, सहायक नदियों की शक्ति और मानव की संवेदना जुड़ती है, तब यह मां नर्मदा बनती हैं। थोड़ा रुककर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा-और जब ये सब खत्म हो जाते हैं, तब यही नर्मदा फिर एक छोटी-सी धारा बन जाती है। यह कथा आज केवल एक आध्यात्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक और पर्यावरणीय सत्य बनती जा रही है।

नर्मदा का उद्गम – एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र

मध्य भारत के पवित्र स्थल अमरकंटक से नर्मदा नदी का उद्गम भारतीय संस्कृति और भूगोल का अद्भुत संगम है। नर्मदा केवल एक कुंड से निकलने वाली नदी नहीं है। नर्मदा का जल तीन प्रमुख स्रोतों से आता है ,भूमिगत जल (Base Flow) – 20–22% ; वर्षा जल – लगभग 60% और सहायक नदियां – शेष योगदान (लगभग 41 नदियां)। इसका अर्थ है कि नर्मदा का अस्तित्व उसके स्रोत से अधिक उसके तंत्र पर निर्भर है। वर्षा होती है , जंगल जल को रोकते हैं , मिट्टी उसे सोखती है , जल धीरे-धीरे नीचे जाता है , फिर रिसकर छोटी धाराओं में आता है , ये धाराएं सहायक नदियां बनती हैं और अंततः नर्मदा को जीवन देती हैं । यह एक धीमा, संतुलित और सतत चक्र है।

नर्मदा का वास्तविक स्रोत अब एक ग्राम्य कुएं तक सिमट गया है, जो केवल वर्षा ऋतु में सक्रिय रहता है। कभी यह झरना बारहमासी था और दो धाराओं सावित्री और सोन में विभक्त होता था। आज सावित्री जलाशय शैवाल से भरा पड़ा है, सोन की धारा क्षीण हो चुकी है। गायत्री नदी, जिस पर 1952 में छोटा बांध बना था, आज केवल एक गड्ढे में बदल गई है। कपिलधारा और अरंडी नदियों के स्रोत लुप्त हो चुके हैं। अमरावती और वैतरणी के प्राकृतिक झरनों को सड़क निर्माण ने सीमेंट में दफना दिया है। नर्मदा कुंड के पीछे बना नहर तंत्र आज एक नाले में बदल चुका है। आज केवल सूर्य कुंड या ब्रह्म कुंड ही ऐसा स्रोत बचा है जो नर्मदा को वर्ष भर जल देता है। शेष सभी स्रोत मानसूनी बन चुके हैं।

वैज्ञानिक चेतावनियां : जब नदी संतुलन खोने लगे

2014 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गरुड़ेश्वर से भरूच, मंडला से भेड़ाघाट और सेठानी घाट से नेमावर के बीच नर्मदा को प्रदूषित घोषित किया। 2015 में नदी में बीओडी स्तर 7.1 मिलीग्राम प्रति लीटर पाया गया, जबकि सुरक्षित सीमा 3 मिलीग्राम है। 2017 में मत्स्य वैज्ञानिक उत्पल भौमिक के अध्ययन ने बताया कि नदी का तापमान बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण बांध और विकास परियोजनाएं हैं। इससे मछलियों का प्रजनन चक्र और घुलित ऑक्सीजन संतुलन बिगड़ रहा है। गाद की मात्रा बढ़ने से क्लोराइड स्तर निचले मैदानों में 615 से 3248 पीपीएम तक पहुंच गया है। यह संकेत है कि मीठे जल की मात्रा घट रही है और पारिस्थितिक असंतुलन गहराता जा रहा है। नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी के अनुसार हाल के वर्षों में उपलब्ध जल मात्रा घटकर केवल 14.66 मिलियन एकड़ फीट रह गई है यह अब तक का न्यूनतम स्तर है। 1986 से यह क्षेत्र लगातार पर्यावरणीय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। 2000 में अमरकंटक को बायोस्फियर रिज़र्व घोषित किया गया, पर संरक्षण से अधिक पर्यटन को प्राथमिकता मिली। आज भी गुजरात अधिक जल की माँग करता है, पर सच्चाई यह है, नदी सरकारों के आदेश से नहीं, प्रकृति की क्षमता से बहती है। नर्मदा का भविष्य अब घाटों की सफाई से नहीं, अमरकंटक की रक्षा से तय होगा।

नर्मदा का जल–तंत्र और सूखती सहायक नदियां

अमरकंटक का वह प्रसिद्ध झरना, जहां से मां नर्मदा प्रकट होती हैं, अपने आप में विशाल जलधारा नहीं है। उसमें पानी की मात्रा सीमित है। नर्मदा का विराट रूप वास्तव में उसकी सहायक नदियों से बनता है। जंगलों की रेतीली मिट्टी बरसात के जल को अपने भीतर संग्रहित कर लेती है, यह जल धीरे-धीरे रिसता है, छोटे पोखरों और नालों से गुजरता हुआ सहायक नदियों में पहुँचता है और अंततः नर्मदा की धारा को जीवन देता है। यानी नर्मदा का अस्तित्व केवल मुख्य धारा पर नहीं, बल्कि उसकी दर्जनों सहायक नदियों और जंगलों के जल–संरक्षण तंत्र पर टिका है और यही तंत्र आज सबसे गंभीर संकट में है।

रेत उत्खनन : नदी की जड़ पर प्रहार

नर्मदा घाटी में रेत का अवैध उत्खनन केवल मुख्य नदी तक सीमित नहीं है। लगभग हर जिले में बिकने वाली रेत या तो सीधे नर्मदा से निकाली जा रही है या उसकी सहायक नदियों से है, पर्यावरणविदों का स्पष्ट मत है कि जिन सहायक नदियों से बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा चुकी है, वे अब साल भर बहने की क्षमता खो चुकी हैं। रेत केवल निर्माण सामग्री नहीं, नदी की रीढ़ होती है। यह जल को रोकती है, भूजल स्तर बनाए रखती है और नदी की धारा को स्थिरता देती है। जब रेत निकाल ली जाती है, तो नदी का तल गहरा होता जाता है, पानी तेजी से बहकर निकल जाता है और कुछ वर्षों में नदी केवल मानसूनी नाला बन जाती है।

बंजर नदी : एक चेतावनी

जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों में रेत की सबसे बड़ी आपूर्ति जिस बंजर (बंजारा) नदी से हो रही है, वह स्वयं धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही है। कभी यह नदी साल भर बहती
थी। आज यह केवल वर्षा ऋतु में ही दिखाई देती है। बरसात समाप्त होते ही इसका पाट सूख जाता है।

हिरन नदी : जंगल गए, जल गया

जबलपुर की हिरन नदी नर्मदा की प्रमुख सहायक नदियों में से एक रही है। विंध्याचल की पहाड़ियों से निकलने वाली यह नदी कभी बारहमासी थी। लेकिन आज इसके चारों ओर के जंगल लगभग समाप्त हो चुके हैं। जल स्रोत नष्ट हो चुके हैं। रेत का अवैध उत्खनन चरम पर है। परिणाम यह है कि हिरन नदी अब वर्ष भर बहने की क्षमता खो चुकी है। यह केवल मानसून में जीवित रहती है, शेष समय एक सूखा पाट बन जाती है।

शेर नदी : खेती का दबाव, सूखती धारा

शेर नदी कभी नर्मदा की एक स्थायी सहायक धारा थी। लेकिन इसके किनारों पर लगातार बढ़ती खेती, भूजल के अत्यधिक दोहन और वन कटाई ने इसे भी मौसमी नदी बना दिया है।

शक्कर नदी : विराट से क्षीण

सतपुड़ा से निकलकर गाडरवारा के पास नर्मदा में मिलने वाली शक्कर नदी कभी नर्मदा की सबसे महत्वपूर्ण सहायक नदियों में गिनी जाती थी। आज यहाँ रेत का बड़े पैमाने पर उत्खनन हो रहा है जलधाराएँ टूट चुकी हैं। शक्कर नदी का प्रवाह निरंतर घट रहा है।

सूखती छोटी नदियां : अदृश्य त्रासदी

यह स्थिति केवल बड़ी सहायक नदियों तक सीमित नहीं है। जबलपुर की परियट, नरसिंहपुर की ओमनी और सिंगरी, होशंगाबाद की पलकमती, देनवा, बाबई, सोहागपुर की गंजाल, दूधी, सीहोर–रायसेन की तेंदुबी, वारना, कानर, चंद्रशेखर, ऊंटी, हथनी आदि । इनमें से अधिकांश नदियाँ या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या सूखने की कगार पर हैं।ये नदियाँ नर्मदा की अदृश्य धमनियां थीं। इनके बिना मुख्य धारा का स्वस्थ रहना संभव नहीं।

जंगलों की कटाई : जल–तंत्र का विघटन

वृक्षों की जड़ें बरसाती जल को रोकती हैं, मिट्टी को बाँधती हैं, और धीरे-धीरे भूजल को पुनर्भरण करती हैं। लेकिन निरंतर होती वन कटाई ने इस प्राकृतिक तंत्र को तोड़ दिया है।
अब वर्षा का अधिकांश जल सीधे बहकर निकल जाता है। जंगलों के नाले केवल बरसात में बहते हैं, शेष समय सूखे रहते हैं। नतीजा यह है कि नर्मदा की सहायक नदियां दम तोड़ रही हैं।

क्या नर्मदा भी सूख सकती है?

पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं यदि यही क्रम जारी रहा, तो आने वाले दशकों में नर्मदा का स्थायी प्रवाह भी संकट में पड़ सकता है। मुख्य नदी अभी जीवित है, पर उसकी जीवनरेखाएं कट रही हैं। नदी को केवल घाटों की सफाई से नहीं बचाया जा सकता। उसे बचाने के लिए सहायक नदियों को पुनर्जीवित करना होगा, रेत उत्खनन पर कठोर नियंत्रण करना होगा, जंगलों का पुनर्निर्माण करना होगा, और भूजल दोहन सीमित करना होगा।

नर्मदा मैया नहीं, तो हम नहीं

नर्मदा केवल एक पवित्र धारा नहीं है , वह स्वयं मां है। वह तपस्विनी है, जीवनदायिनी है, मोक्षदायिनी है। उसकी हर लहर में शिव का स्पर्श है, हर कंकर में शंकर का वास है, और हर बूंद में सृष्टि का भविष्य छिपा है। पर आज, जिस मां ने सदियों से हमें जल दिया, अन्न दिया, आश्रय दिया वही माँ आज हमारी ही उपेक्षा से पीड़ित है। उसके स्रोत सूख रहे हैं, उसकी संतानों-सी सहायक नदियाँ दम तोड़ रही हैं, उसका जल विषैला बन रहा है, और उसके आंचल-से जंगल उजड़ते जा रहे हैं।

मां नर्मदा को शब्दों से नहीं, कर्मों से बचाइए। घोषणाओं से नहीं, संरक्षण से पूजिए। धारा को निर्मल रखिए, तट स्वच्छ रखिए, जंगल बचाइए, सहायक नदियों के प्रवाह को फिर जीवित करिए क्योंकि विकल्प बहुत हैं- बांधों के विकल्प हैं, उद्योगों के विकल्प हैं, शहरों के विकल्प हैं, पर मां का कोई विकल्प नहीं होता।

 

Topics: मध्य प्रदेशनर्मदा नदीनदियों का संरक्षणपाञ्चजन्य विशेषनर्मदा संरक्षण
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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